“महतारी हर रुप में वन्दित” : इन्दु तोदी
” महतारी हर रुप में वन्दित “
माँ शब्द एकाक्षर निर्मित
जिस में ब्रह्माण्ड समाहित
जनहित का सन्देश यह
जनजीवन इस से प्रभावित
सुमन सुधा रस सी धारा
नित निर्मल सरिता सी प्रवाहित
नवग्रह नभ प्रति क्षण संचारित
संस्कार सभ्यता जग में स्थापित
सुरक्षा कवच ढाल सी बन रहती
निशदिन विपदासे करे सुरक्षित
अज्ञानता का तिमिर मिटाकर
जीवन करती हरपल आलोकित
प्रेम करुणारस की अविरलधारा
धरती के कण कण मे व्यापित
वेद पुराण अपूर्ण हैं तुझ बिन
ग्रन्थ काब्य मे रहे सुशोभित
विधाता ने रची रचना अनुपम
जिससे सब माँ नाम से परिचित
त्रिदेव त्रिलोक की जन्मदात्री !
महतारी ! हर रुपमे है वन्दित !!



