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नारी हूँ मैं (कविता) : राधा यादव

 
राधा यादव
राधा यादव

निराशा के तिमिर घटा में
आशा के फल चखती हूँ ।
अश्कों से भीगे आँचल पर
मन का सब कुछ रखती हूँ ।

मैं सृष्टि की रति चेतनता
सौदर्य जिसे लोग कहते हैं ।
अन्तर्मन में अतुल वैभव–सी
प्रेम छलकते रहते हैं ।।

चमकती हूँ धूल कण में भी
ऐसी है मेरी क्षमता ।
दुःख–सुख में गिर्ती उठ्ती
सब पर लुटाती हूँ ममता ।।

यह सृष्टि की गूढ़ रहस्य
जड़ को करती हूँ चेतना ।
उदयाचल के बाल रवि सा
स्नेह भरा है मेरा मन ।।

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टूटे सपनों की मनकों से
सुन्दर हार बनाती हूँ ।
नारी हूँ मैं इसलिए तो
दुःख में भी मुस्कुराती हूँ ।।
वल्हागोठ, धनुषा

 

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