स्वतंत्रता-संग्राम के कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे पंडित मातादीन : त्रिलोचन ढकाल (नेपाल के पूर्व कृषिमंत्री)
नारनौल। किसी एक नेता के कारण नहीं, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं के कारण मिली है भारत को आजादी, जिन्होंने जमीनी स्तर पर संघर्ष करते हुए अनेक यातनाएं झेलीं और बलिदान दिए। यह कहना है नेपाल के पूर्व कृषिमंत्री त्रिलोचन ढकाल का। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित ‘वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय मातादीन-मूर्तिदेवी स्मृति-समारोह’ में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि पंडित मातादीन भी ऐसे ही कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे, स्वतंत्रता-संग्राम और समाज-सेवा के क्षेत्र में जिनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली के सहायक निदेशक डॉ दीपक पांडेय ने पंडित मातादीन का विस्तृत जीवन-परिचय प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रजामंडल आंदोलन का प्रखर योद्धा, समर्पित समाज-सेवी और सुप्रसिद्ध लोक-साहित्यकार बताया। इंडो-नॉर्वेजियन कल्चरल फोरम, ओस्लो (नॉर्वे) के अध्यक्ष तथा ‘स्पाइल दर्पण’ पत्रिका के संपादक डॉ सुरेशचंद्र शुक्ल ने कहां कि नेताओं और पंडित मातादीन जैसे लाखों कार्यकर्ताओं के लंबे संघर्ष के बाद भारत को आजादी तो मिल गई, लेकिन अनेक प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं-‘निरुत्तर आज सभी हैं प्रश्न, उत्तर केवल एक। सूर्य है आज अकेला यहां, अंधियारे के दीप अनेक।’ आईबी के पूर्व सहायक निदेशक तथा पटियाला पंजाब के वरिष्ठ कवि नरेश नाज़ ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में पंडित जी के परिजनों द्वारा उनकी स्मृति में किए जा रहे कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए नई पीढ़ी को संदेश दिया-‘ऊंचे स्वर में ना करो मात-पिता से बात। उनके कद के सामने अपनी क्या औकात।’
साहित्यकार डॉ पंकज गौड़ द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत पंडित जी के सुपुत्र और चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास ‘मानव’ ने बताया कि परिवार द्वारा वर्ष-1999 से निरंतर ऐसा आयोजन किया जा रहा है तथा प्रतिवर्ष देश-विदेश की दो विशिष्ट विभूतियों को 21-21 हजार के ‘मातादीन-मूर्तिदेवी स्मृति-पुरस्कार’ भी प्रदान किए जाते हैं। अपने माता-पिता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक दोहे के माध्यम से उन्होंने कहा- ‘जीवन में जब भी मिले, खुशियां या अवसाद। अम्मा-बाबूजी सदा, रह-रह आए याद।’ इस अवसर पर कवि-सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसमें सभी छह महाद्वीपों और आधा दर्जन देशों के कवियों ने काव्य-पाठ किया। भिवानी (हरि) के विख्यात कवि डॉ रमाकांत शर्मा ने पंडित जी को काव्यांजलि अर्पित करने के उपरांत अपना ‘प्रकृति-वंदना’ गीत प्रस्तुत किया, जिसकी निम्नलिखित पंक्तियों को खूब सराहा गया-‘फूल, पौधे, वनस्पतियां, शैल, निर्झर, प्रकृति मेरी प्रार्थना स्वीकार करना। पिता के आशीष-सी दी छत्रछाया, वृक्ष मेरी वंदना स्वीकार करना।’ सेंटियागो (अमेरिका) की कवयित्री डॉ कमला सिंह ने ‘यूं तो फूल लाखों ही चमन सुंदर बनाते हैं, मगर कुछ खास हैं, जो सुगंध चहुंओर फैलाते हैं।’ कहकर पंडित जी को श्रद्धांजलि अर्पित की, तो पोर्ट ऑफ स्पेन (त्रिनिडाड) की आशा मोर ने, सूर्योदय और सूर्यास्त को मानव-जीवन से जोड़ते हुए, अपनी बात कही-‘जिंदगी के दो पहलू हैं सूर्योदय और सूर्यास्त।जैसे खिलखिलाता बचपन और बुढ़ापा पस्त।’ लागोस (नाइजीरिया) की कवयित्री रेखा बिलंदानी ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा-‘आओ चलो कहें कहानी आजादी के मतवालों की। जहां कमी न थी हिम्मतवालों की।’ इस अवसर पर चितवन (नेपाल) की रचना शर्मा, दादरी (हरि) की पुष्पलता आर्य और अलवर (राज) के संजय पाठक ने भी कविता-पाठ किया।
डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में लगभग अढाई घंटों तक चले इस महत्त्वपूर्ण समारोह में विश्वबैंक, वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) की अर्थशास्त्री डॉ एस अनुकृति और कंसलटेंट प्रो सिद्धार्थ रामलिंगम, नेपाली साहित्य अकादमी, काठमांडू की पत्रिका ‘समकालीन साहित्य’ के संपादक डॉ पुष्करराज भट्ट, पोर्ट ऑफ स्पेन (त्रिनिडाड) के हिंदी-सेवी दिनेश मोर, मुंबई (महाराष्ट्र) के डिप्टी इनकम टैक्स कमिश्नर सुरेश कटारिया, आईआरएस, श्री श्याम महिला महाविद्यालय, भादरा (राज) के प्राचार्य डॉ भीमसिंह सुथार, उत्तराखंड बाल-साहित्य संस्थान, अल्मोड़ा के अध्यक्ष तथा ‘बाल-प्रहरी’ पत्रिका के संपादक उदय किरोला, हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला के पूर्व निदेशक डॉ पूर्णमल गौड़, महेंद्रगढ़ के पूर्व जिला बाल-कल्याण अधिकारी विपिन शर्मा और मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट की ट्रस्टी डॉ कांता भारती के अतिरिक्त जबलपुर (मप्र) की डॉ अंजना संजय, नरपतगंज (बिहार) के डॉ जनार्दन यादव, नेरटी (हिप्र) के रमेशचंद्र मस्ताना तथा हरियाणा से हिसार के डॉ राजेश शर्मा और सुरेश सब्बरवाल तथा नारनौल के डॉ सत्यवीर ‘मानव’, डॉ जितेंद्र भारद्वाज और कृष्णकुमार शर्मा, एडवोकेट की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही।


