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भारत में आतंकवाद का जड़ ? : मुरलीमनोहर तिवारी

 

मुरलीमनोहर तिवारी सीपू, हिमालिनी अंक मार्च 025। आतंकवाद आज की दुनिया में एक ऐसा शब्द बन गया है, जो भय और असुरक्षा का प्रतीक है । यह न केवल भारत बल्कि विश्व के हर कोने में एक गंभीर समस्या बन चुका है । आतंकवाद का अर्थ है समाज में हिंसा और डर फैलाकर अपने राजनीतिक, धार्मिक, या वैचारिक लक्ष्यों को प्राप्त करना । आतंकवाद केवल एक देश या एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक समस्या बन चुका है । भारत, जो अपनी विविधता, लोकतंत्र और शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व के लिए जाना जाता है, आतंकवाद की इस समस्या से लंबे समय से जूझ रहा है । भारत मे आतंकवाद की जड़े इतनी गहरी है कि इसे समझने के लिए १९४७ में भारत के बंटवारे के बाद से रची जा रही साजिश को समझना पड़ेगा ।
पहली बात, “ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” जिसे ब्रिटिश ने १९०६ मे बनवाया था, जिसके सुप्रीमों “मोहम्मद अली जिन्ना” थे । जब १५ अगस्त १९४७ को भारत आजाद हुआ था, तो उस समय भारत के टुकड़े करके “ऑल इंडिया मुस्लिम लीग” पाकिस्तान चली गई । बंटवारे के बाद भारत मे इस पार्टी का अस्तित्व नहीं रहा, लेकिन उसी मुस्लिम लीग का भारत के अंदर एक वर्ग बचा हुआ था, छुपा हुआ था । जिसने आजÞादी के बाद १९४८ में “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”का स्थापना किया और “ऑल इंडियन मुस्लिम लीग” (जिन्ना) के गुप्त एजेंडे को अपनाया । इसकी स्थापना मद्रास के मोहम्मद इस्माइल ने किया था ।
भारत में केरल ही इकलौता ऐसा राज्य है, जहां “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग” का राजनीतिक आधार है । इस पार्टी ने केरल में २०१९ के लोकसभा चुनाव में ५.४८ फीसदी वोट हासिल किए थे और दो सीटों पर जीत हासिल की थी । इसके अलावा पार्टी ने तमिलनाडु में भी एक सीट जीती थी । २०२१ के विधानसभा चुनाव में ८.२७ फीसदी वोट हासिल किए थे और १५ सीटों पर जीत हासिल की थी । यह दशकों से “कांग्रेस” के नेतृत्व वाले “यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट” (यूडीएफÞ) का हिस्सा रही है ।
दूसरी बात, जब ब्रिटिश की हुकूमत भारत में थी, तो उस समय एक संगठन और था जिसका नाम था “जमात–ए–इस्लामी” जिसकी स्थापना १९४१ में इस्लामी विचारक “मौलाना अबुल आला मौदूदी” ने “खुदा की सल्तनत” स्थापित करने के मकसद से की थी । भारत के बंटवारे के बाद १९४८ में “जमात–ए–इस्लामी हिंद” की स्थापना हुई । २४० सदस्यों ने इस पार्टी की बैठक में भाग लिया और “मौलाना अबुलैस नदवी” को अपना नेता चुना । लखनऊ के मलीहाबाद में इस पार्टी का मुख्यालय बनाया गया । १९४९ में इसे रामपुर स्थानांतरित किया गया और १९६० में नई दिल्ली में “जमात–ए–इस्लामी हिंद” का मुख्यालय बना दिया गया ।
१९४७ में भारत के बटवारे के पश्चात, “जमात–ए–इस्लामी” का समूह भारत और पाकिस्तान में अलग–अलग स्वतन्त्र संगठनों में विभाजित हो गया । “जमात–ए–इस्लामी–पाकिस्तान”, “जमात–ए–इस्लामी–बांग्लादेश” और “जमात–ए–इस्लामी हिन्द” । “जमात–ए–इस्लामी” से सम्बन्धित और प्रेरित अन्य समूह कश्मीर, अफगानिस्तान और ब्रिटेन में विकसित हुए । गौरतलब “जमात–ए–इस्लामी– पाकिस्तान” ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता और पाकिस्तान के टूटने का कड़ा विरोध किया था और बंगलादेशियों के नरसंहार में शामिल रहा ।
अगस्त २०१३ को, बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने “जमात–ए–इस्लामी–बांग्लादेश” का पंजीकरण रद्द कर दिया और फैसला सुनाया कि पार्टी, राष्ट्रीय चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य है । “जमात–ए–इस्लामी–बांग्लादेश” ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हमला करने का काम किया । मानवाधिकार संस्था “एमनेस्टी इंटरनेशनल” के रिपोर्ट अनुसार “जमात–ए–इस्लामी–बांग्लादेश” और छात्र, शिविर लगातार बांग्लादेश में हिन्दुओं को निशाना बनाते रहे हैं । बांग्लादेश में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों का आकलन है कि इस संगठन ने साल २०१३ से २०२२ तक बांग्लादेश में हिन्दुओं पर ३६०० हमले किए ।
भारत मे १९५० के बाद लगभग १९७० तक दो दशक के दौरान “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग” और “जमात–ए–इस्लामी हिंद” ने अपनी राजनीति, संपर्क और सदस्य संख्या बढ़ाने का काम किया । १९९० के दशक में इन्होंने रणनीति बदली । १९७० में जो “जमात–ए–इस्लामी हिंद” थी इसने एक विद्यार्थी संगठन बनाया । यह विद्यार्थी संगठन २५ अप्रैल १९७७ को अलीगढ़, उत्तर प्रदेश में बना और इस विद्यार्थी संगठन का नाम रखा गया “स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया” (सिमी) । “सिमी” को “मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दिकी” का ईजाद माना जाता है । सिद्दिकी अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडीज का प्रोफेसर था ।
शुरुआत में “सिमी” को “जमात–ए–इस्लामी हिंद” के विद्यार्थी संगठन के रूप में जाना जाता था । जिसमे वे इस्लाम को ‘वे ऑफ लाइफ’ मानते थे, जिसका शुरुआती मकसद भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का था, जबकि “जमात–ए–इस्लामी हिंद” धर्मनिरपेक्ष राज्य की बात करता था ।
“सिमी” ने जब अपना कार्य शुरू किया तो १९७७ में उसने कहा कि “हम मुस्लिमों के विकास के लिए, मुस्लिमों को एकजुट करना चाहते हैं” । लेकिन जैसे ही १९८० का दशक आया “सिमी” ने अपने उद्देश्य बदलने शुरू कर दिए । सबसे पहले उसने कहा की उनका एकमात्र लीडर “अल्लाह” है । हमारा लीडर कोई भारत का प्रधानमंत्री या कोई और अन्य नेता नहीं बल्कि “अल्लाह” है ।
दूसरा, उसने कहा कि “भारत का संविधान हमारा संविधान नहीं है हमारा संविधान हमारे लिए कुरान है” । इसी के साथ “सिमी” ने कहा कि “हम भारत को एक इस्लामिक रिपब्लिक बनाना चाहते हैं” ।
उसी दौरान १९८० में “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, “जमात–ए–इस्लामी हिंद” और इसका विद्यार्थी संगठन “स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया” (सिमी), के साथ गठबंधन करके भारत के अंदर “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” (आरएसएस) को टक्कर देने के लिए “इस्लामिक सेवक संघ” बनाया ।
“इस्लामिक सेवक संघ” के तहत भारत को इस्लामिक रिपब्लिक देश बनाने के लिए, मुस्लिमों को एकजुट करना और ट्रेनिंग देना शुरू किया । इनका कार्य बिना किसी शोर–शराबे के गुपचुप तरीके से चल रहा था । समस्या तब हुई जब १९९० में मुंबई में ब्लास्ट हुए और ब्लास्ट के दौरान दाऊद इब्राहिम के साथ “आईएसआई–पाकिस्तान” का हाथ मालूम हुआ । उसी जाँच और तहकीकात के दौरान “इस्लामिक सेवक संघ” का नाम आया जो “आईएसआई” के सीधे संपर्क में थी और “आईएसआई” से पैसा लेकर लोगों को मुंबई–महाराष्ट्र इसके आसपास के इलाकों में भारत विरोधी गतिविधियां संचालित कर रही थी ।
भारत सरकार ने १९९४ में “इस्लामिक सेवक संघ” जो कि “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, से जुड़ा था उसको प्रतिबंधित कर दिया । समझने वाली बात है कि,“इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, जिसका भातृ संगठन “इस्लामिक सेवक संघ” था, मात्र उसे ही प्रतिबंधित किया गया जबकि मूल संगठन “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, को प्रतिबंधित नही किया । गौरतलब है कि “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, दशकों से “कांग्रेस” के नेतृत्व वाले “यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट” (यूडीएफÞ) का हिस्सा रही है ।
“इस्लामिक सेवक संघ” प्रतिबंधित होने के बाद १९९४ से “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट” एक नया संगठन बन गया जिसमें पुराने “इस्लामिक सेवक संघ” के सारे लोग आ गए । ये गौर करने वाली बात है कि आगे आने वाले समय में जैसे ही किसी संगठन पर कोई प्रतिबंध लगता था, उसी संगठन के सारे लोग, एक नया रूप धारण करके, एक नया नाम धारण करके सामने आ जाते थे ।
१९९४ में “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट” जैसे ही बना उसने बोलना शुरू कर दिया कि “हम तो यहां पर ‘दावा’ के लिए आए हैं” । ‘दावाह’ या ‘दावह’ यह एक अरबी शब्द है । इसका अर्थ ‘इस्लाम में आमंत्रण’ और ‘इस्लामिक राज्य की स्थापना करना’ है ।
इसके लिए “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट” ने दो संगठन बनाया “सत्य सारिणी” और “मरकाजुल हिदाया” । इन संगठनों का प्रयोग करके वही काम शुरू किया जो “इस्लामिक सेवक संघ” पहले कर रहा था । यह कार्य साल २००२ तक चलता रहा । जब २००२ में अमेरिका में ९÷११ का आतंकी हमला हुआ उसके बाद पूरे भारत वर्ष में “सिमी” के जो लोग थे, जो “जमात–ए–इस्लामी हिंद” से पैदा हुए लोग थे, इन लोगों ने ९÷११ हमले के तुरंत बाद, पूरे भारतवर्ष में रैलियां निकालकर, उन रैलियों में “ओसामा बिन लादेन” के पोस्टर के साथ कहा कि “ओसामा बिन लादेन” हमारा लीडर है । गौरतलब है कि यही “सिमी” १९८० में कहता था कि उनका एकमात्र लीडर “अल्लाह” है । हमारा लीडर कोई भारत का प्रधानमंत्री या कोई और अन्य नेता नहीं बल्कि “अल्लाह” है ।
उनकी गतिविधि को देखते हुए २००१ में भारत सरकार ने “स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया”(सिमी) को प्रतिबंधित कर दिया । प्रतिबंधित सिमी के सारे कार्यकर्ता भूमिगत हो गए । उसी समय “लश्र–ए–तैयबा” जो पाकिस्तान में बैठी थी, उसके ऊपर भी दबाव पड़ना चालू हुआ क्योंकि ९÷११ के बाद अमेरिका ने पहली बार आतंकी हमले को अपने ऊपर आते हुए देखा था । अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव दिया कि “लश्र–ए–तैयबा” जैसे संगठन जिन्हें पाकिस्तान पनाह दे रहा है, उसे तुरंत बंद करें ।
“लश्र–ए–तैयबा” की शुरुआत अफगानिस्के कुन्र प्रोविंस में वर्ष १९८७ में हुई थी । इसे “हाफिज सईद”, “अब्ुल्आजम” और “जफर इकबाल” ने शुरू किया । वर्ष २००८ में मुंबई आतंकी हमलों के बाद “हाफिज सईद” ने “लश्र–ए–तैयबा” की जगह “जमात–उद–दावा” की शुरुआत की । इस संगठन को “हाफिज” और पाक दोनों ही चैरिटेबल ट्रस्े रहे, जबकि ५ दिसंबर २००१ में अमेरिका ने इसे अपनी आतंकी लिस्ें शामिल किया । भारत ने भी इसे प्रतिबंधित कर दिया । ३० मार्च २००१ को ब्रिटेन ने इसे प्रतिबंधित कर दिया । २६ दिसंबर २००१ को अमेरिका ने इसे “एफटीओ” यानी “फॉरेन टेररिस्‘ार्गनाइजेशन” करार दिया । यूनाइटेड नेशंस ने मई २००५ में इस पर प्रतिबंध लगाया ।
२००१ में कराची में “हाफिज सईद”, “दाऊद इब्राहिम” और “आईएसआई” के आला अधिकारी मिलकर एक रणनीति तय किए, कि अगर “लश्र–ए–तैयबा” को बंद करना है, तो उसकी गतिविधियां कश्मीर में बंद करते हैं, बाकी जगह चलने देते है और “लश्र–ए–तैयबा” को कश्मीर छोड़कर पूरे भारत में आतंकी कार्य करने की सहमति और मदद देते हैं ।
भारत में अगर गतिविधियां चलानी है, तो भारत में पैसा जाना पड़ेगा, पैसे कैसे पहुचेंगे ? पैसा पहुंचाने के लिए हवाला का रास्ता था । “आईएसआई” ने पैसा पहुचाने के लिए अपने पुराने नेटवर्क को चुना, जो लोग लंबे समय से समर्थक थे और वो लोग और कोई नहीं बल्कि “माओवादी नक्सल” थे जो “आईएसआई” से १९९० के दशक से पैसा ले रहे थे ।
“नक्सलियों” के जितने भी संगठन भारत सक्रिय थे, सभी बिखरे हुए थे । “आईएसआई” के कहने पर “नक्सलियों” के सारे संगठन को एकजुट करके २००२ में “कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया” (माओवादी) का गठन किया गया ।
जब “कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया” (माओवादी) गठन हुई तो तय हुआ कि हवाला द्वारा “आईएसआई” पैसा पहुंचाएगी । दूसरा यह निर्णय लिया गया कि अब “आईएसआई” पाकिस्तान में “दाऊद इब्राहिम” की मदद लेकर भारत के अंदर जो हाल ही में “सिमी” को प्रतिबंधित किया गया है, उसके लोगों को जोड़कर “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट”,” इस्लामिक सेवक संघ”, “जमात–ए–इस्लामी हिंद”, “इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग”, के लोगों को भी जोड़कर भारत के अंदर आतंकी गतिविधियां कराएगी । यह कार्य २००५ में पूरा हुआ । इसका नाम रखा गया “कराची प्रोजेक्ट” ।
सबसे पहली गतिविधि यह हुई इन सभी प्रतिबंधित संगठन को जोड़कर २००६ में “पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया” (पीएफआई) बनाई गई । “पीएफआई” एक भारतीय मुस्लिम राजनीतिक संगठन बनी, जो मुस्लिम अल्पसंख्यक राजनीति की एक चरमपंथी और विशिष्ट शैली में संलग्न थी । इसे हिंदुत्व समूहों से लड़ने के लिए गठित किया गया । सबसे बड़ी बात यह थी कि जब २००६ में “पीएफआई” का गठन हुआ, तो गौर कीजिए कि इसका गठन एक कॉन्फ्रेंस में हुआ । जिसका नाम था “इन पावर इंडिया कॉन्फ्रेंस” । कॉन्फ्रेंस का नाम इस प्रकार रखा गया कि इसका इस्लामिक संगठनों से कोई लेना–देना नही दिखे ।
इस प्रकार “पीएफआई” बहुत बड़ी संगठन बनकर उभरी, इसके साथ–साथ यह हुआ कि “पीएफआई” के अंदर एक छोटा सा माइक्रो मॉड्यूल क्रिएट किया गया, २००७ में यह माइक्रो मॉड्यूल था “इंडियन मुजाहिदीन” के द्वारा भारत के मुसलमानों से, भारत के अंदर ही आतंकी हमला करवाना । आतंकी हमला कराने में जर्मन बेकरी ब्लास्ट, बनारस ब्लास्ट, अहमदाबाद ब्लास्ट और भारत के अन्दर जो छोटे–बड़े ब्लास्ट हुए, यह सारे “इंडियन मुजाहिदीन” के किए हुए थे । २००७ से लेकर जबसे “इंडियन मुजाहिदीन” पैदा हुई जिसका पोषक था “पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया” ने २००९ तक भारत मे बहुत आतंकी हमले किए ।
इसमे दिक्कत तब आई जब भारत के “आईबी”, “रॉ”, “एनआईए” और “सीबीआई” जो इन सब पर नजर रखे हुए था और इनपर शिकंजा कसना शुरू कर दिया । पाकिस्तान को भी समझ आ गया कि आने वाले समय में यह संगठन “इंडियन मुजाहिदीन” लंबे समय तक चल नहीं पाएगा । इसके बाद “आईएसआई” को यह डर लगा कि “इंडियन मुजाहिदीन” अगर कल को पकड़ा जाता है तो हमारे पास कुछ न कुछ उसी प्रकार का एक पॉलिटिकल फ्रंट भी होना चाहिए । तब सभी संगठनों को मिलाकर २००९ में “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” बनी ।
यह ऐसी राजनीतिक दल बनी जो की पहली बार निर्वाचन आयोग में दर्ज करके मान्यता प्राप्त थी । इसमें रणनीति यह थी, कि अगर कल को कोई ऐसी गतिविधि होती है, जिससे “पीएफआई”, “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट” या “इंडियन मुजाहिदीन” पर भी कोई आंच आए तो कम से कम “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” एक ऐसी राजनीतिक दल होगी जिसके ऊपर कोई आंच नहीं आ पाएगी, क्योंकि यदि कोई राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग में दर्ज होकर मान्यता प्राप्त होती है तो निर्वाचन आयोग के नियम अनुसार उस दल की मान्यता रद्द करने की कोई कानूनी व्यवस्था नही है ।
ये “आईएसआई” की सोची समझी रणनीति थी कि कल कोई राजनीतिक दल पर शिकायत दर्ज होती है, तो ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ? उस राजनीतिक दल के लोगों को भारत सरकार गिरफ्तार कर सकती है लेकिन वह राजनीतिक दल हमेशा जिंदा रहेगी । एक मोर्चा हमेशा जिंदा रहेगा ।
२०१४ में जैसे ही सरकार बदली “आईएसआई–पाकिस्तान” ने अपनी रणनीति तुरंत बदल दी । उसने “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” और “पीएफआई” को एकजुट कर पूरे भारत में मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम करवाने लगा । २०१५ में इनका अभियान शुरू हुआ कि भारत में “असहिष्णुता” बढ़ रही है “मॉब लिंचिंग” हो रही है । इसके बहाने कुछ खास विचारधारा के साहित्यकार और लेखकों ने अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया ।
इनके कार्यक्रम में भाग लेने वालों में ज्यादातर “सीपीआई” (माओवादी) के लोग थे । उनपर भारत सरकार कार्रवाई कर रही थी । उन नक्सलवादियों पर कड़ाई होने पर जो नक्सलवादी बुद्धिजीवी वर्ग के थे, वह वर्ग जो मुख्यतः संचार तंत्र और प्रबुद्ध मंडल से जुड़ा हुआ था । वह वर्ग जो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बनकर घूम रहे थे । उन्होंने शहरों में, नक्सल को जन्म दिया ।
“नक्सल पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया”, “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” से जुड़े यह “अर्बन नक्सल” जैसे ही आए, इनको “पीएफआई”, “एसडीपीआई”, की तरफ से एक बुद्धिजीवी वर्ग मिल गया, जो मीडिया स्तर पर इनके लिए दुष्प्रचार करने लगा । फिर इन अर्बन नक्सलियों ने असहिष्णुता और भीड प्रक्षेपण (मॉब लिंचिंग) का माहौल बना कर देश मे भय पैदा करना शुरू किया ।
जैसे ही ये गतिविधियां आगे बढ़ रही थी, २०१९ दो–तीन बातें हुईं । सबसे पहले “सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट” पास हुआ, उसके बाद उन्होंने शाहीनबाग में विरोध प्रदर्शन का प्रयोग किया । उस प्रयोग से विरोध की नई रूपरेखा उभर कर आई, जिसमे विरोध प्रदर्शन में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को शामिल किया जाए, विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन लोगो को जोड़ा जाए, गायक और सिनेमा जगत के कलाकारों को जोड़ा जाए और उनके हाथ मे भारत का झंडा, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की पÞmोटो और संविधान की प्रतियां रखी जाए और ये माहौल बनाया जाए कि लोकतंत्र खÞतरे में है, संविधान खÞतरे में, देश मे तानाशाही है ।
शाहीन बाग के बाद यही सूत्र लगा कर २०२० में दिल्ली के दंगों को अंजाम दिया गया । जब भारत सरकार ने कश्मीर से “अनुच्छेद तीन सौ सत्तर” को हटा दिया तब विरोध प्रदर्शन में यही रणनीति प्रयोग हुई । इसी तरह किसान आंदोलन के नाम पर पूरा डेढ़ साल विरोध प्रदर्शन किया गया ।
भारत सरकार देख चुकी थी कि “पीएफआई”, “एसडीपीआई” और “अर्बन नक्सल” ये तीनों के तीनों मिलकर शाहीन बाग में अपनी कुटील गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं । तो भारत सरकार ने २८ सितंबर, २०२२ को “पीएफआई” को प्रतिबंधित कर दिया । अभी तक “इस्लामिक सेवक संघ”,” पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया” प्रतिबंधित हो चुका था, अब “नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट” और “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” जीवित है, सक्रिय है और जाहिर सी बात है कि प्रतिबंधित संगठन के सारे लोग इन दोनों संगठन में आ गए ।
जैसे ही “पीएफआई” प्रतिबंधित हुई उसके तुरंत बाद “सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया” ने चार अलग–अलग प्रकार के संगठन बनाए । पहला संगठन “कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया” बनाया । इसने पूरे स्टूडेंट्स मूवमेंट को पकड़ लिया, खासकर विश्वविद्यालय में जहां पर वामपंथी चिन्तक रहते थे उन्होंने “अफजल हम शर्मिंदा है, तेरे कÞातिल जिंदा है” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगवाने लगे ।
दूसरा संगठन बनाया “नेशनल वुमन फ्रंट” । यह संगठन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान आंदोलन और शाहीनबाग के बाद इनलोगों को ये बात समझ आ गई कि भारत मे कोई भी विरोध प्रदर्शन करना है तो महिलाओं की जरूरत पड़ेगी, इसलिए “नेशनल वुमन फ्रंट” में महिलाओं को जोड़ने के लिए दिहाड़ी पैसा देकर महिलाओं को लाया जाने लगा, उन्हें विरोध प्रदर्शन में पुलिस–प्रशासन के सामने लाकर मुकाबला करने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा । किसी भी प्रदर्शन या दंगे में ये महिलाएं पुलिस और दंगाइयों के बीच सुरक्षा और बचाव के काम आने लगी ।
तीसरा संगठन बना “रिहैबिलिटेशन इंडिया फाउंडेशन” जो कोरोना के समय से चल रहा था । कोरोना आपदा के समय इनकी सोच थी, अगर इसमे भारत फंसता है, कोरोना प्रबंधन को लेकर लोगो को उकसाया जाए या भारत मे मंदी आती है तो उसे सरकार की नाकामी दिखाकर लोगो को भड़काया जाए ।
चौथा संगठन बना “इन पावर इंडिया फाउंडेशन” इस संगठन का उद्देश्य पहले के “इन पावर इंडिया कॉन्फ्रेंस” जिसमें “पीएफआई” का गठन किया था, उसी “इन पावर इंडिया कॉन्फ्रेंस” को “इन पावर इंडिया फाउंडेशन” बना दिया ।
इसी प्रकार “सत्य सारिणी”, “मरकाजुल हिदाया”, “कैम्पस फ्रंट आफ इंडिया”, “आल इंडिया इमाम काउंसिल” (एआईआईसी), “नेशनल कन्फेडरेशन आफ ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन” (एनसीएचआरओ), “रिहैब फाउंडेशन इंडिया” (आरआईएफ), “नेशनल वुमन फ्रंट”, “जूनियर फ्रंट”, “एम्पॉवर इंडिया फाउंडेशन” जैसी संस्थाएं मानवाधिकार संगठन का चोला पहनकर काम कर रही है । आतंकी संगठनों का नाम बदला, काम वही रहा ।
२०२३ में जब “इजराइल” और “गाजा” की लड़ाई चालू हुई तो इन सभी संगठनों ने “गाजा” के समर्थन में प्रदर्शन शुरू किया । जैसे ही यह खत्म हुआ इनको समझ आया कि गाजा के मामले में उपलब्धि नहीं मिल रहा है तो इन्होंने अपनी रणनीति बदली । इन्होंने दलित, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिमों को जोड़ना चाहा । बाद में इसी कड़ी में पंजाबी, सिख, खालिस्तानी समर्थक, पूर्वांचलियों और दक्षिण भारतीयों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे है । इसी रणनीति के तहत जातिगत जनगणना, परिसीमन और हिंदी विरोध को जोरदार तरीकों से उछाला जाने लगा है ।
इसके इतर हिंदू आस्था पर प्रहार करने की रणनीति है, चाहे वह अयोध्या, मथुरा, काशी, संभल हो या कुम्भ को लेकर अफवाह फैलाने का हो या होली, दसहरा, दिवाली पर दुष्प्रचार करना, भारत के महापुरुषों की छवि धूमिल कर, भ्रमित हिंदुओं को अपने साथ लेकर ये दिखाना की “वीआर ऑल हेयर वन साइड” ।
उसके बाद इनसभी को जोड़कर भारत सरकार के किसी भी नीति चाहे वह वकÞ्पÞm संशोधन बिल या जनसंख्या नियंत्रण कानून, या वन नेशन वन एलेक्शन हो, इन मुद्दों पर बड़ा आंदोलन खड़ा करके, गृहयुद्ध जैसी बाध्यात्मक परिस्थितियों को खड़ा करने का लक्ष्य है । इनका विरोध जितना लंबा चलेगा इनके लिए उन्ही ही लाभदायक होगा । उससे जनता परेशान होगी, सरकार समस्या समाधान में असफल होगी तो सरकार की लोकप्रियता में गिरावट आएगी और २०२८ तक लोगों के मन में ये बात बैठ जाए कि केंद्र सरकार को बदला जाए ।
आतंकवाद भारत के विकास और शांति के लिए एक गंभीर चुनौती है । इसे केवल सरकार, सुरक्षा बलों और कानूनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता । समाज के हर वर्ग को इसके खिलाफ एकजुट होना होगा और इनके साजिश की बारीकियों को समझना होगा । आतंकवाद से लड़ने के लिए शिक्षा, जागरूकता, और सामाजिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी । सभी को यह समझना होगा कि आतंकवाद केवल हिंसा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और संस्कृति पर हमला है । इसलिए, सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि भारत एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण देश बन सके ।
(हिमालिनी मासिक, अप्रील २०२५ अंक से)

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