अधिकारों की अन्धी दौड लिव इन रिलेशन’
करुणा झा:आधु िनक हाते े समाज म ंे जीवन शैली का परिवर्तित रूप और विना किसी जिम्मेवारी के सहभागिता के सुख को पाने के लिए लिवर् र्इन रिलशे न का पच्र लन र्इन दिना ंे लगातार बढÞता ही जा रहा है। अधिकांशतः नयी पीढÞी क े एसे े यवु ाआ ंे म ंे यह लाके प्रि्र हा े रहा ह ै जा े अपन े परिवार स े दरू रह कर पढाÞ र्इ करत े ह ंै और सोच के स्तर पर तथाकथित आधुनिकता क े पक्षधर ह।ैं एसे े यवु ा स्थापित सामाजिक मान्यताआ ंे आरै अवधारणआ ंे का े सिर े स े नकार कर अपने लिए एक फन्टासी की दुनिया रचते ह ंै आरै उसी क े अनसु ार जीवन जीकर सखु की प्राप्ति करना चाहते हं।
लिवर् इन रिलेशन उन समाजों में बहुत अधिक प्रचलित है जो महानगरीय जीवन में रचे बसे है। कई वार मजवूरी में तो कई वार स्वेच्छा से पुरुष और स्त्री दोनों ऐसे रिश्ते में वंधते हंै। महानगरीय जीवन की आपाधापी, वेशुमार खर्चीला जीवन और रिश्ते में रहकर सामाजिक मर्यादाओं को निभाने की मजवूरी से वचने के लिए यह एक सहज, सरल रास्ता वनता जा रहा है। पुरुषों के लिए इसे स्वीकार कर लेना जहां आम हो चला है, वहीं स्त्रियों के लिए यह अव भी कहीं न कहीं मानसिक और सामाजिक रूप से कुंठा का कारण है। वे लिवर् इन रिलेशन में रहकर भी सहज नहीं हो पातीं। सिर्फअविवाहित युवक-युवती ही लिव इन रिलेशन में वंधते हों ऐसा नहीं है। नौकर ी पेशा विवाहित युवक-युवतियों को भी ऐसे सम्वन्ध बनाते देखा जा रहा है। अपने घरसे दूर इस जीवन शैली को अपनाकर वे जीवन के खोये सुखों को पूरा करने की चेष्टा करते हैं। यहां गौर करने की वात है कि पुरुषों के लिए तो यह सामान्य रहता है जबकी किसी स् त्री के लिए जो पहले से विवाहित है और पेशे के लिए अकेले रहने की मजवूरी में इस तर ह के रिश्ते से बंधी है तो यह जीवन की नार कीय परिणति का सूचक बन जाता है। वह न तो विवाह के प्रति सहज रह पाती है और न ही
लिव इन रिलेशन से सन्तुष्ट। कई वार यही असन्तुलन मानसिक अवसाद के रूप में सामने आता है और दुखद घटनाओं की खबरें बनती है। भारतीय सस्ं कृ ित म ंे विवाह का े एसे सस्ं था संस्कार का दर्जा दिया गया है। किसी भी संस्था अथवा संस्कार के अपने नियम-कायदे हाते े ह।ैं विवाह वन्धन म ंे वन्धन े वाल े स्त्री-परुु ष स े उन नियमा ंे का निवार्ह करन े की अपक्ष्े ाा र खी जाती ह।ै अधिकाशं स्त्रिया ँ उन नियमा ंे का अक्षरशः पालन भी करती ह ंै किन्त ु परुु ष उन नियमा ंे का े पा्र यः अनदखे ा करत े चल े जात े ह।ंै परुु षा ंे क े विवाहते र सम्बन्धा ंे का े थाडे ीÞ सी हाय तौवा के वाद भुला दिया जाता है। पत्नी से यही उम्मीद की जाति है कि वह अपने पति के विवाहेतर सम्वन्ध पर बबाल न मचाए और इसे पुरुषोचित अधिकार माने। समाज यदि स्त्री से यही अपेक्षा रखना चाहता है तो फिर विवाह के दौरान वर से सात वचन क्यों लिए जाते हैं – यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका समाधान सदियों से स्त्री अपने जीवन में ढूंढ रही है। पति के विवाहेत्तर सम्वन्धों की ओर से आँख मूंद कर जीना स्त्री की विवशता है। जबकी स्वयं स्त्री विवाहेत्तर सम्वन्ध नहीं बना सकती है। यदि चोरी-छिपे वना भी लेती है तो वह भीतर ही भीतर अपर ाध वोध से घुटती रहती है। पे्रमी और पति के बीच पिसती हर्ुइ खुशी के दो पल के लिए मृगमरीचिका में भटकती रहती है। स्त्री के विवाहेतर सम्वन्धो को आज भी समाज सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाता है। ‘लिव इन रिलेशन’ की धारणा भी भार तीय संस्कृति से मेल नहीं खाती है। वस्तुतः भारतीय समाज में संस्कारगत जो वातावरण है उसके कारण इन दोनों स्थितियों में घाटे में स्त्री ही रहती है। वह न खुल कर अपने विवाहेतर सम्वन्धों को स्वीकार कर पाती है और न अपने वैवाहिक सम्वन्धो से मुक्त हो पाती है।
दो पाटों के बीच पिसने जैसी स्थिति में यदि वह स्वयम् को मुक्त अनुभव करती है तो इसे उसका भ्रम ही माना जा सकता है। स्त्री में, चाहे वह सुशिक्षित हो अथवा अनपढÞ, अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता की बहुत कमी है। वह अपने पति से अपने पूरे अधिकार हासिल नहीं कर पाती है तो भला प्रेमी से कौन से अधिकार प्राप्त कर सकती है – प्रेमी से कभी भी छूट जाने का भय और पति के समक्ष विवाहेतर संवन्ध का कभी भी खुलासा हो जाने का डÞर उसे एक पल भी चैन से जीने नहीं देता है। इसके वाद भी विवाहेतर सम्वन्धों के प्रति उत्सुक होना स्त्री की वह नियति है जो उसने स्वयम् अपने लिए तय की है। वह एक साथ जीवन के सारे सुख अपनी झोली में भर लेना चाहती है। जो उसके लिए दर्ुगम रास्ते पर चल कर हासिल करने जैसा है। यदि वह अपने वैवाहिक जीवन में अपने विवाहेत्तर सम्वन्धों को सिर उठा कर स्वीकार करने का माद्दा नहीं रखती है तो क्या यह अच्छा नहीं होगा कि वह दो में से एक रास् ता चुने और उसी के प्रति प्रतिवद्ध रहे। इससे जीवन के कृष्णपक्ष का अन्धेरा भयावह नहीं रह जाएगा। हिन्दू संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था ने सदियों से जिस अनुशासनात्मक जीवन शैली की वकालत की है उसमें रहकर जीवन के सारे सुखों को प्राप्त किया जा सकता है वशर्ते उसके प्रति हृदय से अनुरक्ति हो और उसमें समाहित सार तत्वों को ग्रहण करने की उदात्त मानसिकता भी रहे। पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण क्षणिक सुख तो दे सकता है, लेकिन ताउम्र सुखी रहने की गारंटी कभी नहीं देता। सात वचनों के साथ सात जन्मों के सफर से इतर साथ-साथ कुछ साल जीने की ललक भला अनंत सुख का पैमाना कैसे हो सकता है – J

