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ज़िंदगी से यही गिला है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे : अहमद फराज

 

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ 

क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी

तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के

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तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना

ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे

जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर

आज तक हर नक़्श फ़रियादी मिरी तहरीर का

तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई

मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त

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