अनितारानी मंडल : मिथिला की मंच नारी

कैलास दास, जनकपुरधाम । नेपाल के रंगमंच पर मिथिला क्षेत्र का नाम रोशन करने वाले कुछ गिने-चुने नामों में आती हैं—वरिष्ठ कलाकार अनितारानी मंडल। एक साधारण गाँव से अपना सफर शुरू करने वाली इस सामान्य मगर दृढ़ नारी ने न सिर्फ़ मैथिली रंगमंच पर महिलाओं की उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि उसे स्थायीत्व भी दिया। नाट्यकला, गीत–संगीत, सामाजिक चेतना और भाषाई पहचान के लिए अनितारानी खुद एक प्रतीक बन चुकी हैं। उनका जीवन-संघर्ष महज़ व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, यह मिथिला और मैथिली भाषा के अस्तित्व व आत्मसम्मान की लड़ाई है।
विक्रम संवत 2062 में मिथिला नाट्यकला परिषद द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली रानी बताती हैं कि उनका पहला नाटक था—‘हाय रे हमर घरवाली’, जहाँ उन्होंने पहली बार रंगमंच पर कदम रखा। उस नाटक में उन्होंने एक महिला की भूमिका निभाई थी, जिसे ग्रामीण समाज में किसी महिला कलाकार द्वारा निभाना आसान नहीं था। विशेषकर मधेश के उस सामाजिक परिवेश में, जहाँ आज भी महिलाओं को घर की चौखट से बाहर निकलने की सामाजिक अनुमति नहीं होती, मंच पर खड़े होकर अभिनय करना एक प्रकार की क्रांति थी। लेकिन जब दर्शकों ने उनका अभिनय देखा, सिर्फ तालियाँ नहीं बजीं, बल्कि चर्चा गाँव–गाँव तक फैल गई। उसी दिन उन्होंने अपने भीतर की कलाकार को पहचान लिया—जिसकी यात्रा आज तीन दशक पार कर चुकी है।
वह दौर था जब मधेश के गाँव–गाँव में जनचेतना का स्तर बहुत ही कम था। साक्षरता दर भी कम, और संचार के साधन सीमित थे। ऐसे समय में चेतना फैलाने का एकमात्र प्रभावी माध्यम था—सड़क नाटक। और इस आंदोलन में अनितारानी अग्रसर हुईं। वह कहती हैं, “उस समय समाज महिलाओं को नाटक करते हुए देखना पचा नहीं पा रहा था। उसमें भी अगर कोई ग्रामीण महिला मंच पर अभिनय करे, तो चुनौती कई गुना बढ़ जाती थी।”
लेकिन अनिता के सामने चुनौती से बड़ा था उनका लक्ष्य—समाज में बदलाव लाना। उनके लिए अभिनय केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, वह तो मानो गाँव के अंधेरे में एक जलती हुई मोमबत्ती थी। उन्होंने जिन नाटकों में अभिनय किया, वे सामाजिक बुराइयों, लैंगिक असमानता, दहेज प्रथा और छुआछूत जैसे मुद्दों पर आधारित थे।
कलाकारिता उतनी सहज राह नहीं होती, जब आप एक महिला के रूप में एक परंपरावादी समाज में प्रवेश करती हैं। शुरुआत में गाँव के कुछ लोग उनके विरोध में थे। लेकिन एक पक्ष हमेशा उनके साथ खड़ा रहा—उनके माता-पिता। पिता राजेशप्रसाद मंडल और माँ चंद्रा देवी मंडल ने न कभी उन्हें रोका, न डराया। उल्टे वही थे जिन्होंने उन्हें हिम्मत दी, प्रेरणा दी।
बाद में जीवनसाथी सतीश मंडल भी उनके इस सफर में सहभागी बने। वह कहती हैं—”कलाकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मेरे पति का भी बहुत बड़ा योगदान रहा और आज भी है।” विवाह के बाद जीवन को संतुलन में रखना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे को समझा और कलाकारिता को सहज रूप से विकसित होने दिया।
विवाह के बाद वे कभी माँ, कभी बहन, तो कभी सास, भाभी जैसी विविध भूमिकाओं में मंच पर दिखाई दीं।
अनितारानी के जीवन में एक महत्वपूर्ण नाम है—वरिष्ठ नाटककार महेन्द्र मलंगिया। वह उन्हें गुरु मानती हैं। महेन्द्र सर के नाटकों में अभिनय करना और बाद में मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप) जैसी प्रतिष्ठित संस्था से जुड़ना, उनके सफर की अगली ऊँचाई थी। ‘छुतहा घैल’, ‘गाम नै सुतैय’ जैसे नाटकों में उन्होंने जिस जीवन्तता से महिला पात्रों को मंच पर जिया, उससे वह मैथिली रंगमंच की एक सशक्त महिला कलाकार के रूप में स्थापित हुईं।
मिनाप से जुड़ने के बाद उन्होंने कई रंगकर्मी, लेखक और संगीतकारों के साथ मिलकर काम किया। इसने उनकी अभिनय क्षमता के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी समझ को भी गहराई दी।
वे स्वीकार करती हैं कि एक समय मैथिली रंगकला थोड़ी ठहरी सी लगने लगी थी। नए कलाकारों की कमी, निवेश की अनुपस्थिति और मंच की कमी ने वातावरण को थोड़ा सुनसान बना दिया। लेकिन अब फिर युवा पीढ़ी के उत्साह और समर्पण ने मैथिली रंगमंच में नई ऊर्जा ला दी है। हालांकि वे मानती हैं कि विषयवस्तु में बदलाव आ गया है। “पहले जहाँ कला समाज परिवर्तन का औजार थी, अब वह मनोरंजन केन्द्रित हो गई है।”
उनका कहना है—“मैथिली कलाकार तो हैं, लेकिन यहाँ के मुद्दे कम और बाहर के ज़्यादा होते हैं। यह चिंता की बात है।” मैथिली रंगमंच के कलाकारों में हास्यास्पद प्रस्तुति और आत्मप्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ी है। केवल यूट्यूब पर लाइक और फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए कोई भी सामग्री परोस दी जाती है। यह कलाकार के भीतर की विकृति है। कलाकार को हमेशा सभ्य और जिम्मेदार रूप में प्रस्तुत होना चाहिए—समाज में एक नई पहचान बनानी चाहिए, और उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
नेपाल में मैथिली भाषा दूसरी सबसे ज़्यादा बोले जाने वाली भाषा है। लेकिन सरकारी नीतियों में इसका प्रतिनिधित्व न के बराबर है। वे कहती हैं—“मैथिली और मिथिला समृद्ध हैं, पर हमने अपनी संस्कृति को दुनिया को नहीं दिखा सके। यही हमारी सबसे बड़ी विफलता है। इसमें राज्य की भूमिका सबसे ज्यादा दोषपूर्ण रही है।” उनका यह कथन केवल पीड़ा नहीं है, यह राजनीतिक उपेक्षा का स्पष्ट और साहसिक आलोचना भी है।
अपना अधिकांश जीवन उन्होंने मैथिली भाषा, कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में लगाया है। लेकिन राज्य ने इसका सम्मान नहीं किया। सरकारी निवेश, नीतिगत मान्यता और मंच की कमी के कारण मैथिली कला आज भी उपेक्षित है।
अनितारानी मंडल केवल एक कलाकार नहीं हैं—वे एक आवाज़ हैं, जो मिथिला की मौन पीड़ा को मंच पर व्यक्त करती हैं। वे एक ऐतिहासिक साक्षी हैं, जिन्होंने दिखाया कि कैसे गाँव से कलाकार जन्म ले सकता है, कैसे समाज बदल सकता है, और कैसे एक महिला सम्पूर्ण व्यवस्था को चुनौती दे सकती है।
उनकी यात्रा मैथिली भाषा की आवाज़, संस्कृति की पहचान, और नारी शक्ति का जीवंत उदाहरण है।

