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पूस की सर्दी- एक अलहदा सा अहसास लेकर आती है : गोलोक बिहारी राय

 
*पूस की सर्दी*


पूस की सर्दी
एक अलहदा सा अहसास लेकर आती है
पूरे साल की उष्ण का काट लिए
पूरे साल की विषमता का प्रत्युत्तर लिए
सब कुछ जब अंदर खौलकर राख सा हो जाता है
बेचैनियाँ जब भटकोंईयाँ बन उभरने लगती हैं अंतर्मन में
उन सब को पाले का असर देती है पूस की सर्दी
एक नई शान्ति का प्रादुर्भाव लिए
नए विचारों का अभिलेख लिए
मुझे संचरित करती हैं ये ठंडी रातें
सभी यादों की उल्का लिए
मेरे मन को प्रस्फुटित करती
ये चुपचाप सी,
ठहरी सी पूस की ठंडी रातें
उन यादों का अहसास करा जाती है
ये पूस की रातें।

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