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नेपाल वायुसेवा निगम में सरकारी नियुक्ति रद्द – सरकार के लिए चेतावनी

 


काठमांडू: २१ अगस्त २०२६ (०५ भाद्र २०८३) नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने नेपाल वायुसेवा निगम (NAC) के कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर महेश्वरभक्त श्रेष्ठ की सरकारी नियुक्ति को गैरकानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है। न्यायालय के इस फैसले ने सरकारी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं और भविष्य के लिए एक सख्त नजीर पेश की है।

आखिर क्यों हुई सरकारी नियुक्ति बदर ?

सर्वोच्च न्यायालय ने इस नियुक्ति को रद्द करने के पीछे मुख्य रूप से पाँच ठोस कारण बताए हैं:

* **योग्यता क्रम (Merit) का उल्लंघन:** नियुक्ति की सिफारिश सूची में उपेन्द्र बहादुर कार्की पहले स्थान पर थे। लेकिन सरकार ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए योग्यता क्रम में पीछे रहे महेश्वरभक्त श्रेष्ठ को नियुक्त कर दिया।
* **उम्र सीमा (Age Limit) की अनदेखी:** कार्यकारी पद के लिए एक निश्चित उम्र सीमा तय है, जबकि श्रेष्ठ की उम्र 65 वर्ष पार कर चुकी थी, जो नियमों के सख्त खिलाफ था।
* **कानून और मापदंडों का उल्लंघन:** यह नियुक्ति ‘नेपाल वायुसेवा निगम अधिनियम, २०१९’ की धारा 4 और 6 के साथ-साथ ‘नियुक्ति संबंधी मापदंड, २०७३’ और ‘कार्यविधि, २०८२’ की निर्धारित शर्तों के विपरीत पाई गई।
* **सेवानिवृत्त (Retired) कर्मचारी की नियुक्ति:** श्रेष्ठ उसी संस्था से रिटायर हो चुके थे। किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति को बिना उचित कानूनी शर्तों का पालन किए पुनः कार्यकारी प्रमुख बनाना संस्थागत सुशासन (Corporate Governance) के खिलाफ माना गया।
* **सरकारी मनमानी (Arbitrariness):** बिना किसी ठोस आधार के पहले नंबर के उम्मीदवार को दरकिनार कर मनमर्जी से नियुक्ति करना पूरी तरह से सरकारी स्वेच्छाचारिता का प्रतीक था।

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इस फैसले से सरकार को क्या चेतावनी मिली ? 

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सरकार के लिए एक स्पष्ट और सख्त चेतावनी है:

* **कानून से ऊपर कोई नहीं:** सरकार अपनी मर्जी या राजनीतिक फायदे के लिए स्थापित कानूनों, अधिनियमों और नियुक्ति प्रक्रियाओं को दरकिनार नहीं कर सकती।
* **पारदर्शिता और सुशासन अनिवार्य:** सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियां योग्यता (Merit) के आधार पर होनी चाहिए, न कि मनमानी या भाई-भतीजावाद के आधार पर। संस्थागत सुशासन से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता।
न्यायिक जवाबदेही: अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता का दुरुपयोग या स्वेच्छाचारिता पाए जाने पर न्यायपालिका उसे बर्दाश्त नहीं करेगी। न्यायालय ने सरकार को तत्काल प्रभाव से एक नई, पारदर्शी और नियमसंगत नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।

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