सर्वोच्च अदालत ने भरत दाहाल को साधारण तारीख पर रिहा करने का दिया आदेश
नेपाल के सर्वोच्च अदालत ने राजनीतिक विश्लेषक एवं त्रिमूल नेपाल पार्टी के अध्यक्ष भरत दाहाल की हालिया सार्वजनिक टिप्पणियों को संविधान प्रदत्त विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के शांतिपूर्ण प्रयोग के दायरे में माना है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध जांच सामग्री के आधार पर उन्हें हिरासत में रखकर आगे जांच जारी रखने का कोई पर्याप्त आधार नहीं दिखता।
भरत दाहाल की गिरफ्तारी के बाद उनकी पुत्री डेनिका दाहाल ने सर्वोच्च अदालत में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) की याचिका दायर की थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश कुमार रेग्मी और सुनील पोखरेल की संयुक्त पीठ ने नेपाल पुलिस के साइबर ब्यूरो को निर्देश दिया कि यदि जांच जारी रखनी हो तो दाहाल को साधारण तारीख पर रखकर जांच की जाए, हिरासत में नहीं।
अदालत की प्रमुख टिप्पणी
संक्षिप्त आदेश में सर्वोच्च अदालत ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों से यह नहीं दिखता कि भरत दाहाल ने संविधान या कानून के विरुद्ध किसी हिंसात्मक आंदोलन का आह्वान किया हो। अदालत के अनुसार उन्होंने नेपाल के संविधान की धारा 17(2)(क) के तहत प्राप्त विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शांतिपूर्ण उपयोग करते हुए अपने विचार व्यक्त किए हैं। इसलिए उन्हें हिरासत में रखकर जांच करना आवश्यक प्रतीत नहीं होता।
मामला क्या है?
भरत दाहाल राजनीतिक विश्लेषण लिखने और विभिन्न मीडिया मंचों पर साक्षात्कार देने के लिए जाने जाते हैं। हाल के दिनों में उन्होंने यह दावा किया था कि जनजी (Gen Z) आंदोलन और उससे जुड़े कुछ नेता विदेशी शक्तियों के प्रभाव में संचालित हो रहे हैं। अपने दावों के समर्थन में वे द ग्रे जोन नामक एक ऑनलाइन मंच का हवाला देते रहे थे।
इन्हीं अभिव्यक्तियों के आधार पर नेपाल पुलिस ने उन्हें मोरंग से गिरफ्तार कर काठमांडू स्थित साइबर ब्यूरो लाया था, जहां उनके खिलाफ विद्युतीय कारोबार ऐन, 2063 की धारा 47(1) के तहत जांच शुरू की गई।
जिला अदालत से मिली थी तीन दिन की हिरासत
इससे पहले 5 असोज 2083 को काठमांडू जिला अदालत ने भरत दाहाल को तीन दिनों की न्यायिक हिरासत में रखकर जांच करने की अनुमति दी थी। उनका बयान भी दर्ज किया जा चुका है।
हालांकि सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यदि पुलिस को आगे भी जांच करनी है तो वह दाहाल को हिरासत में रखने के बजाय तारीख पर उपस्थित कराकर जांच कर सकती है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका क्यों खारिज हुई?
सर्वोच्च अदालत ने दाहाल को हिरासत से बाहर रखने का आदेश तो दिया, लेकिन उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी विद्युतीय कारोबार ऐन के तहत हुई थी और काठमांडू जिला अदालत से गिरफ्तारी की वैधानिक अनुमति भी प्राप्त थी। इसलिए गिरफ्तारी को अवैध घोषित करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश जारी करने का आधार नहीं बनता।
अब आगे क्या होगा?
सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद भरत दाहाल हिरासत से बाहर रहेंगे। यदि पुलिस उनके विरुद्ध आरोपपत्र दायर करती है और मामला अदालत में चलता है, तो वे बिना हिरासत रहकर ही मुकदमे का सामना कर सकेंगे।
सर्वोच्च अदालत ने फिलहाल इस मामले में दो पृष्ठों का संक्षिप्त आदेश जारी किया है और कहा है कि विस्तृत पूर्ण फैसला (पूर्णपाठ) बाद में तैयार किया जाएगा।

