ज़िंदगी से यही गिला है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे : अहमद फराज
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
तिरे लिए मिरे दिल से दुआ निकलती है
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो ‘फ़राज़’
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर
आज तक हर नक़्श फ़रियादी मिरी तहरीर का
मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त


