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हे मधेश के वीर सपूतों ! जागो, अब रात नहीं, सुबह हो गई है : गंगेश मिश्र

 

गंगेश मिश्र, कपिलबस्तु, 21, जून |

भारत को आज़ादी के लिए, नब्बे साल इन्तज़ार करना पड़ा; और मधेश तो, अभी-अभी जगा है।
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ajadi-1.png11धैर्य ही है जो डटे रहने को प्रोत्साहित करता है हमें, और हम पथरीले पथ पर जूझते हुए भी अग्रसर होते रहते हैं।आज मधेश को उसी धैर्य और साहस का परिचय देना है, और दिखा देना है दुनियाँ को, हम देर से भले जगे किन्तु हमनें अपनी पहचान को, सम्मान को, स्वाभिमान को पा लिया है; उसे मिटने नहीं दिया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल सन् 1857 में पहली बार बजा; और आज़ादी मिली नब्बे सालों बाद सन् 1947 में।वीर शहीदों ने हँसते-हँसते, मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी; एक ज़ुनून था आज़ादी का।सरदार भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद, पं. रामप्रसाद ‘ बिस्मिल ‘, नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे अनेकों माँ के लालों ने भारत माँ की आज़ादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।
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” उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई,
अब रैन कहाँ जो सोवत है,
जो सोवत है वो खोवत है;
जो जागत है वो पावत है।”
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हे मधेश के वीर सपूतों ! जागो, अब रात नहीं,  सुबह हो गई है। अपने अधिकार के लिए, आत्मसम्मान के लिए पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाओ।अधिकारों की लड़ाई लम्बी चलती है, इसके लिए धैर्य चाहिए होता है; धैर्य को संबल बनाओ। क्योंकि अधिकार है तो सब कुछ है, अन्यथा पर कटे पंक्षी की फड़फड़ाते रह जाओगे; जैसा की आजतक मधेश भोगता आया है, हजारों धोखे खाकर।अब शान्त नहीं बैठना, खड़ा हो जाना है सीना तानकर; मुक़ाबला करना है, अधिकारों के अपहरणकर्ताओं से।
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