विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा आयोजित 12 अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं भाषा सम्मेलन संपन्न
दिल्ली, 21, 22 जनवरी । दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पर परिषद द्वारा दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया । प्रथम दिवस अर्थात 21 जनवरी को संपूर्ण कार्यकर्म ऑफलाइन रखा गया जबकि 22 जनवरी को सम्मेलन ऑनलाइन माध्यम से संपन्न हुआ।
ज्ञात हो कि विश्व हिंदी साहित्य परिषद विगत 12 वर्षों से विश्व के विभिन्न देशों में अंतरराष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं भाषा सम्मेलन निरंतर करती आई है । इसी कड़ी में इस वर्ष का आयोजन दिल्ली में किया गया। इससे पूर्व परिषद द्वारा इंग्लैंड, मॉरीशस, बाली, हंगरी, फ्रांस, रूस, ताशकंद, इटली आदि महत्वपूर्ण देशों में सम्मेलन आयोजित कर चुकी है।
12वें अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं भाषा सम्मेलन का संयोजन श्रद्धानंद महाविद्यालय में वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर डॉक्टर ऐश्वर्या झा ने किया । सह–संयोजक के रूप में डॉ प्रतिभा राणा, डॉक्टर सत्येंद्र प्रताप सिंह, डॉक्टर आशुतोष शर्मा ,सुश्री कोमल, डॉ रमेश कुमार वर्णवाल, डॉ राहुल द्विवेदी तथा डॉक्टर जय सिंह यादव शामिल थे । सम्मेलन सचिव के रूप में सुश्री ममता गोयनका ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया।
21 जनवरी 2023 को सम्मेलन 5 सत्रों में संपन्न हुआ। उद्घाटन एवं अभिनंदन समारोह में प्रोफेसर सच्चिदानंद जोशी, सदस्य, सचिव इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, मुख्य अतिथि के रूप में तथा प्रोफ़ेसर सत्यकेतु सांकृत अधिष्ठाता, अंबेडकर विश्वविद्यालय एवं प्रो. संजय द्विवेदी महानिदेशक भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर उपस्थित थे।
उद्घाटन सत्र का संचालन डॉक्टर ऐश्वर्या झा ने किया वही स्वागत उद्बोधन श्री कांधवे द्वारा किया गया।
मुख्य अतिथि के रुप में बोलते हुए प्रोफेसर सच्चिदानंद जोशी ने कहा की भाषाएं ही भारतीय संस्कृति की आधार हैं और हर परिस्थिति में सभी भारतीय भाषाओं का संरक्षण करना भारत के संरक्षण के लिए आवश्यक है। डॉक्टर प्रोफेसर संजय द्विवेदी ने अपने उद्बोधन के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा की जब तक अपनी भाषाई गौरव को हम आत्मसात नहीं कर लेंगे तब तक हमें भाषा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। इस अवसर पर स्वागत उद्बोधन के माध्यम से खचाखच भरे सदन को मैंने यह अवगत कराने और सचेत करने का प्रयास किया की भाषा के महत्व को अगर हम नहीं समझेंगे तो भारत को नहीं समझेंगे और भारत को न समझना भारत बोध से दूर हो जाना है। इसी भारत बोध को बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम हिंदी के साथ-साथ समस्त भारतीय भाषाओं के संरक्षण विस्तार प्रतिष्ठा और परिष्कार की बात करें । उसके लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए।
21वीं सदी का भारत इतना विशाल और विस्तार पा चुका है कि भारत के बिना विश्व की परिकल्पना नहीं की जा सकती। भारतीयता को संरक्षित करने के लिए भारत बोध को नई पीढ़ी से परिचित कराने के लिए आवश्यक है कि हम भाषाई संस्कार को नई पीढ़ी में जीवित रखें। भारतबोध ही विश्वबोध में परिणित हो जाएगा।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर प्रोफेसर सुशील कुमार शर्मा, प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र, प्रो. सुधीर प्रताप सिंह, प्रोफेसर मनोज कुमार खन्ना,प्रोफेसर के पी सिंह, प्रोफेसर प्रवीण गर्ग, प्रोफ़ेसर ज्ञानतोष झा, प्रोफेसर अनुला मौर्य, प्रोफेसर रवि नारायण कर, प्रोफेसर विचित्र गुप्ता और प्रोफेसर हरप्रीत कौर को “विश्व वागेश्वरी सम्मान 2023“ से सम्मानित किया गया।
इसके अतिरिक्त तीन समानांतर सत्रों का आयोजन एक साथ किया गया जिनमें प्रथम “भाषा का प्रश्न राष्ट्रीय चेतना“ पर केंद्रित रहा जिसकी अध्यक्षता प्रोफेसर वशिष्ट अनूप, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर अनिल राय, विशिष्ट अतिथि के रूप में जय वर्मा, बीज वक्तव्य सुश्री कोमल के द्वारा तथा संचालन का दायित्व डॉ रमेश कुमार बर्नवाल ने निभाया।
प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी की अध्यक्षता में द्वितीय सत्र का आयोजन हुआ। इस सत्र का विषय “भाषा का प्रश्न साहित्य, संस्कृति, सिनेमा और पत्रकारिता“ था। मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफ़ेसर चंदन कुमार हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय विशेष अतिथि के रूप में डॉ बच्चा बाबू विभागाध्यक्ष पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय मंच पर उपस्थित थे वही बीज वक्तव्य का दायित्व डॉक्टर विजय कुमार मिश्रा ने निभाया। इस महत्वपूर्ण सत्र का संचालन डॉक्टर प्रतिभा राणा ने किया।
तीसरे समानांतर सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर सुशील कुमार शर्मा, मिजोरम विश्वविद्यालय कर रहे थे । इस सत्र में चर्चा का विषय “भाषा का प्रश्न और प्रवासी साहित्य“ रहा। इस महत्वपूर्ण सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र, वरिष्ठ प्रोफेसर त्रिपुरा विश्वविद्यालय मंच पर उपस्थित थे । बीज वक्तव्य का दायित्व डॉक्टर पूनम शर्मा ने निभाया वही संचालन डॉक्टर सतेंद्र प्रताप सिंह कर रहे थे।
तीनों समानांतर सत्रों में विद्यार्थियों शोधार्थियों और शिक्षकों के द्वारा लगभग 40 शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए।
समानांतर सत्रों के समापन के पश्चात समापन सत्र का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ इंदुशेखर तत्पुरुष पूर्व अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी, विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफ़ेसर के.पी. सिंह निदेशक गांधी भवन, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रोफेसर बलराम शुक्ल, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय मंच पर उपस्थित थे। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति न्यूयॉर्क के निदेशक डॉ इंद्रजीत शर्मा के सान्निध्य में आयोजित इस सत्र का संचालन डॉक्टर प्रभांशु ओझा सहायक प्रोफेसर हंसराज कॉलेज कर रहे थे। समापन सत्र में भी त्रिपुरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन थे।
डॉक्टर प्रोफेसर के.पी सिंह ने अपने उद्बोधन के माध्यम से कहा कि हिंदी, हिंदू,हिंदुस्तान को बचाना आज सबसे आवश्यक हो गया है। जिस प्रकार का समय अभी चल रहा है मैं जाने भविष्य में फिर हमें ऐसा सुनहरा अवसर मिले या ना मिले। उन्होंने कहा कि यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधों पर भारत को विश्व गुरु के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास सराहनीय है। नई सरकार अनेक विधि से भारतबोध से विश्वबोध की यात्रा को सिद्ध करने में लगी है।
वही समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर बलराम शुक्ला अपनी ओजस्वी वाणी तथा ज्ञान से भाषा के संदर्भ में विभिन्न मतों एवं प्राचीन इतिहास को साक्षी बनाकर उपस्थित श्रोताओं को समृद्ध किया । प्रोफेसर विनोद मिश्र ने बड़े ही विनोदपूर्ण अंदाज में है अपनी बात रखी।
कार्यक्रम का उद्घाटन पूनम कुमारी के सुमधुर कंठ से उच्चारित सरस्वती वंदना से हुआ । इस अवसर पर सभी सत्रों के सभी गणमान्य अतिथियों को शॉल, प्रतीक चिन्ह बैग, कलम आदि प्रदान कर उनका अभिनंदन किया गया।
हम बाहर में अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं भाषा सम्मेलन में देश के अनेक राज्यों से आए लगभग 200 प्रतिनिधियों ने साक्षी बनकर इस कार्यक्रम को सफल बना दिया।









