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राहुल गांधी की महापंडिताई : डॉ. वेदप्रताप वैदिक*

 

*डॉ. वेदप्रताप वैदिक*कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को महापंडित के अलावा क्या कहा जाए? संसद में उन्होंने चीन और पाकिस्तान को लेकर जो बयान दिया है, यदि आप उसे ध्यान से पढ़ें तो आप खुद से पूछ बैठेंगे कि भारत की महान पार्टी इस कांग्रेस का नेतृत्व किन हाथों में चला गया है? यदि देश के प्रमुख विपक्षी दल का नेता इतना तथ्यहीन और तर्कहीन बयान दे सकता है और बौद्धिक तौर पर वह इतना अपरिपक्व है तो हमारे लोकतंत्र का ईश्वर ही मालिक है। राहुल गांधी की पहली मुलाकात मुझसे 2005 में काबुल में हुई थी। प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहनसिंह मुझे काबुल अपने साथ ले गए थे। बादशाह जाहिरशाह की नातिन और शाहजादी मरियम की बेटी ने मेरे लिए राजमहल में शाकाहारी प्रीति-भोज का आयोजन किया था। वह राहुल को भी उसमें बुला लाई। लगभग दो घंटे तक हम साथ रहे। राज परिवार के सदस्यों से मैं फारसी में और राहुल से हिंदी में बात करता रहा। राहुल की बातचीत और अत्यंत शिष्टतापूर्ण व्यवहार ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैं सोचता रहा कि यह नौजवान भारत की राजनीति में सक्रिय हो गया तो यह काफी आगे तक जा सकता है। शुरु के कुछ वर्षों में ऐसा लगने भी लगा था लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों से मुझे ही नहीं, देश के कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को भी यह लगने लगा है कि कांग्रेस का भविष्य अनिश्चित-सा हो गया है।

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इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य पार्टियों के नेता राहुल के मुकाबले महान बौद्धिक हैं। उनके और राहुल के बौद्धिक स्तर में ज्यादा अंतर नहीं है। वे भी अपने तथ्यों और तर्कों में हास्यास्पद भूलें करते रहे हैं लेकिन ऐसी भूलें वे अचानक या जल्दबाजी में करते हैं, संसद में भाषण देते हुए नहीं। राहुल ने कह दिया कि मोदी सरकार का ‘‘सबसे बड़ा अपराध’’ यह है कि उसने चीन और पाकिस्तान को एक-दूसरे का हमजोली बना दिया है। यह तो तथ्य है कि दो-ढाई साल पहले तक मोदी और चीनी नेता शी चिन फिंग ने जितनी गलबहियां एक-दूसरे के साथ कीं, आज तक दोनों देशों के किन्हीं भी नेताओं के बीच नहीं हुई। लेकिन यह तो मोदी का स्वभाव ही है। फिर भी चीन और पाकिस्तान यदि एक-दूसरे के नजदीक हुए हैं तो वे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहनसिंह के शासनकाल में ही हुए हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन जानेवाला पहला प्रधानमंत्री कौन था? क्या राहुल को पता है? उनके पूज्य पिता राजीव गांधी। जिन सलाहकारों के लिखे हुए भाषण बिना सोचे-समझे हमारे युवा-नेता लोग पढ़ मारते हैं, उन्हें अन्य बुजुर्ग नेताओं के आचरण से कुछ सीखना चाहिए। वे भी कोई परम बौद्धिक नहीं होते लेकिन वे हमेशा सतर्क और सावधान होते हैं। राजीव गांधी के असंगत तर्कों को काटने के लिए विदेश मंत्री जयशंकर के तर्कों को मैं यहां दोहराना नहीं चाहता हूं लेकिन राहुल गांधी का यह कथन भी अतिरंजित और हास्यास्पद ही है कि भारत में लोकतंत्र की बजाय राजतंत्र स्थापित हो रहा है। यहां एक राजा का राज चल रहा है। यह ठीक है कि सत्तारुढ़ भाजपा में अपेक्षित आंतरिक लोकतंत्र घट गया है लेकिन कांग्रेस में तो यह शून्य ही है। भारत की लगभग सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन चुकी हैं।

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इस खटकर्म की शुरुआत और पराकाष्ठा कांग्रेस ने ही आपात्काल लाकर की थी। बेहतर तो यह हो कि राहुल इस महान कांग्रेस पार्टी को माँ-बेटा पार्टी और भाई-बहन पार्टी होने से बचाएं। वरना न केवल भारत का लोकतंत्र अधोगति को प्राप्त होगा बल्कि राहुल गांधी को भारतीय राजनीति के महापंडित की उपाधि से भी सम्मानित कर दिया जाएगा।

 

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