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जेन-जी बनाम अनेरास्ववियु: सोशल मीडिया से सड़कों तक टकराव की आहट

 

काठमांडू, ७ ऑक्टोबर । नेपाल की राजनीति में एक नई तनातनी उभर आई है — जेन-जी आंदोलन से जुड़े युवाओं और एमाले (CPN-UML) की छात्र इकाई अनेरास्ववियु (अखिल नेपाल राष्ट्रिय स्वतन्त्र विद्यार्थी यूनियन) के बीच।
अब तक सोशल मीडिया तक सीमित यह विरोध और आरोप-प्रत्यारोप अब सड़कों और कानूनी मोर्चे पर पहुँचने लगा है।

पृष्ठभूमि: ‘एरेस्ट ओली’ अभियान से शुरू हुआ विवाद

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी की मांग करते हुए जेन-जी समूह ने सोमवार से सोशल मीडिया पर #ArrestOli और #ArrestRameshLekhak अभियान चलाया।
यह हैशटैग अभियान बहुत तेजी से फैला और बड़ी संख्या में युवाओं ने इसमें भाग लिया।

जेन-जी आंदोलन के प्रतिनिधि सुदन गुरुङ के नेतृत्व में एक समूह ने मंगलवार को काठमांडू पुलिस परिसर में जाकर ओली और लेखक के खिलाफ औपचारिक शिकायत (जाहेरी) दर्ज कराने का प्रयास किया।
प्रदर्शनकारी यह आरोप लगा रहे हैं कि भदौ २३ (8 सितंबर) को जेन-जी आंदोलन के दौरान हुए दमन में 19 युवाओं की मौत हुई थी — जिसे वे “सामूहिक हत्या” मानते हैं।

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अनेरास्ववियु का पलटवार: बालेन शाह और सुदन गुरुङ के खिलाफ शिकायत

उसी दिन, एमाले की छात्र इकाई अनेरास्ववियु भी मैदान में उतर आई।
पूर्व अध्यक्ष समिक बडाल के नेतृत्व में अनेरास्ववियु के कार्यकर्ता भी काठमांडू पुलिस परिसर पहुँचे और जेन-जी आंदोलन के योजनाकारों — काठमांडू के मेयर बालेन शाह और नेता सुदन गुरुङ — के खिलाफ उजुरी (शिकायत) दी।

अनेरास्ववियु का आरोप है कि २४ भदौ (9 सितंबर) को “आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाने, सरकारी सम्पत्ति जलाने और जासूसी गतिविधि” में बालेन व गुरुङ की संलिप्तता थी।
पुलिस ने उनका आवेदन स्वीकार तो किया, लेकिन कहा कि 24 घंटे के भीतर दर्ता (रजिस्टर) करने या न करने पर जवाब दिया जाएगा।

दो-तरफा कानूनी लड़ाई की शुरुआत

अब स्थिति यह है कि एक तरफ जेन-जी कार्यकर्ता तत्कालीन सत्ता प्रमुखों (ओली और लेखक) के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं,
वहीं दूसरी तरफ एमाले की छात्र इकाई आंदोलनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराने जुटी है।

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पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायतें गौरीबहादुर कार्की की अध्यक्षता में बने जाँच आयोग को भेज दी हैं।
काठमांडू पुलिस प्रवक्ता एसपी पवन भट्टराई ने कहा,

“ऐसे मामलों की जाँच का अधिकार जाँच आयोग के पास है, इसलिए हमने फाइल वहीं भेज दी है।”

अनेरास्ववियु का रुख: “अराजकता को स्वीकार नहीं करेंगे”

पूर्व अध्यक्ष समिक बडाल ने चेतावनी दी —

“यदि 24 घंटे में हमारी शिकायत पर कोई कदम नहीं उठाया गया, तो हम अन्य विकल्पों की तलाश करेंगे। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की अराजकता और दासत्व को स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

उन्होंने आरोप लगाया कि “अदालत और अख्तियार जलाने जैसी घटनाओं के पीछे बालेन शाह और सुदन गुरुङ जैसे ‘अदृश्य रिमोट’ सक्रिय हैं।”

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बढ़ती राजनीतिक दूरी

यह घटनाक्रम बताता है कि जेन-जी आंदोलन और एमाले के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी अब खुलकर सामने आ रही है।
अब तक केवल सोशल मीडिया पर चल रही बहसें और ह्याशटैग अब सड़कों, अदालतों और सरकारी दफ्तरों तक पहुँच चुकी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों ने संयम नहीं रखा, तो आने वाले दिनों में यह संघर्ष “युवा बनाम पुराना दल” के रूप में गहराता जा सकता है।

निष्कर्ष:
नेपाल की राजनीति में जेन-जी आंदोलन एक नई युवा चेतना का प्रतीक बनकर उभरा था, लेकिन अब यह संघर्ष पुरानी पार्टी संरचनाओं से सीधा टकराव की दिशा में बढ़ रहा है।
एरेस्ट ओली अभियान से शुरू हुआ यह विवाद अब राजनीतिक ध्रुवीकरण की नई लकीर खींच रहा है — एक तरफ “युवा पीढ़ी का आक्रोश”, दूसरी तरफ “स्थापित दलों की रक्षात्मक प्रतिक्रिया”।

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