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आधुनिक समाज को सहनशील बनना होगा : आशुतोष झा

 
आधुनिक समाज एकल परिवार में लीप्त हो एक गहरी खाई की तरफ जाती हुई प्रतीत हो रही है।आज की सामाजिक ताना बाना सिमटती जा रही है लोग सिमट कर अपने आप के लिए ही रह रहे हैं जबकि पहले का परिदृश्य कुछ और था।एक सामाजिक सौहार्द जो अब बिखरे लगा है ।सामाजिक परिदृश्य में  देखा जाया तो विगत तीन दशक में  संयुक्त परिवार समाज में ना के बराबर है वहीं एकल परिवार की संख्या दिन प्रतिदिन  बढ़ रही है।आज के संर्दभ में  कहा जा सकता है कि सामाजिक सांस्कृतिक विघटन का कारण यह एकल सभ्यता है जो शायद हमारी पहचान भुलाने वाली और डरावनी है।बच्चे बूढ़े सभी प्रताड़ित है ।क्या यह समाजिक विघटन का कारण नही है? कुल मिलाकर देखा जाय तो संयुक्त विचारधारा ही हमारी सभ्यता की रक्षक और सांस्कृति का मार्ग सुदृढ़ करती थी।
यह सामाजिक विखराव विगत दशकों में तेजी से परीलक्षित हुई है।लोग अब सिमट कर अपने में लीन है जिससे सामाजिक विघटन होना स्वभाविक है।हाल के दिनों में यह सामाजिक पतन कुछ विस्तृत रूप में देखने को मिला है।सूयुक्त जीवनशैली अब न के बराबर है।
संयुक्त जीवनशैली में ज्ञान के साथ विभिन्न तरह के त्योहारों का भी ज्ञान मिलता था जिसके बदौलत सामाजिक विकास और संस्कृति का विकास होता था।आज के इस समाज में वैसी परिकल्पना नहीं की जा सकती  जैसा कि दशको पहले था कुल मिलाकर देखा जाय तो आज का दौर सामाजिक विघटन का दौर है जो हमारी संस्कृति को सहेजने में सक्षम नहीं है।
आशुतोष झा
 पटना, बिहार

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