Sat. Aug 15th, 2020

तकनीकी के साथ प्राकृतिक सरंक्षण एवं संवर्धन “: डाॅ अरविंद दीक्षित

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आज के परिवेश में तकनीकी ने हमारे जीवन में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन किये हैं। जिससे विश्व का कोई भी देश अब अछुता नहीं रह गया है। अंतरिक्ष में होने वाली गतिविधियों के साथ साथ मौसम के बदलते स्वरूप,भौगोलिक स्थिति एवं प्रथ्वी के किसी भी हिस्से में घटित होने वाली अनेक प्रकार की घटनाओं की खबरें हों, हमें संचार तकनीकी के माध्यम से तुरंत प्राप्त हो जाती है। तकनीकी ने मानव जीवन से जुड़ी प्रत्येक घटनाओं को प्रभावित किया है। दैनिक जीवन की दिनचर्या में शामिल होने वाली प्रत्येक कार्यों की सूची में हम देखतें हैं कि आज के समय में हम तकनीकी पर पूर्णत: निर्भर हो गयें हैं। उसके बिना हमारा कोई भी एक कार्य ऐसा नहीं होता है जिसमें हमने तकनीकी का सहारा ना लिया हो। प्रातः उठने से लेकर रात्रि विश्राम तक हम अनेक मशीनों से गुज़रते हुए अपने क्रियाकलापों को पूर्ण करतें हैं। जिसमें ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्थान है। इस वैज्ञानिक युग में ऊर्जा तकनीकी का मुख्य स्रोत है जो कि हमें थर्मल, जलशक्ति, पवनचक्की एवं परमाणु आधारित ऊर्जा द्वारा विभिन्न स्रोतों के द्वारा प्राप्त होती है। सहसा मन में विचार आता है कि हम विज्ञान आधारित तकनीकी में कितना निर्भर हो गयें हैं उसके बिना एक कदम चलना भी कठिन प्रतीत होता है। प्रयोग के तौर पर देखें कि कुछ पल के लिए आपका मोबाइल फ़ोन ही अगर आपसे दूर हो जाता है तो आप एक पल के लिए अपने आपको लाचार सा महसूस करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे हम विकलांग हो गयें हों, हमारे शरीर का कोई अंग हमसे अलग हो गया है आदि आदि मन में विचार आने लगते हैं। यह सिर्फ एक छोटा-सा उदाहरण है जो हमें यह विचार करनें के लिए मजबूर करता है कि तकनीकी अब हमारे जीवन का अहम् हिस्सा बन गयी है। जिसके बिना हम एक पल भी नहीं रह सकते हैं। क्या यह विचार योग्य प्रश्न नहीं है कि हमारा प्राकृतिक मानव जीवन नवीन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। संचार तरंगों, पराबैंगनी किरणों एवं विद्युत आधारित अनेक मशीनरियों में हम फ़िट से हो गये हैं। हमने सुख सुविधाओ के इतने माध्यम अपने आस-पास इकठ्ठे कर लिए हैं कि सब कुछ बस एक बटन दबाने भर की दूरी में ही हमें उपलब्ध हो जातें हैं। वास्तव में इक्कीसवीं सदी में इंसान ने विज्ञान आधारित तकनीकी में सर्वोपरि स्थान हासिल कर लिया है। निस्संदेह चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग व्यवस्था, रक्षा क्षेत्र, संचार माध्यमों, ई-कॉमर्स, डिजिटल, क्रषि-उधोगों एवं पर्यटन आदि के विभिन्न क्षेत्रों में इस आधुनिक तकनीक से बहुत सहायता प्राप्त हो रही है, यह स्वागत योग्य भी है। किन्तु हम कितने भी महारथी क्यों ना बन जाए हमें प्रकृति से तालमेल बनाकर ही चलना पड़ता है। प्रकृति की एक हुंकार में हम उसके सामने शरणागत की मुद्रा में ही नजर आते हैं। प्रकृति हमेशा अपना संतुलन स्थापित करती है, जिससे मानव जीवन में उथल-पुथल होना स्वाभाविक हो जाता है। जीवन के लिए हमें प्रकृति से जीवनदायी शुद्ध ऑक्सीजन,पानी,फलफूल आदि प्रक्रति प्रदत्त जो भी मुफ्त प्राप्त होता है वही अनमोल है हमारे जीवन के लिए जिसका मोल हम अपने बाज़ारी व्यवस्था में चुकाते ही हैं। क्रषि कार्य हेतु सुरक्षित भूमि में हम कंक्रीट के जंगल बढ़ाते चले जा रहें हैं, क्रषि भूमि को आवासों में परिवर्तन कर रहे हैं। कीटनाशकों के छिड़काव एवं खाद के कारण भूमि की जान निकल रही है। कहने का तात्पर्य सिर्फ यही है कि हमने तकनीकी विकास का उपयोग अपनी सुख सुविधाओं और आर्थिक लाभ के लिए ही किया है। जिसमें सिर्फ प्रकृति का दोहन ही हुआ है। मानव निर्मित विकास माडल के साथ साथ हमें प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भी आगे आना होगा। प्रकृति को फिर से संवारना होगा, नदी, तालाबों,जलाशयों एवं जंगलो को फिर से हरा-भरा करना होगा। केवल सरकारों के भरोसे रहना भी उचित नहीं, हम सभी का भी कर्तव्य है कि प्रकृति के बेहतर प्रबंधन में सबकी सहभागिता सुनिश्चित की जाए। वही राष्ट्र उन्नति भी करता है जहाँ के नागरिक कर्तव्य बोध की भावना से ओतप्रोत रहते हैं। आईये इस वैज्ञानिक युग को विकास की अंतिम परिणित विनाश से बचाया जाए, प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर दोहन न करके संवर्धन के कार्यो में लगा जाए।

लेखक चेयरमैन, भारतीय विकास संस्थान( रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट) मुम्बई, 2- ब्यूरो चीफ हैं, तथा एकेपी न्यूज़, मध्य प्रदेश 3- के संपादक, और भोजपुरी मिरर, मुम्बई से भी आबद्ध हैं ।

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