त्रिभुवन विश्वविद्यालय उपप्राध्यापक परीक्षा: मांग के मुकाबले केवल एक-तिहाई ही उत्तीर्ण
काठमांडू, असार १३, २०८ । त्रिभुवन विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा स्थायी उपप्राध्यापक नियुक्ति के लिए आयोजित लिखित परीक्षाओं में अभ्यर्थियों की सफलता दर अत्यंत निराशाजनक रही है। विभिन्न संकायों के लिए माँगे गए पदों के मुकाबले मात्र एक-तिहाई ही उम्मीदवार सफल हो सके हैं।
सेवा आयोग द्वारा हाल ही में प्रकाशित नतीजों के अनुसार, व्यवस्थापन, शिक्षा, कानून और मानविकी तथा सामाजिक शास्त्र संकाय के 275 पदों के लिए आयोजित लिखित परीक्षा में केवल 91 अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए हैं, जो कुल का मात्र 33% है। वहीं, विज्ञान तथा प्रविधि संकाय में 168 पदों के लिए 58 उम्मीदवार सफल हुए, जो 34% के आसपास है।
कई विषयों जैसे कानून, कंप्यूटर एप्लिकेशन, इतिहास, खेल विज्ञान, परामर्श मनोविज्ञान, हिंदी, मैथिली, और विज्ञान शिक्षा में कोई भी अभ्यर्थी लिखित परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सका। उदाहरण के तौर पर, कानून संकाय में 22 पदों के लिए 30 परीक्षार्थी उपस्थित थे, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ।
व्यवस्थापन संकाय में 75 पदों के लिए 368 परीक्षार्थी थे, जिनमें से केवल 5 ही सफल हुए। अंग्रेजी और अर्थशास्त्र जैसे विषयों में भी सफलता दर काफी कम रही।
वैज्ञानिक और इंजीनियरिङ अध्ययनमा पनि स्थिति कमजोर
विज्ञान तथा प्रविधि अध्ययन संस्थान में भौतिकशास्त्र के 25 पदों के लिए केवल 3, रसायनशास्त्र के 24 पदों के लिए 9, और गणित के 20 पदों के लिए सिर्फ 2 उम्मीदवार ही पास हुए। इंजीनियरिङ शाखा में भी इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिङ में 6 पदों के लिए कोई नहीं, जबकि कंप्युटर, सिविल, इलेक्ट्रिकल जैसे विषयों में भी नतीजे अपेक्षा से बेहद कम आए।
कुछ विषयों जैसे रिन्युएबल एनर्जी और मेकानिकल इंजीनियरिङ में जरूर मांग से अधिक संख्या में उम्मीदवार पास हुए।
चिकित्सा शिक्षातर्फ नतिजा और भी खराब
चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में कार्डियोथोरासिक सर्जरी, रेडियोलोजी, रिमेटोलोजी आदि में एक-एक पद के लिए कोई भी उम्मीदवार सफल नहीं हो सका।
कारण: तैयारियों की कमी और परीक्षा प्रणाली पर अविश्वास
सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष लालु पौडेल का मानना है कि पढ़ने और पढ़ाने की गंभीरता वाले संकायों में ही अपेक्षाकृत बेहतर नतीजे आए। उनके अनुसार, कई संकायों में मनोमानी प्रवृत्ति और तैयारी की कमी के कारण परीक्षार्थी असफल हुए। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञापन प्रकाशित होने के 4-5 साल बाद परीक्षा कराए जाने से योग्य उम्मीदवार अन्यत्र चले गए।
आयोग के सदस्य अजय भट्टराई का कहना है कि परीक्षा के समय तक कई योग्य अभ्यर्थी अन्य जगह व्यस्त हो गए थे। उनका मानना है कि हर 6 महीने में खुली प्रतियोगी परीक्षा कराने से ही सुधार संभव है।
निष्कर्ष
सेवा आयोग की उपप्राध्यापक परीक्षाओं के नतीजे ने उच्च शिक्षा प्रणाली, पढ़ाई की गुणवत्ता, और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। लंबे इंतजार, कम तैयारी, और अवसर की अनिश्चितता ने इस विफलता में योगदान दिया है। अब आवश्यकता है नियमित परीक्षा, बेहतर पाठ्यक्रम और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया की। श्रोत कान्तिपुर, सुदीप कैनी


