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बोलने का वक्त अब हमारा है : डा.करुणा वन्त

 

बोलने का वक्त अब हमारा है

बहुत देख लिया बहुत सुन लिया
ये अन्याय अब ना भाता है
ध्यान से हमारी बात सुनो
बोलने का वक्त अब हमारा है
फूल सी खूबसूरत हमेँ ना कहो
लगती ये कड़वी गाली है
दया सागर का नाम ना दो
दास बनाने की ये चालबाजी है
प्रेम की मुर्ती का उपनाम ना दो
बुत नहीँ हम जीते जागते प्राणी हैं
सहनशीला का आभूषण ना पहनाओ
इसमेँ स्वार्थ की बू आती हैे
उत्कृष्ट सृजना हैं हम सृष्टि के
आलम्बन फूल का हमें गँबारा नहीं
प्रेम तो हमारा स्वभाव ही है
अतिश्योक्ति ने इसे सँबारा नहीं
सदभाव हमारा धर्म है
आडम्बर से ये नहीं चली
करुणा से हृदय ओत–प्रोत है
सबके लिये है भरी पड़ी
शत्रु हमारा कोई एक इन्सान नहीँ
ये तो बस वो सत्ता है
आड़ मे जिसके पीछे छिप
कायर जो बल से खेलता है
आदर्शहीन दम्भी आचरण को
अपना हक और भोग समझता है
सँस्कार के बहाने हरदम
दमन कीे दलील जो देता है
सुन लो आज के एैलान को
स्वाभिमान हमारा जिन्दा है
आत्म विश्वास के अपने बल पे
अत्याचार की करते हम निन्दा हैं
अकेले नहीं इस सँघर्ष में हम
नयेँ साथीयोँ की बडी जमात है
छूट गए कई सँगी पुराने
ये तो सँघर्ष में ‘पक्ष लेने’ की बात है
सत्य, सदभाव, समता की खातिर
जूझने वालों की अपनी आवाज है
अपमान, भेदभाव और पाखण्ड रहित
रचना इक न्यायपूर्ण समाज है
बहुत देख लिया बहुत सुन लिया
यह अन्याय अब ना भाता है
ध्यान से हमारी बात सुनोे
बोलने का वक्त अब हमारा है
डा.करुणा वन्त, काठमाडौं

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