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तुम हो, सिर्फतुम हो !

 
तुम हो, सिर्फतुम हो !
वीरेन्द्रप्रसाद मिश्रा
कोई माने या नमाने, पर तुम हो,
तुम कौन हो यह कह नहीं सकता
पर इतना कह सकता हूँ, तुम हो ।
तुम कैसे हो, कोई जान नहीं सकता
तुम कैसे हो, शब्दों में वर्ण्र्ाानहीं हो सकता
उपनिषदो ने ठीक ही कहा तुम्हें ‘नेति नेति’
पर किसी ने नहीं कहा तुम नहीं

आखिर क्यों ! …तुम हो
कोई देखता राम मंे तुम को
कोई देखता रहीम में तुम को
कोई देखता क्राइष्ट में तुम को
कोई देखता अन्य रुप में तुम को
कह नहीं सकता किस रुप में हो तुम
आखिर क्यों – तुम हो !
तुम्हारी कृपा बिना साँस लेना भी मुश्किल
तुम्हारी कृपा बिना किसी कार्य की सिद्धी भी मुश्किल
अनहोनी को होनी में बदलना नहीं मुश्किल
पंगुओं को पहाडÞ पर चढÞना नहीं मुश्किल
तुम्हारी कृपा हो तो कुछ भी नहीं मुश्किल
आखिर क्यो – तुम हो !
तुम्हारे अस्तित्व का अनुभव नहीं संभव नग्न आँखों से
तुम्हारे अस्तित्व का अनुभव सम्भव मात्र विश्वास की आँखांे से
तुम्हारे अस्तित्व की पुष्टि बुद्धि और तर्क से नहीं
तुम सभी अस्तित्वों के हो अस्तित्व
तुम्हारे अस्तित्व के खण्डन में खण्डन का अस्तित्व ही कहाँ
आखिर क्यो – तुम हो !
क्या तुम निवास करते मन्दिरों में –
क्या तुम रहते गिर्जा घरों में –
क्या तुम जोरो की पुकार सुनते मस्जिदों में –
तुम तो सुनते हो हृदय की पुकार
क्या तुमने नहीं सुनी द्रौपदी और गज की पुकार –
तुम्हे जिसने मन से पुकारा है, तुमने पुकार सुनी है
तुम आये हो, इतना अनुभव हुआ है
आखिर क्यो – तुम हो !
तुम्हे न मात्र योगी प्राप्त कर सकते न मात्र तपस्वी
तुम्हे न मात्र ज्ञानी ही जान सकते न सिद्ध पुरुष हीं
तुम्हे जब भी किसी निःसहाय ने पुकारा है
तुम क्षण में प्रकट हुए हो
विश्वास नहीं, यह अनुभव है मेरा ! तुम हो
आखिर क्यो – तुम सब कुछ हो !

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जूठे पत्तल चाटते देखा
पूरन दयाल

मैने इस आजाद देश में
जूठे पत्तल चाटते देखा,
लडÞते देखा झगडÞते देखा
जूठे पत्तल झपटते देखा ।

टोह लगाकर कई निगाहें
बाबुओं को खाते देखें
र्सतर्क रहे हर पल वे आँखे
नजाने किस की तरफ वे फेकें ।
रोते देखा गिडÞ-गिडÞाते देखा
पेट पकडÞ ऐंठते देखा,
अमीरों के जूठे पत्तल
कंगालों को चाटते देखा ।

कुत्तों को गोदी में लेकर
गाडिÞयों में घूमते देखा
बन के पक्षी हिंस्रं पशुओं को
घर बागों में पलते देखा ।
नजाने कैसे, मानव ने मानव को
पत्तल चाटते नहीं देखा ।।

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भाई को कंगाल बनाकर
लहू उसी का पीते देखा
कंगालों के कंकालों को
सिगरेट बनाकर फूँकते देखा ।
लेकिन किसी के पाषाण हृदय को
मोम सा पिघलता नहीं देखा
दीन-हीन को खुले हृदय से
कंठ लगाते नहीं देखा ।
-रचनाकार एमाले पार्टर्ीीी तरफ से बैतडी से नेतृत्व करते है)

प्रलय !
श्याम बलामी

समन्दर के अन्दर
तैर रहे हैं असंख्य पहाड !
हवा के हाथ पैर टूट गए है
भूचाल से ….!
मानव द्वारा दवे कुचले घायल घर
धीरे-धीरे काल के गाल में समा रहे हैं !
आकाश गिर कर
टुकडो में बिखर रहा है !

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राम !
राम !!र्
र्सवत्र प्रलय हीं प्रलय है !!!
मैं कुछ भी सोच नहीं पा रहा !
भेजा प्लेट में है,
और
मैं खुद अपनी जीभ
चबा रहा !
-नेपाली से हिन्दी रुपान्तरणः मुकुन्द आचार्य)

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