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तमसो मा ज्योतिर्गमय. दीपावली स्वच्छता एवं प्रकाश का पर्व : कंचना झा

 

कंचना झा, काठमांडू, कार्तिक १५ ।


तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधकार में प्रकाश का उदय । कार्तिक अमवस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है । यह प्रकाश का पर्व है । रोशनी का पर्व है । इस पर्व में माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है । लक्ष्मी भगवान विष्णु की अद्र्धागिनी तथा धन, सम्पति वैभव की अधिष्ठात्री है । हिन्दू धर्म में माँ लक्ष्मी को बहुत ही मंगलकारी माना गया है । प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माँ लक्ष्मी की आराधना की जाती है ।
पुराणों की मान्यता है कि कार्तिक के इस अमवस्या की रात को विष्णुप्रिया माँ लक्ष्मी धरती पर उतरती है और घर – घर विचरण करती है । कहते हैं कि वो अपने निवास योग्य घर की तलाश करती है । इस रात्रि को वो सर्वत्र घूमती हैं आरै जहाँ कहीं उन्हें अपने निवास की अनुकूलता दिखाई पड़ती है वही रम जाती है ।
हिन्दू धर्म में जितने भी पर्व मनाएं जाते हैं उन सभी के पीछे बहुत से किस्से कहानियां जुड़ी हैं तो लक्ष्मी पूजा यानी दीपावली के साथ भी कुछ कहानियां जुड़ी हैं । पहली कहानी में कहा गया है कि आज ही दिन यानी दीपावली के दिन भगवान राम अपने चौदह वर्ष के वनवास को समाप्त कर माँ सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे । कहते हैं अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था । श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने अपने अपने घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया । कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी । तब से आज तक सभी हर वर्ष यह प्रकाश–पर्व हर्ष एंव उल्लास से मनाते हैं ।
दूसरी कहानी में लक्ष्मी के साथ साथ गणेश की पूजा की भी मान्यता है । लोग माँ लक्ष्मी के साथ ही भगवान गणेश की भी पूजा करते हैं । कहा गया है कि माँ लक्ष्मी चंचल होती है । एक जगह स्थिर होकर नहीं रहती हैं । उन्हें बुद्धि ज्ञान से ही अपने पास रखा जा सकता है । इसलिए माँ लक्ष्मी के साथ साथ बुद्धिविनायक श्री गणेश की भी पूजा की जाती है ताकि माँ लक्ष्मी के साथ साथ ज्ञान बुद्धि भी रहे । मन में धन को लेकर धमंड न हो ।
क्यों माँ लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश पूजन का चलन है ? तो इसे लेकर एक कहानी है जो कुछ इस तरह से हैं – कि एक बार माँ लक्ष्मी को यह अहंकार हो गया कि लोग उन्हें धन–धान्य के लिए पूजते हैं । उनकी आराधना करते हैं । उन्हें प्रसन्न करने के लिए विविध उपाय करते हैं । भगवान विष्णु को जब यह एहसास हुआ कि माता लक्ष्मी को अहंकार हो गया है तो उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि – माना कि आप धन धान्य की देवी हैं मगर आप अपूर्ण हैं । लक्ष्मी ने कहा मैं अपूर्ण हूँ कैसे ? तो विष्णु भगवान ने उन्हें बताया कि एक स्त्री तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक वह मातृत्व का सुख प्राप्त न कर ले । विष्णु जी की यह बात सुनकर मां लक्ष्मी बहुत आहत हुई । माँ लक्ष्मी उदास रहने लगी । एक दिन अचानक उनकी मुलाकात माँ पार्वती से होती है । माता पार्वती उनसे उदासी का कारण पूछती हैं तो वो माता पार्वती से कहती हैं कि आपके तो दो–दो पुत्र हैं, अतः आप मुझे गणेश को दे दें । पार्वती तो सोच में पड़ गई कि अब क्या कहें उनसे । माँ लक्ष्मी की मांग को सुनकर वो चिंतित हो गई । इससे पहले कि वो लक्ष्मी से कुछ कहें लक्ष्मी जी ने उनकी इस चिंता को भांप लिया और कहा कि मैं गणेश को यह वरदान देती हूं कि जहां भी मेरी पूजा की जाएगी, वहां गणेश भी मेरे साथ पूजे जाएंगे । ऐसा माना जाता है कि तभी से दीवाली के अवसर पर मां लक्ष्मी और गणेश जी की साथ में पूजा की जाने लगी
दीपावली दीपों का त्योहार है । चारों ओर रोशनी ही रोशनी देखने को मिलती है । रोशनी ही रोशनी का त्योहार है दीपावली । सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है । दीपावाली यही चरितार्थ करती है– असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है ।
इसकी तैयारी को लेकर अगर बात की जाए तो कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियां आरंभ हो जाती हैं । लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं । घरों में मरम्मत, रंग–रोगन, सफेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ सुथरा कर सजाते हैं । बाजारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर–मोहल्ले, बाजार सब साफ–सुथरे व सजे–धजे नजर आते हैं ।
धार्मिक दृष्टिकोण से दीपावली का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । गृहस्थी अथवा सांसारिक जीवन में ही नहीं , संन्यास्त एवं आध्यात्मिक जीवन के लिए भी इस संसार में धन सम्पति का अनिवार्य स्थान है । दीपावली के दिन इसी धन संम्पति की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी की पूजा की जाती है । शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपावली के दिन रात जागरण करके माँ लक्ष्मी की पूजा करता है उसके घर में लक्ष्मी का निवास होता है तथा जो आलस्य और निद्रा में पड़कर दीपावाली की रात को यूँ ही गँवा देता है, उसके घर से लक्ष्मी रुठकर चली जाती है । इस दिन और रात के जागरण का तात्पर्य है अपने उत्कृष्ट पुरुषार्थ पर अवलंबित होना और पुरुषार्थी को लक्ष्मी प्राप्ति अनिवार्य है ।
इस पूजा में मूर्ति पूजा के साथ ही व्यसायी तथा व्यापारी वर्ग बहीखाता, लेखनी दावात आदि का भी पूजन करते हैं । पहले लोग मिट्टी के ही दीप जलाते थे । समय परिवत्र्तन के साथ बिजली बत्ती का चलन आ गया तो घरों को सजाने के लिए अब लोग बिजली बत्ती का ही प्रयोग करने लगे । मिट्टी के दिए अब केवल पूजन के लिए ही प्रयोग किए जाते हैं ।

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