मन की सूनी देहरी पर मीलों फैले सन्नाटे में, तुम्हारे होने की आहट देती है मुझे कितना सुकून : राजन
राजकुमार जैन राजन की प्रेम कविताएं

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के गाँव आकोला के निवासी राजकुमार जैन राजन बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार हैं, जो तीन दशक से भी अधिक समय से निरंतर सृजनरत हैं। इन्होंने रचनात्मक पहचान के जरिए अपनी अखिल भारतीय छवि बनाई है। ’भारतीय जीवन बीमा निगम’ से जुड़े राजन जी द्वारा बाल साहित्य उन्नयन व संवर्धन के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। लेखन के क्षेत्र में विशिष्ठ उपलब्धियों एवं रचनात्मकता के लिए ‘महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन’, राजस्थान सरकार सहित देश की कई संस्थाओं द्वारा 100 से भी ज्यादा पुरस्कारों/ सम्मानों से नवाजा जा चुका है। आपकी 36 बाल साहित्य पुस्तकों सहित अब तक कुल 41 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । ’सबसे अच्छा उपहार’, ’जन्मदिन का उपहार’ , ’मन के जीते जीत’ ‘पेड़ लगाओ’ (बाल साहित्य) ‘खोजना होगा अमृत कलश’, ‘सपनों के सच होने तक’ एवं ‘मौन क्यों रहें’ (कविता संग्रह) एवं ‘जीना इसी का नाम है’ (आलेख संग्रह) आपकी चर्चित कृतियाँ हैं। आपकी पुस्तकों का अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, गुजराती, उड़िया, असमिया सहित ‘नेपाली’ (नेपाल), ‘सिंहली’ (श्रीलंका) एवं ‘चीनी’ (चीन) भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कई पत्रिकाओं के ‘बाल साहित्य विशेषांक भी आपके कुशल संपादन में प्रकाशित हुए हैं।
प्रतिवर्ष बाल साहित्य के लिए ‘राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी बाल साहित्य पुरस्कार’, ’डॉ. राष्ट्रबन्धु स्मृति वरिष्ठ बाल साहित्यकार सम्मान’, ’श्रीप्रसाद स्मृति बाल साहित्य सम्मान’, ’श्रीमती इंदिरा देवी हींगड़ स्मृति बाल साहित्य सम्मान’, ’श्रीबालाशौरी रेड्डी स्मृति बाल साहित्य सम्मान’ सहित आप कई पुरस्कार/सम्मान भव्य समारोह आयोजित कर प्रदान करते हैं। इनकी रचनाओं का कई वर्षों से आकाशवाणीव विभिन्न टी.वी.चैनल से नियमित प्रसारण हो रहा है।
आपने पुस्तक प्रकाशन के लिए अनुदान देने के साथ ही हिन्दी बाल साहित्य की पुस्तकों का देश की अन्य भाषाओं में प्रकाशन करवा कर अनुवाद को भी बढ़ावा दिया है। पठन-पाठन की परंपरा को बढ़ावा देने के लिए आप देश के विभिन्न राज्यों में स्थित पुस्कालयों/ शोध संस्थानों/ विद्यार्थियों/ शोधार्थियों को अभी तक दस लाख रुपयों से अधिक मूल्य की साहित्य की पुस्तकें निःशुल्क भेंट कर चुके हैं। यह क्रम अनवरत जारी है। आप कई पत्र-पत्रिकाओं को मुक्त हस्त सहयोग भी प्रदान कर रहे हैं। एक विशिष्ट पहचान रखने के बावजूद भी आप सदैव जमीन से जुड़े सामान्य व्यक्ति के रूप में रहना पसंद करते हैं।
साहित्य, शिक्षा, सेवा के क्षैत्र में लगातार कार्य होता रहे इस उद्देश्य के लिए आपने ‘राजकुमार जैन राजन फाउण्डेशन’ की स्थापना की है एवं देश की कई सामाजिक, साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं। वर्तमान में ‘संगिनी’, ‘साहित्य गूँजन’ एवं ‘सृजन महोत्सव’ पत्रिकाओं का सम्पादन कर रहे हैं। ‘ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ के आप आजीवन सदस्य हैं
प्रेम
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कुछ अज़ीब सा
रिश्ता बंधने लगा है
मेरे और तुम्हारे बीच
जब से तुम
‘पूनम’ का चाँद बन
आई हो जीवन में मेरे
शून्य-से इस जीवन में
दिखाई देने लगी शीतल रोशनी
आत्म बंधन के साथ
देह नहीं हो तुम
मेरे लिए,
अंजुरी भर चाँदनी
ओढ़ा दूँ जिसे
प्रेम की जड़ों में
स्नेह, समर्पण, विश्वास का
पानी दूँ
तुम्हारा मिलना
गहन रहस्य से भरा है
जिसे ढूंढ़ने की इच्छा
बलवती होने लगी है
प्रेम जताना नहीं आता मुझे
बस, जीना जानता हूँ
मौन चाहता है
गहरी संवेदनाओं पर
अपना अधिकार
सुरक्षित रखना
मेरा प्रेम रेत के कण नहीं
जो यों ही बिखर जाएंगे
हमने आशाएं पाली है
आँखों में सपने लिए
हमारा प्रेम पूर्णता तक
पहुँच ही जायेगा
पूनम का चाँद
शक्ति पुंज बन कर देगा
हमें लावण्य
जहाँ आनन्द होगा
सत्य होगा, मुक्ति होगी
और होगा
आत्मा से आत्मा का मिलन!
◆●◆●◆●
◆ अनुष्ठान
~~~~~~
जब से लौट गई हो तुम
मेरे पास से
मेरी संवेदनाएं बौनी ही नहीं
अस्तित्वहीन हो गई है
बहुत कठिन है
सत्य की तलाश
जुड़ गए हैं तार कहीं से
अपनी संवेदनाओं के
शायद इसी लिये
महसूस करता हूँ
तुम्हारे प्यार की ख़ुशबू
जो मेरी आत्मा तक फैल गई है
जब-जब बैठी थी तुम
पास मेरे
अहसास हुआ मुझे
एक स्फुरण
अपनी सुप्त चेतना में
कुछ नये सृजन के लिए
जीवन के यथार्थ से
सहमत होकर
बहती रही
अपनी लय में नदी-सी तुम
सुनाई देता था जीवन-राग
इसी लिए ही
महसूस होता है मुझे
मिल गई थी तुम मेरी साँसों में
ख़ुशबू की तरह
गहरे और गम्भीर
जब से लौट गई हो तुम
मेरे पास से
बहुत उद्धिग्न है मेरा मन
कचोटने लगी है अनेक पीड़ाएं
समय की दहलीज़ पर
मैं लौट आऊंगा तुम तक
तुम और मैं … मिलेंगे वहाँ
जहाँ मैं और तुम नहीं होंगे
सिर्फ हम होंगे
आत्म शांति का अनुष्ठान
संपन्न होगा फिर से !
●◆●◆
● देह गन्ध ●
~~~~~~
मन की सूनी देहरी पर
मीलों फैले सन्नाटे में
तुम्हारे होने की आहट
देती है मुझे
कितना सुकून
जैसे हो ठंडक भरी
टेसू की आग
आसमान भी
पैरों में आ जाता
थोड़े बादलों के साथ
आसक्ति के उन क्षणों को
जैसे त्यौहार करने
जितनी बार
मैं तुमसे मिलता हूँ
यूं लगता है जैसे
तुम स्वयं ही
मेरी तलाश में होती हो
तुम्हारी देह से उठती गन्ध
लिख रही इतिहास
मुक्ति के क्षण का
मेरी हर सांस, हर दृष्टि
महसूसना चाहती है
उस सम्मोहन को
जिसमें प्यार का बिरवा
जवान हुआ था
जलते हुए खव्वाबों की
तपिश मैंने
अक्सर महसूस की
जो दहक उठी थी
हमारे प्रथम मिलन पर
जब मन पर लगे
नियंत्रण हटे
उमड़ा था आवेग
बिना रुके शबनम की
बूंदों जैसा
पिघलते रहे हम
कतरा – कतरा !
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● चुपचाप ●
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उस गुलाबी शाम में
पुरवाई
उन्मुक्त -सी
खुशबूदार झोंकों के संग
बह रही थी
और हम….
बुन रहे थे सपने
चुपचाप
कहीं
क्षितिज के आस-पास
आँखों में
पल रहे थे ख्वाब
तुम
एलबम की तस्वीरों से
अपनी यादों को
ताज़ा कर रही थी
अपनी आँखों में उगे
कुसुम के सहारे
और मैं पिघल रहा था
तुम्हारी कोमल हथेलियों में
मोम की तरह
लहलहा रही है
इन आँखों के भीतर
एक उन्मुक्त झील
जिसमें
मेरी उम्र जमकर
बर्फ हो गई है!
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● चलो, फिर से जी लें ●
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तुमने दिए थे जो
गुलाब
आज भी सहेज रखे हैं मैंने
अपने दिल की किताब में
जिसकी खुशबू
यादें बन महकती रहती है
हर पल
अच्छा लगता था
तुम्हारे इंतज़ार में
भावपूर्ण प्रेम-पत्र लिखना
पढ़कर उन्हें
कई-कई बार
खुद ही
मन्द-मन्द मुस्करा देना
जब दर्द का
कोई अहसास
उतरता था दिल में
एक मासूम-सी ख्वाहिश बन
हर खुशी को समेटे
तुम चले आते थे
मेरे मन के द्वार पर
खोई मोहब्बत
दबे पाँव आ धमकती है
दिल के सुने कोनों में
जज्बात के ताने-बाने
समेटकर कर
पुराने पड़ चुके प्रेम पत्रों को
फिर से सहेज लें
समय की उधेड़बुन में
हम खो न जाएं
चलो, फिर से जी लें
प्यार के उन पलों को
जो दिल में सजे सपनों को
सावन-सा महका दे
इस जीवन में
चमक भर दे सितारों-सी
फ़िर से
चलो एक बार जी लें।
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■ राजकुमार जैन राजन
चित्रा प्रकाशन
आकोला-,312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान
मोबाइल: 9828219919
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