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नीतिगत भ्रष्टाचार का एक नमूना– ‘गिरिबन्धु टी–स्टेट’ नाम से ही क्यों घबराते हैं केपी ओली ? : लिलानाथ गौतम

लिलानाथ गौतम
हिमालिनी अंक जून 024। आम लोगों के बीच एक कथन है– सभी पार्टी के सभी नेता भ्रष्टाचारी हैं । ऐसे कहनेवालों का मानना है कि सभी पार्टी के सभी नेतागण नीतिगत भ्रष्टाचार करते हैं । नेता और प्रशासकों की ओर से की भ्रष्टाचारजन्य कई गतिविधि इस कथन का कुछ हद तक पुष्टि भी करती है । ऐसे ही नीतिगत भ्रष्टाचारों में से एक है– बालुवाटार जमीन घोटाला काण्ड । जिसको हम लोग ललिता निवास घोटाला काण्ड के नाम से भी जानते हैं । इस काण्ड में सरकारी जमीन को व्यक्ति का नाम कर दिया गया है । इस काम में नेता और प्रशासकों की मिलीभगत थी । यह काम कमीसन के लिए हुआ था । जहां २ पूर्वसचिव के साथ कुल १३१ लोग कानूनतः दोषी पाए गए थे । इस प्रकरण में प्रमुख पार्टी के प्रमुख नेताओं पर ही अंगुली उठ गई थी । लेकिन कुछ कर्मचारियों को दोषी करार कर इस काण्ड को आज रफादफा कर दिया गया है । भ्रष्टाचारजन्य गतिविधियों में से बालुवाटार जमीन घोटाला काण्ड ऐसी काण्ड है, जहां दो पूर्व प्रधानमन्त्री से लेकर कई मन्त्री और मुख्य सचिवों का नाम जुड़ गया था । लेकिन राजनीतिक नेतृत्व को सफाई दी गई है ।
आज बालुवाटार जमीन घोटाला काण्ड को भी भुला देनेवाला दूसरा काण्ड सामने आ रहा है । वह है– गिरिबन्धु टी–स्टेट घोटला काण्ड । गिरिबन्धु टी–स्टेट के नाम पंजीकृत ५१ बीघा जमीन घोटाला संबंधी विषय को लेकर आज पूर्व प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली के ऊपर कई प्रश्न उठ रहा है । गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण नीतिगत भ्रष्टाचार का ही मामला है । यहां एक कम्पनी के नाम में पंजीकृत जमीन व्यक्तियों के नाम में ले जाने के लिए राज्यशक्ति का दुरूपयोग हुआ है । इस प्रकरण में मुख्य दोषी एमाले अध्यक्ष तथा पूर्वप्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली को माना गया है । यह प्रमाणित सत्य तो नहीं है, लेकिन कुछ तथ्यों से पता चलता है कि गिरिबन्धु टी–स्टेट काण्ड में नीतिगत भ्रष्टाचार के लिए प्रधानमन्त्री से लेकर कई मन्त्री और सचिवों की सहभागिता है ।
पिछली बार काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन शाह इस प्रकरण को बहस में लाए हैं । उन्होंने गिरिबन्धु टी–स्टेट के नाम में पंजीकृत जमीन को व्यक्ति के नाम में पंजीकृत कराने के लिए भूमिका निर्वाह करनेवाले १०१ व्यक्ति तथा संस्थाओं का नाम सार्वजनिक किया है, जहां पूर्व प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली का नाम भी है । मेयर बालेन ने कई बार ओली को लक्षित कर सामाजिक संचालन में पोष्ट किया है, जहां कहा गया है कि गिरिबन्धु टी–स्टेट घोटाला काण्ड के प्रमुख पात्र ओली ही हैं ।
पिछली बार जेष्ठ २१ गते एक भीडियो में पूर्व प्रधानमन्त्री तथा एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली मेयर बालेन के प्रति आक्रोशित दिखाई देते हैं । गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण को लेकर संसद् भवन परिसर में जब पत्रकारों ने एमाले अध्यक्ष ओली से प्रश्न किया, तब उन्होंने आक्रोशित मुद्रा में जवाब दिया कि इस विषय को लेकर मुझे नहीं, बालेन से प्रश्न करें । उसके बाद सिर्फ ओली ही नहीं, नेकपा एमाले के कई नेता तथा कार्यकर्ता मेयर बालेन पर आक्रामक बन गए ।
यहां एक उदाहरण प्रासंगिक है– काठमांडू महानगरपालिका वार्ड नं. २२ न्यूरोड क्षेत्र में हो रहा सड़क बिस्तार संबंधी विषयों को लेकर संघीय सरकार और स्थानीय सरकार आमने–सामने हो गयी है । इसके पीछे गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण, एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली और महानगरपालिका के मेयर बालेन साह ही प्रमुख कारण है । मेयर साह ने अपने फेशबुक पर एक पोष्ट करते हुए कहा है कि गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण में १० हजार करोड का घोटला हुआ है, घोटला को छिपाने के लिए नेकपा एमाले सम्पूर्ण राज्यशक्ति का दुरूपयोग कर न्यूरोड में महानगरपालिका के विरुद्ध उतर आई है । वैसे तो मेयर साह के इस आरोप को लेकर राजनीतिक वृत्त में आलोचना भी हो रही है । लेकिन पब्लिक उनको समर्थन कर रही है।
सिर्फ मेयर बालेन ही नहीं, प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने भी इस विषय को लेकर बहस की है । कांग्रेस महानमन्त्री तथा प्रतिनिधिसभा सदस्य (सांसद्) गगन थापा ने तो यहां तक कहा है कि राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी तथा गृहमन्त्री रवि लामिछाने और नेकपा एमाले तथा पार्टी अध्यक्ष केपीशर्मा ओली के बीच इस विषय को लेकर ‘गिभ एण्ड टेक’ हुआ है । उनका मानना है कि सहकारी घोटाला काण्ड में एमाले की ओर से गृहमन्त्री लामिछाने को बचाया जाएगा और गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण में गृह मन्त्रालय की ओर से कोई भी कारवाही आगे नहीं बढ़ेगी । महामन्त्री थापा ने संसद् में ही इस मुद्दा को उठाकर छानबीन समिति निर्माण के लिए आग्रह किया है ।
इसीलिए जब घी गिरिबन्धु टी–स्टेट की बात आती है तो एमाले अध्यक्ष तथा पूर्वप्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली घबराते हैं । इस प्रकरण को नजदीक से जाननेवाले कई व्यक्तियों का मानना है कि अगर कोई ईमानदार शासक का जन्म होता है और गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण में निष्पक्ष छानबिन हो सकती है, उस वक्त केपी ओली को जेल जना पड़ेगा । खैर ! आज के लिए यह एक सिर्फ कल्पनिक बात है !

आखिर क्या है गिरिबन्धु प्रकरण ?
वैसे तो आज गिरिबन्धु टी–स्टेट प्रकरण में प्रमुख दोषी पात्र के रूप में सिर्फ नेकपा एमाले और उसके अध्यक्ष केपीशर्मा ओली का नाम आ रहा है । लेकिन इसमें सिर्फ ओली ही दोषी हैं, ऐसा नहीं है ।
गिरिबन्धु टी स्टेट के पीछे एक लम्बी कहानी है । नीति और कानून की बात भी है । हां, यह ६१ साल से पहले की बात है । उस समय समाज में जमीनदारी प्रथा थी । एक ही व्यक्ति कई बीघा जमीन के मालिक होते थे । लेकिन वहीं कुछ व्यक्ति के पास घर बनाने की जमीन नहीं होती थी । उसी समय झापा के स्थायी निवासी प्रेमप्रसाद गिरि, कृष्ण गिरि और त्रिलोचन गिरी के नाम में बिर्तामोड में ३४३ बीघा १९ कठ्ठा जमीन थी । यह वि.सं. २०२० से पहले की बात है । उन लोगों ने ‘गिरिबन्धु टी–स्टेट’ कम्पनी के नाम से उक्त जमीन रखा था । वि.सं. २०२० साल में भूमिसुधार ऐन आ गया । ऐन अनुसार एक व्यक्ति २८ बीघा से अधिक जमीन नहीं रख सकता था । लेकिन कोई व्यक्ति उद्योग संचालन कर राज्य को सहयोग करता है तो उसको हदबंधी से अधिक जमीन दी जाती थी ।
इसी व्यवस्था के अन्तर्गत कृषिजन्य प्रयोजन के लिए उक्त जमीन ‘गिरीबन्धू टी–स्टेट’ के नाम में रह गया । उद्देश्य अनुसार यहां व्यवसायिक चाय उत्पादन हो रहा था । तत्कालीन समय में इस जमीन के प्रति खास आकर्षण भी नहीं था । लेकिन आज व्यापारिक दृष्टिकोण से उक्त जमीन आकर्षक बन गया है, जमीन की कीमत अरबों में हैं । इसीलिए उक्त जमीन को कम्पनी के नाम से व्यक्ति के नाम में पंजीकृत करने के लिए राज्य की ओर से जो क्रियाकलाप हो रहा है, उसी को ‘गिरिबन्धु टी–स्टेट घोटाला काण्ड’ कहा गया है ।
स्मरणीय है, कानून के अनुसार कम्पनी के नाम में पंजीकृत जमीन को व्यक्ति के नाम में लाना गैर कानूनी है । लेकिन नेता और प्रशासको की मिलीभगत में आज गिरिबन्धु टी–स्टेट की जमीन व्यक्ति के नाम में जा रही है । नेता और प्रशासक व्यापारिक वर्ग के कमीसन के चक्कर में पड़ने के कारण वहां स्मार्ट सिटी बनाने की योजना बन गई । इसके लिए कानून परिवर्तन करना था, जो राज्य की ओर से पहल किये बिना सम्भव नहीं था । लेकिन केपीशर्मा ओली के प्रधानमन्त्रित्वकाल में यह सम्भव हो गया । जो आज ओली के लिए सरदर्द का विषय बन रहा है ।

काम किस तरह हुआ ?
चाय उत्पादन के लिए ‘गिरिबन्धु टी–स्टेट’ को उक्त जमीन दी गई थी । जमीन देते वक्त शर्त रखी गई थी– जिस दिन यहां चाय उत्पादन नहीं की जाएगी, जमीन कानूतः सरकार की हो जाएगी । लेकिन धीरेधीरे परिस्थिति बदल गई । बिर्तामोड झापा जिला के लिए प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया । महेन्द्र राजमार्ग से सटी हुई जमीन का मूल्य भी बहुमुल्य हो गया । तब गिरिबन्धु टी–स्टेट के मालिकों को लगा कि अब चाय उत्पादन से अधिक मुनाफा जमीन प्लटिङ करने से हो सकता है । इसीलिए भू–माफिया से मिलकर उन लोगों ने यहां चाय उत्पादन के बदले ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की योजना बनायी । इसी सोच के साथ कानून बदल कर जमीन हथियाने का प्रपंच शुरु हुआ ।
चाय उत्पादन संबंधी उद्योग संचालन के लिए ही हदबंदी से अधिक जमीन गिरी भाईयों को दी गई थी । लेकिन धीरेधीरे उन लोगों ने जमीन का दुरूपयोग करना शुरु कर दिया था । इसका उदाहरण है, उसी जमीन में संचालित बस पार्क । उन लोगों ने ५१ रोपनी जमीन में किराये लेकर बसपार्क संचालन किया है ।
पूर्वप्रधानमन्त्री तथा एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली को माने तो वि.सं. २०५३ में ही कमीसन लेकर गिरिबन्धु टी–स्टेट की १९ बीघा जमीन बेच दिया गया था । उनका कहना है कि आज आकर उन्होंने तो सिर्फ कानून बना दिया है । इसीलिए ओली इसमें खुद को निदोर्ष दावा करते हैं । यहां एक तथ्य स्मरणीय है, वि.सं. २०५२ साल जेष्ठ ८ गते मन्त्रिष्रिषद् बैठक ने गिरिबन्धु के संबंध में एक निर्णय किया है । निर्णय अनुसार गिरिबन्धु की भगिनी संस्था ‘नाज टि स्टेट’ के लिए ५१ विगाह जमीन शेयर निवेष के लिए हस्तान्तरण किया जाएगा । उस समय मनमोहन अधिकार प्रधानमन्त्री थे । बाद में वि.सं. २०६० साल में उक्त जमीन बिक्री करने की अनुमति भी मन्त्रिपरिषद् ने दे दी । उस समय सूर्यबहादुर थापा प्रधानमन्त्री थे । इस तथ्यांक से स्पष्ट होता है कि गिरिबन्धु घोटाला काण्ड में सिर्फ केपीशर्मा ओली दोषी नहीं है । यहां ओली की एक बात में सच्चाई है– उन्होंने कानून बनाकर उक्त कार्य को वैधानिकता प्रदान किया है ।
अब प्रश्न उठता है– वि.सं. २०५२ और २०६० साल में मन्त्रिपरिषद् निर्णय से जो अवैध काम हुआ है, उसको रोकना चाहिए था या कानून बनाकर वैधानिकता देनी चाहिए थी ? नीयत में कोई खोट नहीं रहता तो अवैध कार्य को वैधानिकता देने की जरुरत नहीं होती थी । हां, वि.सं. २०७६ साल में प्रधानमन्त्री रहते वक्त केपीशर्मा ओली ने ही कानून संशोधन करते हुए गिरिबन्धु टी–स्टेट को जमीन दुरूपयोग के लिए रास्ता खेल दिया था । संशोधित कानून के अनुसार हदबंधी छूट की सुविधा लेकर अधिक जमीन लेनेवाले व्यक्ति और कंपनी जमीन को सट्टापट्टा या खरिद–बिक्री कर सकते हैं । अब इसी कानून का दुरूपयोग कर गिरिबन्धु टी–स्टेट के नाम में जो जमीन है, उसको अब अन्य जमीन से सट्टापट्टा किया जा सकता है । इससे भू–माफिया की योजना अनुसार गिरिबन्धु की वर्तमान जमीन में स्मार्ट सिटी बन सकता है ।

नीतिगत भ्रष्टाचार
यहां अरबों मूल्य की जमीन (गिरिबन्धु टी–स्टेट) को बंजर जमीन के साथ सट्टापट्टा करने का नीयत छुपा है । यही नीयत के साथ ओली नेतृत्व सरकार ने कानून संशोधन किया है । वैसे तो कानून संसद् से पास हुआ है । संसद् से पास करते वक्त कई सांसद् को इसकी भनक तक नहीं लगी । लेकिन उसी समय नेपाली कांग्रेस के सांसद् (राष्ट्रीयसभा सदस्य) राधेश्याम अधिकारी ने विरोध किया था । राज्य की नाम में जो जमीन होना चाहिए था, सट्टासट्टा के नाम उसको व्यक्ति में हस्तान्तरण किया जा रहा है । उनका मानना है कि गिरिबन्धु प्रकरण नीतिगत भ्रष्टाचार है । उन्होंने उस समय कहा था– ‘जिस वक्त २८ बीघा से अधिक जमीन कोई व्यक्ति नहीं रख सकते थे, हदबंधी से अधिक जमीन रखनेवालों से जमीन छीन ले गई । उसी उद्योग संचालन की उद्देश्य उक्त हदबन्दी से अधिक जमीन उन लोगों को दी गई । उसी समय बताया गया था कि उद्योग संचालन (चाय उत्पादन) के अलवा यहां अन्य काम नहीं होगा । अगर चाय उत्पादन नहीं की जाएगी तो जमीन राज्य के नाम होगी । ऐसी कानून बदल कर जमीन खरिद बिक्री के लिए जो कानून बना है, यह शर्म की बात है, नीतिगत भ्रष्टाचार है ।’
जब जमीन सट्टा सट्टा का कानून बन गया तो तत्काल ही मन्त्रिपरिषद् बैठक ने गिरिबन्धु टी–स्टेट को जमीन सट्टा पट्टा के लिए अनुमति दे दी । अर्थात् भू–माफिया के उद्देश्य अनुसार काम शुरु हो गया । तथ्य–प्रमाण तो नहीं है, लेकिन बताया जाता है कि इसके लिए नेता और प्रशासकों के अरबो रूपयां घूस के रूप में दी गई है और इसमें से प्रमुख पात्र हैं केपीशर्मा ओली । इसीलिए काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेन साह ने इस को १० हजार करोड़ की घोटाला कहा है ।
खैर ! मन्त्रिपरिषद् निर्णय विरुद्ध सर्वोच्च अदालत में रिट दायर हो गया । रिट दायर करनेवाले कानून व्यवसायियों ने भी कहा है कि गिरिबन्धु टी–स्टेट के नाम जो जमीन है, उसके बदले कोशी प्रदेश की कोई भी बंजर जमीन खरिद कर सरकार को देने की तैयारी है । इसके लिए विराटनगर से ताप्लेजुङ की कचनकवल तक जमीन की खोज हो रही है । मन्त्रिपरिषद् निर्णय अनुसार गिरिबन्धु की ओर कोशी प्रदेश के भीतर जहां भी जमीन खरीदा जा सकता है । लेकिन सर्वोच्च अदालत ने मन्त्रिपरिषद् द्वारा की गई उक्त निर्णय को रोक दिया है ।

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ओली की बौखलाहट !
सर्वोच्च अदालत द्वारा जारी आदेश अनुसार उक्त जमीन सरकार की है, सरकार के नाम में होना चाहिए । अदालती आदेश, प्रमुख प्रतिपक्षी दल और मेयर बालेन साह की ओर से शुरु बहस से ओली घबरने लगे हैं । इसी का परिणाम है– ओली की बौखलाहट ! जो जेष्ठ २१ गते एक भीडियो के रूप में देखने को मिला, जहां ओली प्रश्न करनेवाले पत्रकार से ही रुष्ट होते हैं और आक्रमक रूप में दिखाई देते हैं । – हिमालिनी जून २०२४ अंक से

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