नेपालगन्ज में ७ दिवंगतजनों की स्मृति में गाईजात्रा मनाया गया
नेपालगन्ज/बाँके – पवन जायसवाल । नेवार समुदाय का परम्परागत सांस्कृतिक पर्व ‘गाईजात्रा’ इस वर्ष भी बाँके जिले के नेपालगन्ज में श्रावण २५ गते, आइतवार को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मनाया गया।
नेवाः पुचः बाँके के आयोजन में ‘भाषा, संस्कृति तथा परम्पराको जगेर्ना गरौं’ (भाषा, संस्कृति और परम्परा का संरक्षण करें) मुख्य नारा रखते हुए सामूहिक गाईजात्रा (साः पारु) निकाली गई। इस अवसर पर सात परिवारों ने अपने दिवंगत परिजनों की स्मृति में गाईजात्रा में सहभागिता की। इनमें स्व. कमलादेवी श्रेष्ठ, स्व. राधादेवी श्रेष्ठ, स्व. सुशीला चुके, स्व. दमयन्ती श्रेष्ठ, स्व. माधवलाल श्रेष्ठ, स्व. केदारप्रसाद श्रेष्ठ और स्व. दीपाकुमारी रेग्मी श्रेष्ठ की स्मृति शामिल रही।
गाईजात्रा यात्रा नेपालगन्ज के सुर्खेत रोड से शुरू होकर धम्बोझी चौक, सेतु बिक चौक और न्यूरोड होते हुए पश्चिम नेपाल की प्रसिद्ध शक्ति पीठ बागेश्वरी मंदिर परिसर में सम्पन्न हुई। यात्रा में पारंपरिक नेवारी पोशाक पहने महिला-पुरुषों ने नेवारी भाषा के गीतों पर नृत्य किया और लाखे नाच प्रस्तुत किया।
समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता नेवाः पुचः बाँके के अध्यक्ष जितेन्द्र कुमार जोशी ने की। इस अवसर पर पार्षद हेमन्त कर्माचार्य ने सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण और संवर्द्धन पर जोर देते हुए कहा कि अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य-मान्यताओं की रक्षा करना हम सबका कर्तव्य है। उन्होंने बताया कि पहले गाईजात्रा केवल परिवार तक सीमित थी, लेकिन पिछले पाँच वर्षों से इसे संगठित रूप में मनाने की पहल से एक सकारात्मक संदेश गया है।
अध्यक्ष जोशी ने कहा कि गाईजात्रा शोक और चित्त शान्ति का संगम है, जिसका उद्देश्य दिवंगत आत्मा की शान्ति के साथ परिवार को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना है। कार्यक्रम संयोजक चन्द्र श्रेष्ठ ने जानकारी दी कि इस वर्ष के आयोजन में सात दिवंगतजनों के परिवार शामिल हुए।
इस अवसर पर नेपालगन्ज स्थित विभिन्न गुठियों के साथ-साथ ब्रह्मकुमारी ओम शान्ति समूह ने झाँकी प्रस्तुत की और गुल्मी सेवा समाज ने कीर्तन किया।
गाईजात्रा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने बताया कि राजा प्रताप मल्ल ने अपनी पुत्र-वियोग से दुखी रानी को यह दिखाने के लिए कि संसार में हर कोई शोक झेलता है, नगर के लोगों को अपने दिवंगत परिजनों की स्मृति में गाईजात्रा निकालने का आदेश दिया था। इसी से यह परम्परा शुरू हुई, जिसमें बाद में प्रहसन और व्यंग्य का भी समावेश हुआ।
आज भी यह पर्व भाद्र कृष्ण अष्टमी तक मनाया जाता है, जिसमें सामाजिक विकृतियों पर व्यंग्य, नृत्य-गान और करुण रस के गीत शामिल होते हैं। पञ्चायती काल में राजनीतिक व्यंग्य के कारण इस पर प्रतिबंध भी लगाया गया था, लेकिन वि.सं. २०३३ से नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान ने इसे महोत्सव के रूप में पुनः आरम्भ किया।
वर्तमान समय में गाईजात्रा समाज में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करने और हास्य-व्यंग्य के माध्यम से संदेश देने का एक मंच बन चुका है। इस वर्ष के नेपालगन्ज आयोजन में नेवार समुदाय के गणमान्य व्यक्तियों के साथ भारत के रुपइडिहा पत्रकार संघ के अध्यक्ष शेर सिंह कसौंधन भी उपस्थित रहे।











