सफलता में बाधक होता है हमारा नकारात्मक विश्वास : सीताराम गुप्ता
सीताराम गुप्ता, पीतमपुरा । हेनरी फोर्ड ने कहा है कि अगर आपको विश्वास है कि आप सफल हो सकते हैं तो आप सही हैं और अगर आपको विश्वास है कि आप सफल नहीं हो सकते तो भी आप सही हैं। हमारा विश्वास ही सफलता प्रदान करता है और हमारा विश्वास ही असफलता प्रदान करता है लेकिन दोनों प्रकार के विश्वासों में अंतर होता है। एक सकारात्मक विश्वास है तो दूसरा नकारात्मक विश्वास। सकारात्मक विश्वास सफलता प्रदान करने में सक्षम है तो नकारात्मक विश्वास असफलता के लिए उत्तरदायी है। कल ऑफिस जाने के लिए जैसे ही घर से निकले बरसात हो गई और सारे कपड़े खराब हो गए जिससे दिन भर परेशानी होती रही। लेकिन इसका ये अर्थ तो नहीं कि आज भी वैसा ही होगा या हमेशा ही ऐसा होता रहेगा। क्या ऐसा सोच कर ऑफिस जाना ही छोड़ दिया जाए? जहां प्रायः रोज़ बारिश होती है वहां भी लोग काम पर जाते ही हैं।
एक बार वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया। उन्होंने एक एक्वेरियम में एक बड़ी पाइक मछली को रखा और उसी एक्वेरियम में उसके खाने के लिए कुछ छोटी मछलियां रख दीं। जब भी बड़ी पाइक मछली को भूख लगती वो छोटी मछलियां खा लेती। कुछ दिनों बाद जब एक्वेरियम में सारी छोटी मछलियां समाप्त हो गईं तो वैज्ञानिकों ने एक्वेरियम के बीच में कांच की एक दीवार लगा दी और दीवार के दूसरी तरफ पहले जैसी ही छोटी मछलियां डाल दीं। अब बड़ी पाइक मछली को जब भूख लगती वो छोटी मछलियों की ओर लपकती लेकिन बीच में कांच की दीवार होने के कारण उससे जा टकराती जिससे हर बार उसे चोट लगती। कुछ समय तक तो ये सिलसिला जारी रहा लेकिन बार-बार चोट लगने और छोटी मछलियों तक न पहुंच पाने के कारण बड़ी पाइक मछली ने कांच की दीवार के पार तैरती छोटी मछलियों को खाने की कोशिश करना ही छोड़ दिया।
बड़ी पाइक मछली भूख से बुरी तरह व्याकुल थी लेकिन आगे उसने अपनी भूख मिटाने के लिए किसी तरह का कोई प्रयास नहीं किया और चुपचाप एक कोने में जा कर ठहर गई। जब वह भूख के कारण अत्यंत व्याकुल अवस्था में पहुंच गई तो वैज्ञानिकों ने एक्वेरयम के बीच में लगाई गई कांच की दीवार को हटा दिया। अब बड़ी पाइक मछली आसानी से छोटी मछलियों को अपना आहार बना सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और कुछ दिनों के बाद वह भूख से तड़प-तड़पकर मर गई। प्रश्न उठता है कि बाद में वहां पर्याप्त संख्या में छोटी मछलियां होने पर भी बड़ी पाइक मछली ने उन्हें अपना शिकार क्यों नहीं बनाया? वास्तव में पहले अनेक कोशिशों में असफल व घायल होने के कारण बड़ी पाइक मछली ने मान लिया कि अब कोई कोशिश काम नहीं आएगी। एक नकारात्मक विश्वास के लिए उसकी कंडीशनिंग हो गई और इस नकारात्मक विश्वास ने ही उसकी जान ले ली।
जीवन में हमारे साथ भी कई बार ऐसा ही होता है। हम भी भूतकाल के निराशादायक व दुखद अनुभवों के कारण नकारात्मक विश्वास से ग्रस्त हो जाते हैं। हमें लगता है कि सफलता अथवा आरोग्य हमारी किस्मत में ही नहीं है अतः प्रयास करना बेकार है। इसी कारण जब सफलता अथवा उन्नति का कोई अवसर हमारे सामने आता भी है तो उसे गुज़र जाने देते हैं। क्यों? क्योंकि हमें विश्वास हो जाता है कि पिछले अनुभवों के विपरीत कुछ नहीं हो सकता और समय के साथ ये विश्वास दृढ़ होता जाता है। इस नकारात्मक विश्वास के लिए हमारी कंडीशनिंग हो जाती है। इसी प्रकार के नकारात्मक विश्वासों के कारण ही हम जीवन में आगे नहीं बढ़ पाते अथवा उत्कृष्टता से कोसों दूर रह जाते हैं या व्याधियों का उपचार नहीं करते अथवा दवाएं नहीं लेते। अब प्रश्न उठता है कि इस स्थिति से उबरने के लिए क्या करें?
इसके लिए हमें अपनी नकारात्मक कंडीशनिंग को तोड़ना पड़ेगा। सबसे पहले तो ये बात मन में बिठानी होगी कि हम पाइक मछली नहीं हैं। पाइक मछली कांच की दीवार को नहीं तोड़ सकती लेकिन हम कांच की दीवार रूपी बाधाओं को आसानी से ध्वस्त कर सकते हैं। रुकावटों को समझना और उन्हें दूर करना ही वास्तविक सफलता है। कई बार कुछ अवरोध लंबे समय तक बने रह सकते हैं लेकिन इसका ये अर्थ कदापि नहीं कि ये अवरोध हटेंगे ही नहीं या इन्हें कभी भी पार नहीं किया जा सकेगा। अवरोध हटने या उन्हें पार करने की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। हमें धैर्य के साथ उनके हटने की प्रतीक्षा करने के साथ-साथ उन्हें पार करने के लिए कोशिश करते रहना चाहिए। यदि अत्यधिक विषम परिस्थितियों के कारण हम कुछ अधिक नहीं कर पाते तो उन परिस्थितियों के बदलने पर हमें फौरन सक्रिय हो जाना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि हम सतर्क रहकर घटनाक्रम की पूरी जानकारी रखें।
लोहा गरम होने तक इंतज़ार करें और जैसे ही लोहा गरम हो जाए उस पर चोट करें अर्थात् जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल हों हम अपेक्षित प्रतिक्रिया करें। हमारी जो प्रारंभिक असफलताएं होती हैं वे असफलताएं नहीं सफलता के मार्ग के पड़ाव होते हैं। हमारी असफलताएं ही हमारी सफलता की नींव के पत्थर बनती हैं इसलिए ज़रूरी है कि असफलता की पीड़ा को भुलाकर हर बार नए सिरे से प्रयास करने का निर्णय लें। व्यवसाय हो अथवा संबंध या स्वास्थ्य अथवा रोगमुक्ति जीवन के हर क्षेत्र में यही बात लागू होती है। पहले जिन लोगों को टीबी अथवा क्षय रोग हो जाता था उसकी मृत्यु निश्चित थी लेकिन आज इस बीमारी का उपचार न केवल पूरी तरह से संभव हो गया है अपितु सरल भी हो गया है।
यदि टीबी अथवा क्षय रोग होने पर हम उस समय का हवाला देकर कहें कि इस रोग का उपचार असंभव था और उपचार न करें अथवा बीच में ही छोड़ दें तो इसके लिए कौन दोषी होगा? हमारा नकारात्मक विश्वास ही इसके लिए उत्तरदायी होगा। कई लोग बड़े ज़िद्दी होते हैं। उन्हें लाख समझाओ लेकिन कहते रहेंगे कि ये काम तो वे बिल्कुल नहीं कर सकते। ये उनके भूतकाल के निराशादायक व दुखद अनुभवों के कारण भी हो सकता है। कुछ लोग जीवन में बार-बार धोखा खा चुके होते हैं अतः एक तरह से उनका ये विश्वास ठीक भी है लेकिन है ये पूरी तरह से नकारात्मक विश्वास। इसी नकारात्मक विश्वास के कारण वे अपना दृष्टिकोण बदलने को तैयार नहीं होते और जीवन में अनेक संभावनाओं से वंचित रह जाते हैं। जीवन हमेशा संभावनों से पूर्ण होता है लेकिन तभी जब हम भूतकाल के निराशादायक व दुखद अनुभवों से उत्पन्न नकारात्मक विश्वास को अपने अंदर घर न करने दें।
कुछ व्यक्ति जब कोई नया काम करते हैं अथवा कोई नई चीज़ करना सीखते हैं तो शीघ्र अपेक्षित सफलता न मिलने पर उसे हमेशा के लिए छोड़ देते हैं। जब हम स्कूटर, कार अथवा अन्य वाहन चलाना सीखते हैं तो शुरू में कई समस्याएं आ खड़ी होती हैं। कई बार वाहन चलाते समय हड़बड़ी में कुछ गलती भी हो जाती है। सही समय पर ब्रेक नहीं लगा पाते अथवा गाड़ी की गति धीमी नहीं कर पाते। ड्राइविंग सीखते समय छोटी-मोटी दुर्घटना भी स्वाभाविक है। यदि ड्राइविंग सीखते समय कोई छोटी-मोटी दुर्घटना हो जाए तो कई लोग उसी वक़्त हाथ खड़े कर देते हैं। उनका तर्क होता है कि उनसे फिर कोई दुर्घटना हो जाएगी। ये उनके नकारात्मक विश्वास के कारण ही होता है। नकारात्मक विश्वास उत्पन्न करने में कई बार हमारे अपने कटु अनुभव उत्तरदायी होते हैं तो कई बार हमारे आसपास के लोग भी इसके लिए कम उत्तरदायी नहीं होते।
जब हम लोगों से बार-बार सुनते हैं कि ये तुमसे नहीं होगा या ये तुम्हारे करने की चीज़ नहीं है तो हममें नकारात्मक विश्वास उत्पन्न होने लगता है। नकारात्मक विश्वास के कारण कई बार हम सीखी हुई चीज़ भी भूल जाते हैं। एक घटना याद आ रही है। एक सज्जन ने अपनी भतीजी को कार चलानी सिखाई। पहले एक प्रसिद्ध ड्राइविंग कॉलेज से ड्राइविंग सिखलाई और बाद में स्वयं पर्याप्त अभ्यास करवाया। लड़की कार चलाने में बहुत अच्छी हो गई और स्वयं अकेले ड्राइविंग करने लगी लेकिन लड़की के पिता प्रायः कहते थे कि जब हमारे पास कार ही नहीं है तो सीखने का क्या फायदा? या कहते थे कि किसी दिन ठोक दी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। कुछ दिनों में ही लड़की के अंदर इतना नकारात्मक विश्वास उत्पन्न हो गया कि वो गाड़ी को छूने से भी डरने लगी। जो भी हो हर प्रकार के नकारात्मक विश्वास की कंडीशनिंग से मुक्ति अनिवार्य है क्योंकि इसका जीवन के हर क्षेत्र में बुरा प्रभाव पड़ता है।
कई बार जीवन में मिली लगातार असफलताओं के बाद व्यक्ति प्रयास करना ही छोड़ देता है लेकिन तभी अचानक एक दिन उसे बड़ी सफलता मिल जाती है। कई लोग इसे किस्मत से मिली सफलता कहते हैं लेकिन वास्तव में ये पिछले प्रयासों अथवा असफलताओं के अनुभवों के कारण ही संभव हो पाता है। बहरहाल हमें असफलताओं से घबराकर न तो आगे प्रयास करना छोड़ना चाहिए और न ही असफलताओं को दोष देना चाहिए। जब हम किसी शिलाखंड को तोड़ना चाहते हैं तो उस पर ज़ोर से वार करते हैं लेकिन प्रायः पहले वार में पत्थर नहीं टूटता। हम जब तक पत्थर टूट नहीं जाता उस पर हथौड़ा चलाते रहते हैं और इसका कारण है हमारा सकारात्मक विश्वास कि पत्थर अंततः किसी न किसी वार से अवश्य टूट जाएगा।
इसलिए जब तक सफलता नहीं मिल जाती तब तक कार्य बीच में छोड़ने की बजाय निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। परिणाम मिलते अवश्य हैं लेकिन कई बार देर से मिलते हैं। हमें अपेक्षित परिणाम अथवा सफलता मिलने तक धैर्य के साथ अपने कार्य में जुटे रहना चाहिए। जीवन में हर प्रकार की सफलता के लिए असंभव शब्द को मन रूपी शब्दकोश से डिलीट करना अनिवार्य है। नकारात्मक विश्वास से मुक्ति के लिए हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यदि दुनिया में कोई भी काम कोई भी व्यक्ति कर सकता है तो हम भी उसे अवश्य कर सकते हैं। नकारात्मक विश्वास से बचने के लिए किसी भी कार्य को सीखने के लिए पर्याप्त अभ्यास करें, कार्य को पूरे मन से करें व मन में पूर्ण विश्वास रखें कि मैं कर सकता हूँ। मैं भी सफलता प्राप्त कर सकता हूं।

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