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बढती तलाक की तालिका

 

कञ्चना झा:शादी में उच्चरण किएजाने वाले पवित्र मन्त्रों को आपने भी जरूर सुना होगा, यदि आप शादीशुदा हैं तो। यह कोई साधारण मन्त्र नहीं, वरन दो लोगों को बाँधता है यह मन्त्र जन्मों जन्मों के बन्धन में। यह पवित्र बन्धन है विवाह जिसमें दो लोग अलग-अलग परिवेश और तौर तरीके से आते तो हैं लेकिन सामन्जस्य और तालमेल का मिलाप कर एक सुन्दर और सफल दम्पति बनते हुए एक मिसाल देतें है पति पत्नी के इस रिश्ते को। यह रिश्ता बनाते समयर् इश्वर, मातापिता और रिश्तेदारों को साक्षी मानकर कन्या दूल्हे को कहती है कि तुम मेरे स्वामी हो और आज से मैं अपने आप को तुम्हे अर्पित करती हूँ। इस मन्त्र को पढÞने से पहले दूल्हा कहता है की मैं तुम्हे कभी धोखा नहींँ दूंगा और दोनों कसम खातें है इस संबन्ध को जन्म जन्मान्तर तक आगे बढÞाने के लिए। लेकिन ३२ वषर्ीया मधु -नाम परिर्वतन) अब इस वैवाहिक संबन्ध को आगे नहीँ बढÞाना चाहती है।talak in nepal

कुछ दिन पहले उसने काठमांडू जिल्ल्ाा अदालत में तलाक के लिए अर्जी दे दी है। वह कहती है – रिश्ता चुभने लगे तो उसे तोडÞ देना ही अच्छा है। काठमांडू कमलपोखर ी के एक व्यापारी घराने की मधु का करीब दश वर्षपहले विवाह हुआ था। काफी दहेज लिया था ससुरालवालों ने। लडका इन्जिनियर था, बहुत धूमधाम से शादी हर्ुइ। इतना ही नहीं मधु के दो भाइयों ने भविष्य को सोचकर मधु के नाम पर बहुत सारा पैसा भी बैंक में जमा कर दिया। कुछ दिन तक सब ठीक-ठाक रहा लेकिन इन्जिनियर होते हुए भी बेरोजगार मधु के पति की आदतें अब दिखाई देने लगी थी। वह ड्रग्स का आदी था। मधु कई बार उसे रिहाब्लटेसन सेन्टर में भी ले गयी। लेकिन सफलता हाथ न लगी। कई बार बाजारू औरत के साथ उसे पुलिस ने पकडÞा। लेकिन मधु सब कुछ सहती रही यह सोचकर कि समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। दूसरी तरफ बेर ोजगार पति को जब मालूम पडÞा की मधु के नाम पर ढÞेर सारे पैसे उसके घरवालों ने बैंक में जमा कर रखा है तो वो मधु पर दबाब डÞालने लगा। अब तक दो बच्चों की माँ बन चुकी मधु ने भविष्य के प्रति सशंकित बनते हुए पैसा देने से इनकार कर दिया और नौबत यहाँ तक आ गई कि ससुराल वालों ने मधु के चरित्र को लेकर बहुत सी अनाप सनाप बातें की। और इससे भी बात न बनी तो जला कर मार देने की योजना बनायीर्।

इश्वर की ही कृपा कहें मधु को यह पता चल गया ,और अभी वह मायके में रह रही है। ससुराल में न तो वह सुरक्षित है न तो उसके दोनों बच्चे। और अब उसने फैसला कर लिया है कि वह जिन्दगी को अकेले आगे बढÞाएगी। वह कहती है कि अब तो बस इन्तजार है अदालत के फैसले का। जन्म जन्मान्तर का संबन्ध, सात जन्मों का बन्धन क्या बोझ बनने लगा है आजकल – हर दश में एक रिश्ता तलाक में बदल रहा है। कहीं पर कानूनी तो कहीं पर व्यावहारिक रूप से। चाहे हिन्दू हो या इस्लाम या इर्साई सभी धर्मो में विवाह को बहुत ही पवित्र संस् था माना गया है। वि शब्द की ही बात करे तो यह शब्द अपने आप में बहुत महत्व र खता है। वि अर्थात् विशेष रूप से और वाह का अर्थ है वहन करना। अर्थात् एक कार्य जो विशेष रूप से उत्तरदायित्व वहन करने के लिए प्रेरित करे वह है विवाह। लेकिन समाज की बदलती सोच ने विवाह को व्यापार बना दिया है और यह व्यापार तब तक चलती है जब तक फायदा हो रहा है। फायदा नहीं तो समाज अल्पबुद्धि व्यक्ति थोडÞा-सा ज्ञान प्राप्त कर लेने पर ही स्वयं को महान विद्वान समझने लगता है।

व्यापार भी बन्द। वास्तव में देखा जाय तो अधिकांश विवाह टूट रहा है। पहले तो सिर्फपश्चिमी राष्ट्रों में मिलता था तलाक का उदाहरण, लेकिन अब तो नेपाली समाज में भी तलाक कैंसर की तरह फैल रहा है। तलाक की वास् तविक संख्या न तो सरकार के पास है न तो किसी सामाजिक संस्था के पास लेकिन काठमांडूं जिला अदालत की ही बात करें तो तीस हजार से ज्यादा तलाक के मुद्दे दर्ज है वहाँ। अधिवक्ता सुनील रञ्जन सिंह की माने तो नेपाल में एक लाख से ज्यादा तलाक के मुद्दे अदालत में हैं। उनके हिसाब से ये संख्या लगातार बढती जा रही है खास कर पीछले एक दशक से। अधिवक्ता सिंह आगे कहते हैं- इस दशक में दो बडÞे परिवर्तन हुए हैं पहला रोजगार की तलाश में बहुत बडी संख्या में लोग बाहर जा रहे हैं और दूसरा महिला भी अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने लगी है। और वह अब दमन सहन नहीं करती और आर्थ्र्िाक रूप से स्वतन्त्र होने के कारण वह अकेले जीवन बिताने से नहीं डरती।

महिला हकहित के क्षेत्र में कार्यरत सामाजिक संस्था विमेन्स फाउन्डेशन नेपाल के अध्यक्ष रेणु शर्मा का कहना है तलाक का दर बहुत तेजी से बढता जा रहा है। वह आगे कहती हैं- तलाक होना जीवन की सबसे दुःखद घटना है लेकिन जीवन में कुछ ऐसी अवस्था आ जाती है जहाँ इसके सिवा और कोइ दूसरा रास्ता ही नहीं रहता। झापा की नमूना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। १७ साल की कमसीन उम्र में उसका तलाक हो गया। विमेन फाउन्डेसन आफ नेपाल ने उसकी कानूनी सहायता की थी तलाक लेने में। वैसे नमूना के पास दो ही रास्ते बचे थे, तलाक नहीं तो मृत्यु। १७ वर्षकी नमूना की शादी १५ वर्ष-स्मरण रहे- नेपाल में १५ वर्षकी लडकी की शादी कर ना कानूनन वर्जित है में हो गयी थी। विवाह के एक साल में ही उसने एक बेटी को जन्म दिया। बेटी को जन्म देना ही उसकी गलती थी। ससुराल वाले बेटे की अपेक्षा कर रहे थे और यहीं से शुरु हो गयी नमूना की मुश्किलें। नौबत यहाँ तक आ गई कि जिस दिन बेटी २८ दिन की हर्ुइ उसी दिन नमूना को घर में बन्द कर आग लगा दिया गया।

नमूना और उसकी बेटी दोनों काफी जल चुकी थी। विमेन्स फाउन्डेसन आफ नेपाल को जब इस घटना का पता चला तो उसने नमूना को काठमांडू लाया। और काठमांडू स्थित सुषमा कोइराला मेमोरियल अस्पताल में उपचार कर ाया। एक वर्षतक अस्पताल में रहने के बाद स् वास्थ्य अवस्था में सुधार आया है। यद्यपि अभी भी वे दोनो अस्पताल से नियमित जाँच कर वा रहे है। फाउन्डेसन की अध्यक्ष रेणु शर्मा का कहना है अभी भी उनके संस्था में दो सौ से ज्यादा ऐसे केस हैं। वह आगे कहती हैं- हम लोग भी चाहतें है कि तलाक नहीं हो और पति पत्नी सम्मानित जीवन व्यतीत करें लेकिन ऐसा नहीं होता। आज हर समाज में तलाक बढÞता जा र हा है। समाज शास्त्री भी परेशान हैं, इस र ोग को नियन्त्रण में लाने का तरीका ढंूढ र हे हैं

आखिर क्यों बढÞ रही है परिवार में असमझदारी। विज्ञ लोगों का मानना है कि आर्थिक प्रणाली में हो रहे तीव्र परिवर्तन सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रहा है। इस आधुनिक समाज में पैसा एक अहम भूमिका बनता जा रहा है। और ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए पति पत्नी एक दूसरे से अधिकाँश समय दूर रहने लगे हैं। दूर रहने के कारण वह एक दूसरे को समझ नहीं पाते न ही एक दूसरे की आवश्यकता पर्ूर्ति कर पाते। आर्थिक एवं शारीरिक आवश्यकता पर्ूर्ति करने लिए पति एवं पत्नी दोनों किसी और पर निर्भर बन जातें हैं और जिस दिन सच्चाई बाहर आ जाती है तलाक की नौबत आ जाती है। सुनसरी के इस्माइल अन्सारी की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। उसने कानूनी रूप से तलाक तो नहीं लिया है लेकिन समाज के आगे उसने अपनी पत्नी को छोडÞ दिया और कुछ दिन पहले ही उसने दूसरी शादी भी कर ली। करीब पाचँ वषर् पहल े राजे गार क े सिलसिल े म ंे वह संयुक्त अरब अमिरात गया। बहुत मेहनत करके कमाया पैसा वह पत्नी को भेजता र हा।

पिछले साल जब वह घर आया तो उसने पत्नी से हिसाब माँगा तो पत्नी ने कह दिया की उसके पास अभी पैसा नहीं है उसने किसी को दे रखा है। बारबार पूछने पर भी पत्नी ने जब नहीं बताया तो उसने कडर्Þाई के साथ पूछा। उस े पता चला उसकी अनपु स्थिति म ंे उसकी पत्नी ने किसी और के साथ संबंध जोडÞ लिया है महिला भी अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने लगी है। और वह अब दमन सहन नहीं करती और आर्थ्र्िाक रूप से स्वतन्त्र होने के कारण वह अकेले जीवन बिताने से नहीं डरती। तलाक होना जीवन की सबसे दुःखद घटना है लेकिन जीवन में कुछ ऐसी अवस्था आ जाती है जहाँ इसके सिवा और कोइ दूसरा रास्ता ही नहीं रहता।

और उसी ने सब पैसा भी ले रखा है। पत्नी के अवैध सबं न्ध क े बार े म ंे गावँ वाला ंे न े जब उस े बताया तो उसे विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब उसने अपनी आँखो से सब कुछ देखा तो बहुत देर हो चुकी थी। पत्नी के साथ अनबन हर्ुइ और जिस लडÞके को उसने पैसा दे रखा था, पत्नी उसक े साथ चली गयी। एक झटक े म ंे निकाह, जन्मा ंे जन्मा ंे का सबं न्ध सब बाता ंे का े उसन े झूठला दिया। राष्टी्रय मुस्लिम महासंघ के अध्यक्ष ताज महु म्मद कहत ंे ह-ै इस्लाम धमर् म ंे भी निकाह का े बडÞा पवित्र कार्य माना जाता है। लेकिन दर्ुभाग्य विविध कारणा ंे स े समाज म ंे इस पवित्र कायर् के प्रति विश्वास खत्म होता जा रहा है। अपने धार्मिक ग्रन्थ कुरान को उद्धृत करते हुए वह कहत े ह-ंै अल्लाह की मन्जरू ी स े निकाह हाते ा ह ै आरै यह अपक्ष्े ाा की जाती ह ै कि दाने ा ंे हमशे ा खशु रह,ंे दाने ा े मन्जरू ी क े साथ साथ रह।ंे ले िकन अगर दोनो की मन्जूरी नहीं हो या समझदार ी नहीं बनती है तो इस्लाम धर्म तलाक की इजाजत देता है। और दाने ा े बखे ापै m तलाक द े सकत ंे ह ंै एक दसू र े का।े तलाक क े मामल े म ंे इस्लाम धमर् न ंे महिला आरै परुु ष दाने ा ंे का े समान अधिकार दे रखा है।

हिन्दू धर्म की बात करें तो तलाक स्वीकार्य नहीं। यद्यपि शास्त्रों में संबन्ध विच्छेद का जिक्र किया गया है मर्यादा पुरुषोत्तम राम चन्द्र जी ने माँ सीता को छोडÞ दिया था। विश्वामित्र ने मेनका, दुष्यन्त ने शकुन्तला को और राजा रतन सेन पत्नी नागमती को छोडÞ कर पदमावती के साथ रहने लगे थे। कौटिल्य नें भी तलाक की चर्चा की है अपने साहित्य में। भले ही उद्देश्य महान हो लेकिन सिर्द्धार्थ गौतम ने यशोधरा को और मीरा को भी उसके पति ने छोडÞ दिया था। अपने से कम वौद्धिक स्तर कह कर कालिदास और तुलसी दास को भी उनकी पत्नी ने छोडÞ दिया था। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ को देखा जाय तो तलाक शब्द का जिक्र तो नहीं किया गया है लेकिन पति पत्नी के अलग रहने की बहुत सी घटनाओं का उल्लेख है।

और कहीं नितान्त व्यक्तिगत, तो कहीं महान कार्य के लिए तलाक ली और दी गयी है। इर्साई धर्म की बात करें तो बाइबल तलाक को स्वीकार नहीं करता। बाइबल स्पष्ट रूप से कहता है पति या पत्नी को छोडÞना व्यभिचार है। कारण बहतु स े मिल जायगंे े तलाक के। कहीं देखा गया कि पत्नी बच्चे को जन्म नहीं दे सकी इसीलिए तलाक, बेटी को जन्म देने के कारण तलाक, सम्पति क े लाभे म ंे तलाक, एक दूसरे के प्रति वफादार न होने का कारण तलाक, पारिवारि क सस्ं कृ ित म ंे रह े विविधता क े लिए तलाक, पति के अमानवीय व्यवहार के कारण तलाक, शारीरि क इच्छा पर्ूर्ति नहीं होने के कारण तलाक, पति पत्नी एवं उनके परिवार बीच आथिर्क , शै िक्षक स्तर म ंे रही विविधता के लिए तलाक। तलाक हर समाज और हर धर्म में विद्यमान है। कुछ तलाक के कारण जायज भी लगते हैं। लेकिन आधुनिक समाज में तलाक एक फैशन बनता जा रहा है। छोटी छोटी बातों में लोग तलाक लेना चाहते हैं और ले भी लेते हैं।

समाजशास्त्र के एक लेक्चरर की तलाक होते होते रह गई। अपनें से काफी कम उम्र की लडकी से उसने शादी रचा लिया। लागु औषध के आदी वह लेक्चरर अपनी पत्नी को अश्लिल फिल्म दिखाता कब से है तलाक रोम में अगस्तस के शासनकाल में विवाह और तलाक दोनों को पहली बार मान्यता मिली। लेकिन करीब दो हजार वर्षपहले शुरु हर्ुइ यह व्यवस्था १५ वीं शताब्दी तक बहुत ज्यादा चर्चा में नहीं थी। सन् १५ सौ में यूरोपीय अदालत ने तलाक की व्यवस्था की । इस नयी व्यवस्था के अनुसार व्यभिचार, हिंसा और धोखाधडÞी करनेवाले पुरुष या महिला को तलाक दिया जा सकता था। १८ सौ आते आते अमेरिका में भी तलाक की चर्चा वृहत स्तर पर होने लगी और सन् १९३३ में अमेरिका के न्यू मेक्सिको राज्य में तलाक को कानूनी मान्यता मिली। इस कानून के अनुसार नपुंसक व्यक्ति को तलाक दिया जा सकता है। वैसे अर्जेटिना, ब्राजील, चीली, कोलम्बिया, पारागुवे, फिलिपिन्स और स्पेन सहित के कुछ राष्ट्र में अभी भी तलाक को कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। नेपाल की बात करें तो प्रधानमन्त्री जंग बहादुर के शासनकाल अर्थात् सन् १८५४ में मुलुकी ऐन अर्थात् नेपाल का कानून तैयार किया गया। और सन् १९६३ में पहली बार इस कानून का संशोधन किया गया, जिसमें तलाक को स्थान दिया गया।

क्या कहता है नेपाल का कानून – नेपाल के मुलुकी ऐन ने पति, पत्नी या दोनो की समझदारी से तलाक लेने या देने की व्यवस्था की है। अगर पुरुष नपुंसक हो, लाईलाज यौन रोग का शिकार हो, परस्त्री गमन करे, दूसरा विवाह रचाए, पत्नी को घर से निकाल दे, खानेको नहीं दे, खोज खबर नहीं ले, पत्नी को शारिरिक या मानिसक यातना दे, पत्नी के खिलाफ षड्यन्त्र रचे, पत्नी के साथ बलात्कार करे और तीन वर्षया उससे भी ज्यादा समय तक पत्नी से दूर रहे तो पत्नी को तलाक लेने का पूरा अधिकार है। इसी तरह अपाहिज, पागल या शादीशुदा होते हुए भी झूठ बोल कर शादी किया गया हो तो ऐसी स्थिति में भी पत्नी तलाक ले सकती है। इसी तरह पुरुष के लिए भी यही कानून लागू होता है।

संयम सन्तुलन और सन्तुष्टि का गुण अपनाने से महान बन जायेंगे। कन्या वर से ये सात वचन मांगती हैंः l यज्ञ आदि शुभ कार्य आप मेरी सम्मति के बाद ही करेंगे और मुझे भी इस में शामिल करेंगे। l दान आदि के समय भी आप मेरी सहमति प्राप्त करेंगे। l युवावस्था, प्रौढÞावस्था और वृद्धावस्था में आप मेरा पालन-पोषण करेंगे। l धन आदि का गुप्त रुप से संचय आप मेरी सम्मति से करेंगे। l तमाम तरह के पशुओं की खरीदारी या बेचते समय आप मेरी सहमति लेंगे। l वसंत, गर्मी, वारिश, शरद, हेमन्त, शिशिर जैसी छहों ऋतृओं में मेरे पालन- पोषण की व्यवस्था आप ही करेंगे। l आप मेरी संगी-सहेलियों के सामने कभी भी मेरी हंसी नहीं उडÞएंगे, नहीं कभी कटु वचनों का प्रयोग करेंगे।

इसी तरह वर द्वारा भी कन्या से वचन मागें जाते हैंः l आप मेरी अनुमति के बिना निर्जन जगह, किसी उद्यान या बन में नहीं जाएंगी। l शराब का सेवन करने वाले मनुष्य के सामने उपस्थित नहीं होंगी। l जब तक मैं आज्ञा न दूं, तब तक आप पिता के घर भी नहीं जाएंगी। l इसके अलवा धर्म और शास्त्रों के अनुसार उचित मेरी किसी भी आज्ञा का निषेध नहीं करेगी आदि। वर का कहना यही होता है कि ये वचन देने के बाद आप मेरे वामांग में स्थित हो सकती हैं। वर-वधू जब एक-दूसरे को वचन दे देते हैं, तब विवाह पर्ूण्ा माना जाता है और दोनों का नयाँ जीवन सुख और सफलतापर्ूवक प्रारम्भ होता है। सात वचन क्या आप जानते हैं, शादी में कन्या और वर कौन-से सात वचन निभाने का संकल्प लेते हैं – का े पाल सकत े ह।ंै दाने ा ंे क े नही ं रहन े पर या नहीं चाहने पर यह अधिकार संरक्षक को दिया जायेगा जो कि नजदीक का रिश्तेदार हो और वह भी सम्भव नहीं हुआ तो बच्चे का पालन पोषण का जिम्मा बाल कल्याण गृह को दिया जायेगा।

कहते हैं मोक्ष प्राप्ति का एक सोपान- विवाह, प्रकृति का सबसे सुन्दर रिश्ता- विवाह, पवित्र बन्धन दो लोग फिर बच्चे और साथ साथ दो परिवारों का बिखराव कितना उचित है – कहें तो क्षणिक आवेश में आकर असमझदारी का मिसाल देते हुए दो लोग खूबसूरत इस वैवाहिक जीवन का अन्त कर देते हैं और अनगिनत गम छोडÞ जाते हैं बच्चों के लिए। l और यह अपेक्षा करता था कि उसकी पत्नी भी उसके साथ फिल्मी व्यवहार करे। दोनों के बीच असमझदारी बढÞती गयी और नौबत आ गयी तलाक की। लेकिन संयोग कहना चाहिए महिला हक हित के लिए कार्यरत एक संस्था ने उन लोगों को समझा बुझा कर तलाक से बचा लिया। संस्था के अनुसार वे दोनों अभी आम दम्पती की तरह जीवन व्यतीत कर रहे है।

शक की र्सर्ुइ, समझदारी की कमी, बेतुका स्वाभिमान, वक्त की कमी इन सभी का मिलाजुला रूप ही एक अलग रूप में आ रहा है जिसे हम आप तलाक कह देते हैं। कहना बहुत सरल है और करना भी उतना ही सरल। लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाये तो कोई बात न थी लेकिन होता ऐसा नहीं है। इसके बाद की जिन्दगी की बात करें तो तलाक लेने वाले भले ही खुश हों लेकिन उनके बच्चे – सडÞक बालबालिका के हकहित में कार्यरत डाक्टर सागर शमसेर जबरा का कहना है कि परिवार टूटने के कारण बहुत से बच्चे सडÞक पे आ जाते हैं। उनके अनुसन्धान के अनुसार करिब १५ फीसदी बालबालिका दाम्पत्य टूटने के कारण सडÞक पे हंै। और ४१ प्रतिशत बच्चे सडÞक पर आने का कारण है पति पत्नी अर्थात् परिवार में कलह। उतना ही नहीं माँ बाप का प्यार पाना बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है और जिस बच्चे को ये नहीं मिलता है उसका अपराध की ओर आकषिर्त होने की सम्भावना भी ज्यादा हो जाती है। लेकिन खुद की खुशी के लिए पुरुष और महिला दोनो बच्चों की कर्ुबानी दे रहे हैं। वसै े ता े नपे ाल क े काननू म ंे तलाक क े बाद बच्च े का पालन पाष्े ाण क े सब्ं ान्ध म ंे स्पष्ट लिखा ह ै ले िकन व्यवहार म ंे यह लाग ू नही ं हा े रहा ह।ै क्यांेि क काननू न तलाक अभी भी बहतु ही कम लागे लते े ह।ंै दसू र े मदर् क े साथ भाग जाना आम बात है। और ऐसे संबन्ध विच्छेद क े मद्दु े म ंे काननू अभी भी बहतु नही ं कर पाया है। मुलुकी ऐन के अनुसार पाँच वर्षतक के बच्चे के लिए पालन पोषण का पहला अधिकार माँ को है। और अगर बच्चे का पालनपोषण माँ कर रही है तो उसके खानपान, पढर्Þाई, कपडालत्ता और औषधोपचार का खर्च पिता का े वहन करना पडगेÞ ा। किसी कारण मा ँ बच्च े को देखभाल करने को इन्कार कर देती है तो यह अधिकार पिता को दिया गया है। अगर दाने ा ंे की मन्जरू ी हा े ता े बारीबारी स े बच्चा

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