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मिथिला संस्कृत शोध संस्थान के 73वें स्थापना दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ

 

जनकपुरधाम/मिश्री लाल मधुकर । दरभंगा मेंमिथिला संस्कृत शोध संस्थान, उच्च शिक्षा विभाग, बिहार सरकार के 73वें स्थापना दिवस पर संस्थान के सभागार में संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने कहा कि आज हमारे लिए बहुत ही हर्ष का विषय है। जिस संस्थान की स्थापना महान स्वप्नों के साथ देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की थी, उसका 73वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है। आज यह विचार करना होगा कि इन 73 वर्षों में उन स्वप्नों का क्या हुआ जिनके साथ संस्थान की नींव रखी गई थी? इस प्रश्न से जूझे बगैर संस्थान की उन्नति संभव नहीं है। वर्षों से यह संस्थान शिक्षकों तथा शिक्षकेतर कर्मियों के अभाव से जूझ रहा है, वित्तीय संकटों ने संस्थान के सभी इरादों को पस्त कर दिया है। मेरा सवाल है कि क्या दरभंगा के वे जनप्रतिनिधि जो यहां केवल तफ़रीह के उद्देश्य से आते हैं उनका दायित्व नहीं था कि वे इस संस्थान के लिए आवाज उठाते? लेकिन तमाम संकटों और दुर्भिसंधियों के बीच संस्थान के गौरवमयी इतिहास की पुनर्वापसी का स्वप्न हमारी आंखों से एक पल के लिए भी ओझल नहीं हुआ है।

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कार्यक्रम के उद्घाटनकर्ता पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष (मिथिला विश्वविद्यालय) प्रो. प्रभाकर पाठक ने कहा कि सन 72 में जब इस संस्थान के परिसर में प्रवेश करता था तो भयाक्रांत हो जाता था कि पता नहीं किस से शास्त्रार्थ हो जाए। चारों तरफ अध्येता, मनीषी दिखते थे। यह तपोभूमि रही है, सारस्वत प्रदेश रहा है लेकिन आज की दशा निराश करती है। मानों संस्थान चीख–चीख कर कहता है–
ढूँढ़ोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम।
जो याद न आए भूल के फिर ऐ हमनफ़सो वो ख़्वाब हैं हम।

मुझे आशा है कि अपने 75वें स्थापना दिवस पर संस्थान अपने स्वर्णिम इतिहास को दोहराएगा। इसके लिए सरकार और नीति नियामकों से संघर्ष हो तो हो! वर्ग कक्ष, सभागार, कार्य कक्ष बनवाएं जाएं। जो राजस्व है उसकी सुरक्षा की जाए।

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विश्वविद्यालय राजनीतिविज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव ने संस्थान के प्रति शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए कहा कि यह निजीकरण का दौर है। राज्य अपने लोककल्याणकारी दायित्वों से मुंह मोड़ चुकी है। सबकुछ को बाजार के हवाले किया जा रहा है। मिथिला संस्थान जैसे सभी पब्लिक फंडेड संस्थानों की दुर्दशा के पीछे यही कारण है। लेकिन प्रश्न है कि सरकार या राज्य कौन है? हम हैं, आप हैं यानी जनता है। इसलिए आज हमें जनता की शक्ति को पुनः खोजनी होगी। जनबल ही व्यवस्था में निर्णायक परिवर्तन ला सकता है।

विश्वविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति की जितनी पांडुलिपियां यहां हैं, उतनी बड़ी मात्रा में बिहार के किसी संस्थान में नहीं हैं। सदियों की मेधा का निचोड़ हमारे पास उपलब्ध है लेकिन हम उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं यह संस्थान व समाज की क्षति है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जितने ही संसाधन हमारे पास हैं, उसी को लेकर आगे बढ़ने का संकल्प करना होगा। इस अभियान में समाज की भूमिका को जागृत करना चाहिए।

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वहीं मिथिला शोध संस्थान के पूर्व निदेशक देवनारायण यादव ने कहा कि हमलोगों को आम जनता तथा गरीब–वंचित विद्यार्थियों से जुड़ना होगा, क्योंकि वे जनाधिकारों के लिए अड़ सकते हैं, लड़ सकते हैं।

लोहिया चरण सिंह कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रामबाबू आर्य ने कहा कि अगर विकास के एजेंडे में ऐसे शिक्षण संस्थानों को उन्नत बनाने की कार्यनीति नहीं है तो हम कैसे विकास की ओर बढ़ रहे हैं?

कार्यक्रम का संचालन अवकाशप्राप्त शास्त्र चूड़ामणि सह संकलन पंडित मित्रनाथ झा ने किया। मौके पर विगत 21 मई को सेवानिवृत हुए संस्थानकर्मी मो. सईम को निदेशक डॉ. सुरेंद्र सुमन ने पाग–चादर से सम्मानित किया।

मौके पर संस्थान के लिपि वाचन पंडित प्रकाशनाथ झा, अर्जुन कुमार, अनिल कुमार, रामविलास यादव, हरिशंकर कुमार, अनुरूप मंडल, नेति कामती, मदनमोहन मंडल, कृष्णकांत झा, शोहार्थी समीर कुमार, रूपक कुमार आदि मौजूद थे।

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