सुख- समृद्धि एवं आरोग्यता के लिए 20 अक्टूबर को शरदपूर्णिमा व्रत : आचार्य राधाकान्त शास्त्री
आचार्य राधाकान्त शास्त्री ।19 अक्टूबर मंगलवार को रात्रि 6:44 बजे से शरद पूर्णिमा लग रही है जिसमे इस दिन का चंद्रोदय चतुर्दशी में ही हो जा रहा है और 20 अक्टूबर बुधवार का चंद्रोदय कालिक पूर्णिमा हो रही है अतः आश्विन मास की शरद पूर्णिमा 20 अक्टूबर बुधवार को ही मान्य और प्रसस्त है। इस दिन पूर्णिमा में चंद्रोदय होने से सम्पूर्ण रात्रि पर्यन्त पूर्णिमा मान्य होगा।
यह पूर्णिमा धार्मिक दृष्टि से खास महत्व वाली है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात ऐरावत पर बैठ कर देवराज इन्द्र महालक्ष्मी के साथ धरती पर आते हैं और पूछते हैं कि कौन जाग रहा है। जो जाग रहा होता है और उनका स्मरण कर रहा होता है, उसे ही लक्ष्मी और इन्द्र की कृपा प्राप्त होती है। शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी जी और इंद्र कुबेर के पूजा का विशेष महत्व है।
शरद पूर्णिमा को ही श्री राधा कृष्ण ने महारास लीला किया था अतः उसे प्रेम प्रेम पूर्णिमा भी कहा जा सकता है।
श्रीकृष्ण-राधा के साथ समस्त प्राणियों को शरद पूर्णिमा का बहुत हार्दिक प्रतीक्षा होता है। इस दिन से ही देवता, मनुष्य, और पशु-पक्षी, सबके जीवन मे नृत्य का जन्म हुआ।
मधुर संगीत में चंद्र देव पूरी 16 कलाओं के साथ इस रात सभी लोकों को तृप्त करते हैं। आकाश में इनका एकक्षत्र राज होता है इस दिन उनका 27 नक्षत्र उनकी पत्नियां उनके साथ होती हैं- रोहिणी, कृतिका आदि। रातभर उनकी मुस्कराहट संगीतमय नृत्य करती हैं। जड़-चेतन, सब के सब मंत्रमुग्ध रहते हैं। राधा के एकनिष्ठ कृष्ण इस बात को जानते थे, इसलिए इसी दिन उन्होंने महारास रचाया था। गोपियां विरह में थीं, तो आश्विन शुक्ल पक्ष में चंद्रदेव उन्हें और विरह प्रदान कर रहे थे। आश्विन पूर्णिमा हुई और किसी तरह गोपियों का दिन बीता। रात हुई तो चंद्र देव ने अपना जादू चलाया और उधर से बांसुरी की मनमोहक तान, इस महारास का श्रीमद्भागवत में मनमोहक वर्णन भी है। देवी-देवताओं में होड़ लगी है। सब विमान में सवार होकर एकटक देख रहे हैं। गोपियों के ऐसे भाग्य से चंद्रदेव और उनकी सभी पत्नियां बार-बार गोपियों के जन्म को ही सार्थक मान रही हैं। हां, अपने को धन्य मान भी रही हैं कि भगवान की लीला में उनका भी योगदान है। भगवान धीरे-धीरे नाच रहे हैं। गोपियां गा रही हैं
इस दिन को रास पूर्णिमा और कौमुदी महोत्सव भी कहते हैं। महारास के अलावा इस पूर्णिमा का अन्य धार्मिक महत्व भी है, जैसे शरद पूर्णिमा में रात को गाय के दूध से बनी खीर या केवल दूध छत पर रखने का प्रचलन है। ऐसी मान्यता है कि चंद्र देव के द्वारा बरसायी जा रही अमृत की बूंदें खीर या दूध को अमृत से भर देती है। इस खीर में गाय का घी भी मिलाया जाता है।
इस रात मध्य आकाश में स्थित चंद्रमा की पूजा करने का विधान भी है, जिसमें उन्हें पूजा के अन्त में अर्ध्य भी दिया जाता है। भोग भी भगवान को इसी मध्य रात्रि में लगाया जाता है। इसे परिवार के बीच में बांटकर खाया जाता है प्रसाद के रूप में, सुबह स्नान-ध्यान-पूजा पाठ करने के बाद। लक्ष्मी जी के भाई चंद्रमा इस रात पूजा-पाठ करने वालों को शीघ्रता से फल देते हैं। अगर शरीर साथ दे, तो इस दिन योग्य आचार्य के साथ मृतसंजीवनी साधना, कनकधारा साधना से सभी ऋण रोग शोक संकट नष्ट हो जाते हैं। माता लक्ष्मी, इंद्र कुबेर और शिव उपासना से इष्टदेवता प्रसन्न होते हैं।इस दिन की पूजा में कुलदेवी या कुलदेवता के साथ गणेश और चंद्रदेव की पूजा भी आवश्यक होता है।
श्री लक्ष्मी गणेश , इंद्र कुबेर के साथ भगवान महामृत्युंजय की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।

*✍🏻 ज्योतिषाचार्य आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
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