कल शनिवार प्रातः 7 बजे से श्री कृष्ण की पूजन कर गोधन कूटा जाएगा, मनाया जाएगा भैया दूज एवं चित्रगुप्त पूजा:

*आचार्य राधाकान्त शास्त्री* कल गोधन का माँगलिक श्रृँगार पूजन कर बहनों के द्वारा भाइयों को शाप देकर, पुनः शाप मुक्त किया जाएगा। और उनको लंबी उम्र का आशीष देकर गोधन कूटा जाएगा।
साथ ही गोधन कूटने के बाद सभी मांगलिक शुभ कार्य आरंभ हो जाता है। इस दिन से ही कुँवारी कन्याओं के पिता उनके योग्य वर की तलाश में निकलते हैं। या विवाह सुनिश्चित करते हैं। सारे शुभ कामों का आरंभ भी गोधन के बाद से ही किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी से चार माहीने पूर्व देव शयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु व अन्य देवता लोग सोने चले जाते हैं इसीलिए इन चार महीनों में शादी, ब्याह, मुंडन आदि माँगलिक संस्कार नहीं किए जाते। ये सारे कार्य देवप्रबोधिनी या देव उठानी एकादशी के बाद शुरू होते है,
गोधन के दिन युवतियाँ एक साथ मिलकर मूसल से उस सजे-सजाए गोधन को कूटती हैं। कूटने के बाद हर घर के लड़के कूटे हुए गोबर वाले गोधन को अपने अपने घर ले जाते जिसे बाद में पिंडी बनाकर सुखाया जाता और अनाज के ढेर में रखा जाता ताकि घर में बुरी ताकतें न उत्त्पन्न हो और सत्य संकल्प से अन्न और धन में लगातार बढ़ोत्तरी होती रहे।
गोधन की कथा :-
गोधन एक दैत्य था जिसने यमुना नदी पर गोवर्धन पूजन में आये गोप गोपियों को घेर लिया और उन सबको अपनी व्याहता बनाने के के लिए उनके भाइयों को बोला जिससे उसके बल से डर कर भाइयों ने उसकी दासता स्वीकार कर ली उन सब ने विरोध किया लेकिन उस दैत्य के डर से वे उनकी बात मान गए। दैत्य को इस बात का सहज विश्वास नहीं हुआ तो उसने उन गोपियों से कहा कि तुम लोग अपने भाइयों को खूब श्राप दो इन्होंने तुम सबको हमें दे दिया है। गोधन दैत्य के कहे अनुसार गोपियों ने भटकोईया, भँडभाँड आदि बनस्पतियाँ इकट्ठा किया और एकत्रित होकर अपने भाइयों को श्राप दिया। और उन्होंने एक साथ मिलकर गोधन नामक दैत्य को खूब कूटा। इतना कूटा कि वो अधमरा हो गया। मृत्यु की अंतिम अवस्था में अपने को बचाने के लिए श्री कृष्ण को पुकारने लगा तब श्री कृष्ण भगवान आए और उन्होंने गोधन की अंतिम इच्छा जाननी चाही तो गोधन ने कहा कि अंत समय मे आपके दर्शन से मेरा मोक्ष हो जाये, मैंने किसी भी नारी का स्पर्श नही किया हूँ ये सब पवित्र हैं। मैं कुँवारा ही मर रहा हूँ। मेरा किसी स्त्री से कोई संपर्क नहीं रहा, इसलिए स्त्री लोभ का मैंने ये घृणित कर्म किया और इस अवस्था को प्राप्त हुआ।
कृष्ण ने कहा की तुम परेशान न हो, तुम्हारी मृत्यु के बाद भी तुम्हारी पूजा होगी। कुँवारी कन्याएँ तुम्हारी नग्न प्रतिमा बनाकर तुम्हें मूसल से कूटकर अपने भाइयों को दिए हुए श्राप का पश्चाताप करेंगी और तुम्हें भी तब कन्याओं का साहचर्य मिलेगा। और गोबर से बने तुम्हारे शरीर के कूटे हुए हिस्सों का गोल पिंड बनाकर लोग अनाज के ढेर में रखेंगे। और श्री कृष्ण ने सभी गोपियों से भाइयों को दिए गए शाप वापस लेकर भाइयों को बहुत सारा आशीर्वाद दिलाया।
तभी से गोधन कूटने की परंपरा चल पड़ी। गोबर से बनाए गोधन के देह के हिस्से का गोल पिंड बनाकर खलिहान के या घर की देहरी में रखे अनाज के ढेर में रखने का चलन भी शुरू हो गया।
युवतियाँ गोधन को कूटने के बाद जल का अर्घ्य देकर अपने भाई को अशीष गीत गातीं है।
यम और उनकी बहन यमुना की पूजा का महत्व
भैयादूज के दिन यमराज तथा यमुना जी के पूजन का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन ही यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर बुलाकर सत्कार करके भोजन कराया था। इसीलिए, इस त्योहार को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यमराज ने प्रसन्न होकर यमुना को वर दिया था कि जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके यम का पूजन करेगा, मृत्यु के बाद उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ेगा।
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहे। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया। यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया।
यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता।
भैया दूज ,अन्नकूट , एवं चित्रगुप्त पूजा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामना …

*आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*✍🏻 ज्योतिषाचार्य*
*आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*🌹शुभम बिहार यज्ञ ज्योतिष आश्रम*🌹*
*रजिस्टार कालोनी , पश्चिम करगहिया रोड कालीबाग बेतिया- 845438 (बिहार)*
*Whatsaap No. 9934428775,*
*7004427683*
*कॉल से संपर्क समय- रात्रि 8 से 11 तक*
*।। भवेत सर्वदा शुभ मंगलम् ।।*

