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(कविता) महाभूकम्प : कन्हैयालाल दास

 

 

कन्हैयालाल दस
कन्हैयालाल दस

हे दैव हमे क्यों मारा
नया साल की नयीं उमंगे
सपने नये सजाये
नाच रहे थे घर–आंगन में
हर्षोल्लास मनाये ।
देखा गया नहीं क्या तुझको
बच्चों की किलकारी ।
देखा गया नहीं गया क्या तुझको
अमराबती की लाली
तोड़ दिया लाखों का सपना
है भूकम्प की माया
हाय विद्याता कैसी तेरी
अदभुत खेल निराला ।
टूटा घर फूटा है कोना
टूट गयी फुलबारी
कितने स्वर्ग सिधार गये
छिन गई सभी खुशियाली
मां से बिछड़ा पुत्र, पिता बिन
बच्चे विलख रहे हैं
कर गोदी को सूना, लाल
मिट्टी में तड़प रहे हैं
तपती धूप, बरसता बादल
डोल रही भूतल है ।
नाच रही है मौत घरों पर
चारों ओर नरक है
कांप उठी धरती, रोते चिल्लाते मानव
पर तेरा मन द्रवित हुआ ना
तुम तो हो जग पालक
तुम तो पालन कर्ता होे
फिर क्यों अपना घर भुला
वैशाख १२ को क्यों
इतना काँप उठा
इतना कोप नहीं अच्छा
तेरा भोले बाबा
नेपाल धरा तो तेरा घर है
पार्बती का डेरा ।
कितने को संहार किया
मंदिर–मस्जिद को तोड़ा
सव तो तेरे अपने हैं
फिर विष घड़ा क्यों फोड़ा ।
क्षमा करो हे नाथ पशुपति
अव तो दया दिखाओ
बंद करो अपनी यह लीला
“बरुण” तरस तो खाओ ।

 

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