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नेपाली भाषा से अनूदित “युद्ध”

 

माया ठकुरी:रात आधी गुजर गई थी, किन्तु उसकी आँखों में नींद नहीं थी । उसका मन कर रहा था कि कमरे की बत्ती जला दे पर, वह ऐसा कर नहीं पा रहा था क्योंकि, उसे पता था कि बत्ती जलते ही उसकी पत्नी की नींद खुल जाएगी और फिर वह खीझ कर बोलेगी और अन्ततः उसे फिर बत्ती बुझा देना होगा ।
कितनी छोटी-छोटी बातों में ये औरतें नाराज हो जाती हैं, वह सोचता है ।
पत्नी को मस्त न्रि्रा में सोए देखकर उसे जलन होती है । जलन ही नहीं, उसे अपनी पत्नी के स्वभाव पर आर्श्चर्य भी होता है । हर बात कितनी सहजता से वह लेती है । वह प्रायः कहती है, “बेकार की बात को सोचकर क्यों अपने-आपको कष्ट देना । यह सही नहीं है । आप क्यों छोटी-छोटी बातों पर दुखी होते हैं – दुख तो मुझे होना चाहिए क्योंकि चाही- अनचाही बातें तो मुझे सुननी पडÞती है । पर मैं तो एक कान से सुनती हूँ और दूसरे से निकाल देती हूँ । जिसे जो मन आए बोले मुझे परवाह नहीं है ।” पत्नी की ऐसी बातों को सुनकर उसे आर्श्चर्य होता है । कितनी आसानी से वह ऐसी बातें बोल जाती है मुझसे तो नहीं होता ।
उसकी पत्नी चाहे उसे कितना भी समझा ले पर वह अपने माँ-पिता, रिश्तेदारों के बीच नामर्द नहीं कहलाना चाहता है ।
पिता बनने की इच्छा उसके भीतर दिन-प्रति-दिन बढÞती जा रही है । उसकी पत्नी कहती है कि मुझे सभी बाँझ कहते हैं पर मैं बाँझ नहीं हूँ । मुझे उनकी बातों से कोई र्फक नहीं पडÞता है ।
उसकी पत्नी हमेशा उससे सहानुभूति जताती हर्ुइ कहती है कि “जो बात सम्भव नहीं है उसके पीछे क्यों परेशान होनार्,र् इश्वर ने जैसी जिन्दगी दी है, उसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए और अपना कर्त्तव्य करते जाना चाहिए । मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है और न ही मैं अपने जीवन से असंतुष्ट हूँ । आपने तो कह ही दिया है कि ये बातें आपको पहले पता नहीं थी । इसलिए अपने आपको दोष मत दो ।”
पत्नी जितना समझाती है उसके भीतर हीनता का बोध उतना ही गहरा होता जाता है । यही वजह है कि वह हमेशा अशान्त रहता है ।
कितनी इच्छा थी संतान का मुख देखने की । “मुझे तो तुम्हारी जैसी प्यारी सी बेटी चाहिए । बेटी पिता को ज्यादा प्यार करती है ।” शादी के कुछ दिनों बाद एकांत के क्षणों में उसने अपनी पत्नी से कहा था । “लेकिन मुझे तो आपके जैसा बेटा चाहिए” पत्नी ने शरमाते हुए कहा था ।
कितने अच्छे थे शादी के बाद के वो दिन ।
घर के सभी सदस्य उसकी पत्नी के गुणों की तारीफ करते थे, वो थी भी तो गुणी । अपने व्यवहार से उसने सभी का मन मोह लिया था ।
समय गुजरता गया । वो दोनों एक दूसरे के प्रति समर्पित थे । शादी के दो वर्षों के बाद माँ ने पोते-पोती की इच्छा जाहिर की । तीन वर्षबीतने के बाद भी जब पत्नी माँ नहीं बनी तो उसे भी चिन्ता होने लगी । पति-पत्नी दोनों मिलकर स्त्री विशेषज्ञ के यहाँ गए । डा. ने पत्नी को जाँच कर कहा कि कोई समस्या नहीं है । थोडÞा इंतजार करो । दोनों निश्चिंत होकर वापस आए । समय गुजरा लेकिन वह माँ नहीं बनी । अब तो घर ही नहीं बाहर के लोग भी जिज्ञासा करने लगे थे । उसके भीतर भी अन्तुष्टि ने घर कर लिया । वह बार-बार अनेक डाक्टर से अपनी पत्नी का जाँच करवाने लगा । पर किसी ने उसकी पत्नी में कमी नहीं बतायी । कई डाक्टर ने उसे स्वयं जाँच कराने की सलाह दी पर यह उसे मंजूर नहीं हुआ ।
लेकिन बाद में पत्नी ने समझाया कि एक बार आप भी जाँच करा लीजिए, अगर कोई समस्या होगी तो दवा खाने से ठीक हो जाएगी । अन्त में वह डाक्टर के यहाँ जाने के लिए राजी हुआ । डाक्टर ने जाँचने के बाद जो कहा वह उसके लिए असहनीय था । उसके सारे सपने मिट गए । पत्नी ने समझाया कि इस संसार में कई ऐसे लोग हैं जिनकी संतान नहीं है, फिर भी वो जी रहे हैं और अपना कर्त्तव्य कर रहे हैं । किन्तु पत्नी के ये शब्द उसके हृदय में काँटे की तरह चुभ रहे थे । संतान जन्म न लेने का कारण उसने किसी को नहीं बताया पर निराशा ने उसे घेर लिया था । फिर वह तन्त्र-मन्त्र की शरण में गया । आज उसने सोने से पहले महाराज के यहाँ जाने के लिए अपनी पत्नी को मनाया था । वो कुछ नहीं बोली थी, बस एकटक उसे देखा था । उसे लगा कि आखिर उसे भी तो संतान की इच्छा है इसलिए चुप होकर मेरी बात मान गई ।
इन्हीं बातों को सोचते-सोचते रात्री के चौथे प्रहर में उसकी आँखें लग गईं ।
दूसरे दिन देर तक वह सोया था । आफिस जाने से पहले उसने पत्नी को कहा कि “आज मैं जल्दी आऊँगा तैयार होकर रहना ।”
शाम में आकर वह सीधे अपनी माँ के कमरे में गया और कहा “माँ आज मैं अस्मिता के साथ अपने एक मित्र के यहाँ जा रहा हूँ उसकी बेटी का जन्मदिन है । अगर देर हो गई तो वहीं रह जाऊँगा और कल वापस आऊँगा ।”
“तुमको जो मन है वह करो पर अभी तक तुम्हारी पत्नी स्कूल से वापस नहीं आई है । कहाँ गई है पता नहीं । घर का काम भी पडÞा हुआ है ।” माँ नाराज होती बोली ।
वह अपने कमरे में गया और थोडÞी देर बिस्तर पर बैठा, लेकिन उसका मन नहीं लगा वह फिर कमरे से बाहर आया । किन्तु उसका मन वहाँ भी नहीं लग रहा था । वह फिर अपने कमरे में गया । आज उसकी पत्नी देर कर रही है यह सोच कर उसे गुस्सा भी आ रहा था । अचानक उसकी नजर डे्रसिंग टेबल पर फूलदान से दबे एक कागज पर पडÞी । उसने वह कागज उठाया और वहीं सोफे पर बैठ कर पढÞने लगा ।
एक बडÞे से प्रश्नचिहृन से शुरु किए गए उस कागज में लिखा था…..।
….-
मैं मानती हूँ कि धर्म और समाज के नियमानुसार मैं तुम्हारी पत्नी हूँ और तुम्हारे सुख और दुख में साथ देना मेरा कर्त्तव्य है । पर पति होने के अहम् के साथ ही तुमने हमेशा अपनी इच्छा को ही सर्वोपरि माना ।
जानती हूँ कि पति होने के नाते पत्नी को भोगने का अधिकार समाज ने तुम्हें दिया है किन्तु तुम पुरुष होने की श्रेष्ठता से ग्रसित मानसिक रोगी हो । नारी के ऊपर अपनी इच्छा थोप कर खेत में जोते हुए गाय की तरह तुमने मुझे इशारों पर नचाना चाहा । पर तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं मनुष्य हूँ जानवर नहीं । समाज तुम्हें नपुंसक कहेगा, नामर्द कहेगा इस डर से तुम हमेशा भयभीत रहे । पर मेरे विचार से तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि समाज का निर्माण हम करते हैं, हमारे विचार ही समाज में देखने को मिलते हैं । बीते समय में मैंने तुम्हारी पत्नी बनकर अपने आसपास की हर चीज तुम्हारी नजर से देखा, आसपास की ध्वनि तुम्हारे कानों से सुना । तुम्हारी खुशी ही मेरी खुशी थी ।
तुम्हारी दर्ुबलता, तुम्हारा अधूरापन सभी मैंने आत्मसात् किया । दूसरों की लांछना और कटु वचन को धरती बन कर सहा । यह सब मैंने तुम्हारे लिए किया क्योंकि तुम मेरी माँग का सिन्दूर थे । अग्नि को साक्षी मान कर तुमने मेरा हाथ थामा था । मैंने तुम्हें अपना र्सवस्व माना पर तुमने पुरुषत्व के अहंकार से दब कर मुझे हमेशा प्रयोग करना चाहा । ऐसी क्षुद्र मानसिकता और विकृत मनोवृत्ति के साथ स्वयं को कब तक छल सकते हो तुम –
तुम्हें किस तरह एक सच्चा पुरुष मानूँ तुम्ही सोचो । तुममें संतान पैदा करने की क्षमता नहीं थी ये हम दोनों जानते थे । तुम्हारे कारण मैंने यह बात अपने तक ही सीमित रखी । जितना ही तुम संतान के लिए छटपटाते थे तुम्हारे प्रति मेरी सहानुभूति बढती जाती थी । यह शायद तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम था, पर आज लगता है कि तुम मेरे प्यार तो क्या मेरे दया के भी पात्र नहीं हो । तुमने सोचा होगा कि मैं तुम्हारी मीठी बातों में आकर फँस जाऊँगी पर, मैं मर्ूख नहीं हूँ, मैं एक शिक्षित नारी हूँ । पिता नहीं बन पाने के कारण तुम्हारे अन्दर भयानक अर्न्तर्द्वन्ध चल रहा था । शायद अपनी पत्नी के सामने ही तुम अपने-आपको पराजित समझने लगे थे, इसलिए अपनी इच्छा की पर्ूर्ति हेतु छल-कपट तक करने लगे । उस दिन जब तुमने रुआँसा होकर मुझे किसी साधु महाराज के यहाँ जाने के लिए कहा था तो मैंने स्पष्ट कहा था कि मुझे इन सारी बातों में विश्वास नहीं है । पर तुम्हारी जिद के कारण मैं जाने के लिए तैयार हो गई थी । तुम दो दिन तक लगातार मुझे लेकर उस साधु के यहाँ गए । उस सन्यासी के कमरे में दो तीन मिट्टी के दीए जल रहे थे । उसी के मद्धम प्रकाश में उसने हाथ में कुछ अक्षत और फूल लेकर मेरे सर से पैर तक मुझे छुआ था और तुम वहीं बैठे देख रहे थे । एक बार तो वह साधु मेरे पैरों में सिन्दूर लगाते और मंत्र पढÞते हुए मेरे पैर ही सहलाने लगा था । मैंने उसके व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपने पैर खींच लिए थे और तिरस्कारपर्ूण्ा नजरों से उसे देखा था । सच कहती हूँ उसी एक क्षण में मैंने उस साधु की कुटिल मुस्कान और लोलुपता को भाँप लिया था । उस रात वहाँ से लौटते हुए मैंने स्पष्ट रूप में तुम्हें सारी बातें बताई थी । प्रतिउत्तर में तुमने मुझे ही शंकालु कहकर अपनी नाराजगी जताई थी । तीसरी रात भी तुमने साधु के यहाँ जाने की बात कही थी पर मैंने मना कर दिया था, पर तुमने अनुनय-विनय कर के कहा कि सिर्फआज भर चलो बाद में सोचेंगे । अन्त में तुम्हारी जिद के आगे मै. झुक गई और साधु के यहाँ जाने के लिए तैयार हो गई, तुमने कई उदाहरण दिए कि उनकी कृपा से कइयों को संतान लाभ हुआ है । मैं तुम्हारे अन्धविश्वास को तोडÞना चाहती थी । मैं अच्छी तरह जानती थी कि ऐसे ढोंगी साधु के मंत्र से बच्चा नहीं होने वाला है इसलिए मैं तुम्हारे साथ जाने को तैयार हो गई ।
उस दिन उस साधु के यहाँ जब हम गए तो शाम हो गई थी । वह साधु फूल अक्षत लेकर हमारा इंतजार कर रहा था । हमारे पहुँचने के साथ साधु ने तुमसे कहा कि बाजार से दूध मिर्ठाई आदि लेकर आओ । मैं भी तुम्हारे साथ जाना चाहती थी लेकिन तुमने मना कर दिया ।
“आप यहाँ आकर आसन पर बैठिए, मैं पूजा शुरु करता हूँ ।” साधु ने मुझसे कहा । नहीं चाहते हुए भी मैं उसके बताए आसन पर जाकर बैठ गई ।
मिट्टी का दिया जल रहा था, धूप अगरबत्ती की खुशबु से कमरा भरा हुआ था । उस साधु ने हाथ में फूल अक्षत लेकर मेरी ओर उसी कुटिल मुस्कान के साथ देखा और अपना हाथ मेरे सर से पैर तक घुमाने लगा । यह सब मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था ।
उसने कहा, “तुम्हें संतान चाहिए – जिसके संतान नहीं होती उसे समाज में सभी तिरस्कार करते है । चिन्ता मत करो सब ठीक हो जाएगा ।” मैं चुपचाप तुम्हारा इंतजार करती रही ।
“लो यह अर्क एक साँस में पी जाओ ।” उसने मेरी ओर एक कटोरा बढाया । मैंने उसकी नीयत को भाँप लिया था मुझे लगा कि कुछ गलत होने वाला है । मैंने उसके हाथ पर जोर से मारा, कटोरा उसके हाथ से गिर गया ।
“डाकिन औरत तुमने देवी के प्रसाद का अपमान किया है, तुम्हें… ।” कहता हुआ वह मेरी ओर बढÞा । मै. उससे बचने के लिए दरवाजे की ओर भागी लेकिन आर्श्चर्य दरवाजा तो बाहर से बन्द था । अचानक दरवाजा खुला और तुम भीतर आए ।
“अपनी पत्नी को समझाओ, अगर उसे संतान जन्माने की इच्छा है तो यह सब नाटक करने की आवश्यकता नहीं है । संतान पाने के लिए तुम जैसे यहाँ बहुत आते हैं ।” उस साधु ने गुस्से से कहा ।
उस रात लौटते हुए मैं सारे रास्ते तुमसे उस साधु के खराब नीयत के बारे में बात करती रही पर तुम चुपचाप मेरी बात सुनते हुए मेरे साथ चल रहे थे । उस रात तुमने जो लज्जास्पद प्रस्ताव मेरे सामने रखा उसे सुनकर मैं हैरान थी । संसार के सामने अपने पौरुषत्व को बनाए रखने के लिए और अपनी दमित इच्छा की पर्ूर्ति के लिए तुम अपनी पत्नी को गैर पुरुष के आगे समर्पित करने के लिए तैयार थे ।
मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि पति होने के नाते तुम्हें पत्नी को भोगने का अधिकार समाज ने दिया है पर अपनी इच्छा की पर्ूर्ति हेतु अपनी पत्नी या किसी भी स्त्री को पर पुरुष के आगे परोसने का अधिकार नहीं दिया है । और अगर ऐसा करते हो तो तुम नारी देह का व्यापार करने वाले दलाल हो और ऐसा व्यक्ति पत्नी तो क्या अपनी माँ का भी सौदा कर सकता है । धिक्कार है तुम्हें, तुम तो पुरुष के नाम पर कलंक हो ।
आज सुबह आफिस जाते हुए तुम बहुत खुश थे तुम्हें लगा होगा कि मैं तुम्हारे जाल में फँस गई । पर यह तुम्हारा भ्रम मात्र है । जब शाम में तुम घर लौटोगे तो मेरा यह पत्र तुम्हारी सारी योजना को तहस नहस कर देगा । मैं जानती हूँ कि तुम्हें आघात लगेगा, तुम जी भर कर मुझे कोसोगे, मुझसे बदला लेने का भी प्रण करोगे, परन्तु मुझे इन सारी बातों से कोई र्फक नहीं पडÞने वाला । मैं तो समाज के सामने तुम्हारा असली चेहरा लाऊँगी । मुझे विश्वास है कि मेरे प्रारम्भ किए गए इस युद्ध में मैं पराजित नहीं होऊँगी । साभार ‘गरिमा’ -१८,९,२०५७) से।

अध्यात्म
संत-चरित
स्वामी विवेकानन्द
भारत के धराधाम पर श्रीरामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानन्द का अवतरण एक अद्भुत, अनुपम एवं अद्वितीय घटना है । श्रीरामकृष्ण परमहंस द्वारा साधनापर्ूवक धर्म की जो अनभूतियाँ प्राप्त की गई थी, उनको व्यावहारिक सिद्धान्तों का जामा पहनाने का कार्य स्वामी विवेकानन्द द्वारा किया गया । डा. रामधारी सिंह दिनकर ने एक स्थान पर लिखा है कि रामकृष्ण और विवेकानन्द एक ही जीवन के दो अंश, एक ही सत्य के दो पक्ष हैं । रामकृष्ण अनुभूति थे, विवेकानन्द उनकी व्याख्या बनकर आए । रामकृष्ण दर्शन थे, विवेकानन्द ने उनके क्रिया पक्षका आख्यान किया । यदि रामकृष्ण हिन्दू धर्म के कमण्डल में बन्द गंगा थे तो विवेकानन्द इस गंगा के भगीरथ हुए । इसे रामकृष्ण के कमण्डल से निकाल कर उन्होंने सारे विश्व में फैला दिया ।
१२ जनवरी, सन् १८६र्३र् इ. को दिव्य विभूति स्वामी विवेकानन्द -नरेन्द्रदत्त) का जन्म कोलकाता में हुआ । उनके पिता का नाम विश्वनाथ तथा माता का नाम भुवनेश्वरी था । उनकी महासमाधि ४ जुलाई सन् १९०र्२र् इ. को हर्ुइ । वे मात्र ३९ वर्ष५ माह और २४ दिन इस धराधाम पर रहे । इस अल्पअवधि में उन्होंने राष्ट्रउत्थान, पुनर्जागरण तथा भारतीय संस्कृति की, विश्व भर में पहचान स्थापित करने, भारत की सोई हर्ुइ युवाशक्ति एवं ऊर्जा को अपने धर्म से परिचित कराने, भारत के प्रति गौरव एवं भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न करने आदि का जो महान् कार्य किया, वह हजारों वर्षो तक भी सम्भव नहीं था । उनके समूचे जीवन का एक-एक पल भारत के नवनिर्माण, देश भक्ति की भावना जाग्रत करने और धर्म की सही व्याख्या में व्यतीत हुआ ।
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार कर्म करना ही उपासना करना है । स्वयं जीवन ही धर्म है । कर्म, ज्ञान भक्ति से अलग नहीं, बरन् उन्हें अभिव्यक्त करने वाला उनके लिए कारखाना, अध्ययनकक्ष, खेत और खेल के मैदान आदि भगवान के साक्षात्कार के वैसे ही उत्तम तथा योग्य स्थान हैं, जैसे साधु की कुटी या मन्दिर का द्वार । उनके लिए मानव की सेवा और्रर् इश्वर की पूजा, पौरुष तथा श्रद्धा, सच्चे नैतिक बल और आध्यात्मिकता में कोई अन्तर नहीं है । एक बार उन्होंने कहा था- कला, विज्ञान एवं धर्म एक ही सत्य की अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यम हैं ।
स्वामी विवेकानन्द के कई उद्देश्य थे । उन्होने भारत के कोने-कोने में भ्रमण करके भारत की जनता की व्यथा-कथा के प्रत्यक्ष दर्शन किए, उसके दुःख, दर्द को समझा तथा उसकी मानसिकता से परिचित हुए । आदिशंकराचार्य के वाद कन्याकुमारी से कश्मीर तक सारे भारत में र्सवाधिक भ्रमण करने वाले तथा देशवासियों की स्थिति का अध्ययन करने वाले स्वामी विवेकानन्द ही थे । उन्होंने यह अनुभव किया कि सबसे बडÞा काम धर्म की पुनः स्थापना करना है । बुद्धिवादी मनुष्यों की श्रद्धा धर्म पर से केवल भारत में नहीं, अपितु सभी देशों में हिलती जा रही थी । अतः यह आवश्यक समझा गया कि धर्म की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जाए, जो अभिनव हो, मनुष्य को ग्राहृय हो और जो उसके विजय-मार्ग में बाधा नहीं डाले । दूसरा काम हिन्दू धर्म पर, कम से कम हिन्दुओं की श्रद्धा कायम रखना था किंतु हिन्दू यूरोप से काफी प्रभावित हो चुके थे और अपने धर्म एवं इतिहास पर भी वे तब तक विश्वास करने को तैयार न थे, जब तक यूरोप के लोग उनकी प्रशंसा नहीं करे । तीसरा काम भारतवासियों में आत्मगौरव की भावना को प्रेरित करना था, उन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परम्पराओं के सुयोग्य उत्तराधिकारी बनना था । इन तीन कार्यों को स्वामी विवेकानन्द ने सफलतापर्ूवक सम्पन्न किया ।
उनके विषय में विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह कथन समीचीन है कि ‘यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकानन्द को पढÞना चाहिए । नेता जी सुभाषचन्द्र वोस के शब्दों में स्वामी विवेकानन्द का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देनेवाला धर्म था । नयी पीढÞी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति भक्ति भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की । उनके उद्गारों से लोगों में आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के भाव जगे हैं ।
११ सितम्बर १८९३ को शिकागो के आर्ट इन्स्टीच्युट का कोलम्बस हाँल ७००० लोगों से खचाखच भरा था । वहाँ स्वामी विवेकानन्द का ऐतिहासिक भाषण हुआ, जो आज भी विश्व की धरोहर के रूप में जाना जाता है । इस भाषण के सम्बोधनकारी वाक्यांश ‘सिर्स्र्टस एण्ड बर््रदर्स आँफ अमेरिका’ सुनकर सभी लोग कर्ुर्सियों पर खडÞे हो गए । विद्युत तरंगो का सा प्रभाव महासागर में उपस्थित जन समूह पर हुआ । तालियों की गडÞगडÞाहट से सभामण्डल गूंज उठा । भारतीय संस्कृति की ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा से उपस्थित  श्रोताओं का परिचय हुआ । वैश्विक परिवार के विचार की आधारशिला यह वाक्यांश ही था, जिस ने सभी बन्धुओं पर चुम्बकीय प्रभाव डाला । स्वामी विवेकानन्द ने अपने व्याख्यान में कहा- ‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिस ने संसार को सहिष्णुता तथा र्सार्वभौम संस्कृति दोनों की शिक्षा दी है । हम लोग सब धर्म के प्रति सहिष्णुता में ही विश्वास करते है, सब धर्मो को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का घमण्ड है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मो और देशो के उत्पीडितों तथा शरणार्थियों को आश्रय दिया है । मुझे आप को यह बतलाते हुए गर्व है कि हमने अपने पक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था । जिन्होने दक्षिण भारत आकर उसी वर्षशरण ली थी । जिस वर्षउनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया । था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गौरवान्वित अनुभव करता हूँ । जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट वंश को शरण दी और जिस का पालन वह अब तक कर रहा है । भाइयो ! मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ, जिसकी आवृत्ति मैं वचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामण्वि इव ।
जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकल कर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो ! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढÞे-मेढÞे अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझ में ही आकर मिल जाते हैं । यह सभा, जो अभी तक आयोजित र्सवश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है । स्वतः श्रीमद्भगवत् गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा है-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानर्ुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ र्सवशः -४।११) ।
जो मेरी ओर आता है- चाहे वह किसी भी प्रकार से हो- मै उस को प्राप्त होता हूँ । लोग भिन्न-भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं । साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है । वह पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है । उस को बार-बार मावनता के रक्त से नहलाती रही है । सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है । यदि ये वीभत्स दानवता न होती तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता । पर अब उनका समय आ गया है, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हू कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनी हर्ुइ है, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीडÞनो का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्युनिदान सिद्ध हो ।
इसके वाद १५, १९, २६ तथा २७ सितम्बर, सन् १८९र्३र् इ. को स्वामी विवेकानन्द के महत्वपर्ूण्ा भाषण विश्वधर्म-महासभा में हुए । तदनन्तर अमेरिका तथा यूरोप के विभिन्न नगरों में सैकडÞों भाषणों के आयोजन होते रहे । स्वामी विवेकानन्द ने एक योद्धा सन्यासी के रूप में सारे विश्व में अपनी अप्रतिम विद्वत्ता को सिद्ध कर दिया ।
प्रो. वैरोज को प्रो. राइटने स्व्ाामी विवेकानन्द को विश्व धर्म-महासभा में व्याख्यान देने की सिफारिस स्वरूप जो पत्र लिखा था, उसकी वह बात शत-प्रतिशत सिद्ध हर्ुइ- सारे अमेरिका के सभी प्रोफेसरों की विद्वत्ता एक तरफ और इस व्यक्ति की विद्वत्ता एक तरफ तो भी हम इनके बराबर नहीं हो पाएँगे, कृपया इन्हे धर्मसभा में भाग लेने की अनुमति प्रदान करें ।
स्वामी विवेकानन्द चार वर्षतक भिन्न-भिन्न देशों में व्याख्यान देते रहे । १५ फरवरी, १८९७ को वे स्वदेश लौटे, भारत के धराधाम पर आते ही भारत माता के चरणों में उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया तथा मातृभूमि की पवित्र रज को मस्तक पर लगाया । माँ की पावन माटी से अपने अपवित्र शरीर को पवित्र किया और कहा, ‘माँ ! मेरी अपवित्रता नष्ट कर दो, तुमसे दूर रह कर यह शरीर अपवित्र हो गया था, आज तुम्हारी गोद में मुझे शान्ति मिल रही है ।’
स्वामी विकोनन्द ने सेनापति की तरह अपने अभियान की योजना समझाते हुए अपने जनों को एकजुट होकर उठ खडÞे होने के लिए पुकारा- उतिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निवोधत । उन्होंने कहा- मेरी योजना है कि भारत में ऐसी संस्थाएँ हांे, जो हमारे शास्त्रों के सत्य को देश-देशान्तर में प्रसारित करने के लिए नवयुवकों को प्रशिक्षित करे । मुझे मनुष्य चाहिए और सब कुछ तो मिल जाएगा । परन्तु मुझे बलवान, उत्साही, विश्वासी सच्चे नव युवक चाहिए । ऐसे सौ नवयुवक संसार में क्रान्ति ला देगे । संकल्प सबसे बडÞी चीज है । वह र्सवजयी हैः क्योंकि वहर् इश्वर की देन है । शुद्ध दृढÞ संकल्प र्सवशक्तिमान है ।
यह एक र्सवमान्य तथ्य है कि विवेकानन्द आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं । विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानन्द से बढÞ कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता । श्री मद्भगवद्गीता की यह वाणी ‘वासुदेवः र्सवमिति समहात्मा सुदर्ुलभः’ स्वामी विवेकानन्द पर अक्षरशः लागू होती है । ऐसी दिव्य विभूति का अवतरण भारत में होना एक अभूतपर्ूव घटना है । भगिनी क्रिस्तिन का यह कथन रेखांकित करने योग्य हैं- ‘धन्य है वह देश, जिसने उन को जन्म दिया है, धन्य हैं वे मनुष्य, जो उस समय इस पृथ्वी पर जीवित थे, और धन्य हैं वे कुछ लोग, जिन्हें उनके चरणों में बैठने का सौभाग्य मिला ।’

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