सोशल मीडियाका भूत : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
मुरलीमनोहर तिवारी सीपू, हिमालिनी अंक सितम्बर । सामाजिक जीवन में, लोगों ने हमेशा अपने रिश्तों को मजबूत करने के लिए संचार पर भरोसा किया है । जब आमने–सामने की चर्चा असंभव या असुविधाजनक होती थी, तो मनुष्यों ने बहुत सारे रचनात्मक समाधानों का सपना देखा है ।
सोशल मीडिया की जड़ें, आपकी कल्पना से कहीं ज्यादा गहरी हैं । यद्यपि यह एक नई प्रवृत्ति की तरह लगता है, फेसबुक जैसी साइटें सोशल मीडिया के कई सदियों के विकास का स्वाभाविक परिणाम हैं । सोशल मीडिया सन् १९०० से पहले तक दूरी पर संचार करने के शुरुआती तरीकों में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हाथ से लिखे गए पत्राचार का उपयोग किया जाता था । दूसरे शब्दों में, पत्र । डाक सेवा का सबसे प्रारंभिक रूप ५५० ईसा पूर्व का है ।
सन् १७९२ में, टेलीग्राफ का आविष्कार किया गया था । इसने संदेश को एक घोड़े से ज्यादा लंबी दूरी तक तेजी से पहुंचाने की अनुमति दी और सवार उन्हें ले जा सकता था । यद्यपि टेलीग्राफ संदेश संक्षिप्त थे, वे समाचार और सूचना को व्यक्त करने का एक क्रांतिकारी तरीका थे । सन् १८६५ में विकसित, वायवीय पोस्ट ने प्राप्तकर्ताओं के लिए पत्रों को शीघ्रता से वितरित करने का एक और तरीका बनाया । एक वायवीय पोस्ट एक एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में कैप्सूल ले जाने के लिए भूमिगत दबाव वाली वायु नलियों का उपयोग करता है ।
सन् १८९० में टेलीफोन और सन् १८९१ में रेडियो । दोनों प्रौद्योगिकियां आज भी उपयोग में हैं, हालांकि आधुनिक संस्करण अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में बहुत अधिक परिष्कृत हैं । टेलीफोन लाइनों और रेडियो संकेतों ने लोगों को तुरंत अत्यधिक दूरी पर संचार करने में सक्षम किया, कुछ ऐसा जो मानव जाति ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था ।
२० वीं शताब्दी में प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से बदलने लगी । सन् १९४० के दशक में पहले सुपर कंप्यूटर बनाए जाने के बाद, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उन कंप्यूटरों के बीच नेटवर्क बनाने के तरीके विकसित करना शुरू किया, और यह बाद में इंटरनेट के जन्म का कारण बना ।
इंटरनेट के शुरुआती रूपों, जैसे कि ऋयmउगक्भचखभ, को सन् १९६० के दशक में विकसित किया गया था । ईमेल के आदिम रूप भी इस दौरान विकसित किए गए थे । ७० के दशक तक, नेटवर्किंग प्रौद्योगिकी में सुधार हुआ था, और सन् १९७९ के यूजÞनेट ने उपयोगकर्ताओं को एक आभासी समाचार पत्र के माध्यम से संवाद करने की अनुमति दी थी ।
सन् १९८० के दशक तक, घर के कंप्यूटर अधिक सामान्य हो रहे थे और सोशल मीडिया अधिक परिष्कृत हो रहा था । इंटरनेट रिले चैट या क्ष्च्ऋक, पहली बार सन् १९८८ में उपयोग किए गए थे और सन् १९९० के दशक में अच्छी तरह से लोकप्रिय रहे ।
पहली पहचान योग्य सोशल मीडिया साइट, सिक्स डिग्री, सन् १९९७ में बनाई गई थी । इसने उपयोगकर्ताओं को एक प्रोफÞाइल अपलोड करने और अन्य उपयोगकर्ताओं के साथ दोस्ती करने में सक्षम बनाया । सन् १९९९ में, पहली ब्लॉगिंग साइटें लोकप्रिय हो गईं, जिससे सोशल मीडिया सनसनी बन गई जो आज भी लोकप्रिय है ।
आज के जमाने मे सोशल मीडिया में ब्लॉगिंग के आविष्कार के बाद, सोशल मीडिया ने लोकप्रियता में विस्फोट करना शुरू कर दिया । माइस्पेस और लिंक्डइन जैसी साइटों ने सन् २००० के दशक की शुरुआत में प्रमुखता हासिल की और फोटोबुकेट और फ्लिकर जैसी साइटों ने ऑनलाइन इंटरनेट शेयरिंग की सुविधा प्रदान की । थ्यगत्गदभ २००५ में सामने आया, जिससे लोगों के बीच संवाद करने और एक दूसरे का साथ साझा करने के लिए पूरी तरह से नया रास्ता बना ।
२००६ तक, फेसबुक और ट्विटर दोनों दुनिया भर में उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध हो गए । ये साइटें इंटरनेट पर पर सबसे लोकप्रिय सामाजिक नेटवर्क में से कुछ हैं । त्गmदचि, क्उयतषथ, ँयगचकत्रगबचभ और एष्लतभचभकत जैसी अन्य साइटें विशिष्ट सामाजिक नेटवर्किंग को भरने के लिए पॉप अप करने लगीं ।
२०१० में इंस्टाग्राम को पब्लिक डोमेन में लॉन्च किया गया । इंस्टाग्राम दुनिया भर के लोगों को जोड़ने के लिए दृश्य संचार और सामाजिक संपर्क का उपयोग करता है । यह उपयोगकर्ताओं को फोटो और वीडियो कहानियों को अपलोड करने और साझा करने की अनुमति देता है । इसमें कई फिल्टर हैं जो एक उबाऊ तस्वीर को इंस्टाग्राम–योग्य मास्टरपीस में बदल सकते हैं ।
हर साल ३० जून को विश्व सोशल मीडिया दिवस मनाया जाता है । ताकि लोगों को यह बताया जा सके कि यह कम्यूनिकेशन के लिए एक महत्वपूर्ण टूल के रूप में उभरा है । कोरोना महामारी के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों के लिए हेल्पलाइन बनकर सामने आया है । विश्व सोशल मीडिया दिवस दुनिया भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के महत्व को बताने के लिए मनाया जाता है ।
मैसेजिंग सर्विस ऐप पर हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति से जुड़ सकते हैं । एक बटन के टैप पर आपके पास दुनिया हो सकती है । सभी महत्वपूर्ण जानकारी अब सोशल मीडिया पर उपलब्ध है और इससे लोगों को बेहतर तरीके से समझने और संवाद करने में मदद मिली है ।
ज्ययतकगष्तभ के मुताबिक दुनिया भर में सोशल मीडिया यूजर्स, पिछले एक साल में इंटरनेट यूजर्स की संख्या ७.६ फीसदी बढ़ी है । यह ४.७२ अरब तक पहुंच गई है । यह दुनिया की आबादी के ६० प्रतिशत से अधिक के बराबर है । डेटा के मुताबिक एक साल में आधे अरब से अधिक नए उपयोगकर्ता सोशल मीडिया से जुड़े हैं । अप्रैल २०२१ तक ४.३३ बिलियन लोग सोशल मीडिया यूजर्स हैं । व्हाट्सएप सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला एप है । इसके बाद यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टग्राम और ट्विटर हैं ।
११ मार्च २०२२ को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर वैश्विक रुझानों की जाँच करने वाली यूनेस्को की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी, कि समाचार मीडिया का व्यापारिक मॉडल ’छिन्न–भिन्न’ हो चुका है और इससे, हमारा सूचना का मौलिक अधिकार खÞतरे में है ।
पिछले पाँच वर्षों में, समाचारों के दर्शक और विज्ञापनों से आने वाला राजस्व, दोनों ही बड़ी संख्या में इण्टरनेट के मंच की ओर चले गए हैं । केवल दो कम्पनियों –न्ययनभि और मेटा (जिसे पहले फÞेसबुक के रूप में जाना जाता था) को, वैश्विक डिजिटल विज्ञापन खÞर्च का आधा हिस्सा जा चुका है ।
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने, २०१६ से २०२१ तक, मीडिया विकास के रुझान का विश्लेषण किया और पाया कि पाँच सालों में, विश्व स्तर पर समाचार पत्रों को विज्ञापन से मिलने वाला राजस्व आधा हो चुका है ।
समाचारों का अकाल, सोशल मीडिया की चांदी
रिपोर्ट में बताया गया है कि समाचार संगठन अक्सर पाठकों से क्लिक प्राप्त करने के लिये संघर्ष करते हैं । इन क्लिक्स से ही विज्ञापनों से होने वाली आमदनी निर्धारित होती है, और कई संगठन तो ऑनलाइन समाचारों में नई आवाजÞों के प्रसार व नए डिजिटल बिचौलियों के एल्गोरिदम के बीच खÞुद को फंसा हुआ पाते हैं ।
अध्ययन के मुताबिकÞ, “डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र ने प्रतिस्पर्धी सामग्री की बाढ़ ला दी है और बड़ी इण्टरनेट कम्पनियाँ इनके लिये सुरक्षित रास्ता मुहैया कराती है ।” अध्ययन में यह भी कहा गया है कि उनके पास अधिक सामग्री की उपलब्धता और अधिक आवाजÞों तक पहुँच जÞरूर है– लेकिन जÞरूरी नहीं कि उसमें पत्रकारिता की गुणवत्ता के मूल्य भी शामिल हों ।
रिपोर्ट में पाया गया है कि कोविड–१९ महामारी ने केवल विज्ञापन राजस्व में गिरावट, कामकाज छूटने और न्यूजÞरूम बन्द होने से, स्थिति और बदतर बना दी है । महामारी के दौरान, पत्रकारिता एक जीवन रक्षक अग्रिम पंक्ति की सेवा रही है । वहीं, कोविड–१९ से सम्बन्धित झूठी सामग्री सोशल मीडिया पर तेजÞी से फैली, जबकि पत्रकारों के रोजÞगार और कामकाज में कटौती से, सूचना परिदृश्य में एक ’शून्य’ पैदा हो गया, विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ।
यूनेस्को के विवरण के मुताबिकÞ, “फोंडाजियोन ब्रुनो केसलर की पहल, कोविड–१९ ‘इन्फÞोडेमिक्स ऑब्जÞर्वेटरी’, के अनुसार, सितम्बर २०२० में, ट्विटर पर महामारी से सम्बन्धित १० लाख से अधिक गÞलत, अविश्वसनीय या भ्रामक जानकारी भरे सन्देश पोस्ट किए गए थे ।”
इस बीच, १४०० पत्रकारों के बीच हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि महामारी के आर्थिक दबाव के कारण उनमें से कम से कम दो–तिहाई अब अपने कामकाज में कम सुरक्षित महसूस करते हैं । पिछले पाँच वर्षों में, पत्रकारों द्वारा आर्थिक और गÞलत सूचना ÷ दुष्प्रचार बाधाओं का सामना करने के अलावा, उन्हें दुनिया भर में तरह–तरह के हमलों निशाना भी बनाया जाता रहा है ।
२०१६ से २०२१ के अन्त तक, यूनेस्को ने ४५५ पत्रकारों की हत्याएँ दर्ज की हैं, जिन्हें या तो उनके काम के कारण या कामकाज के दौरान निशाना बनाया गया था । दस हत्याओं में से लगभग नौ अनसुलझी हैं, जो दुनिया भर में इन अपराधों के जÞ्यादातर दण्ड मुक्त होने पर प्रकाश डालती है ।
रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर, न केवल सरकारों और आपराधिक समूहों से, बल्कि निजी समर्थक वर्ग और जनता के कुछ सदस्यों से भी खÞतरा बढ़ रहा है, जो ऑनलाइन गाली–गलौज और हमले शुरू करने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं । वास्तव में, पत्रकारों के खÞिलाफÞ ऑनलाइन हिंसा में वृद्धि, एक नई और उभरती हुई प्रवृत्ति है, जिससे पूरी दुनिया में महिला पत्रकार असमान रूप से प्रभावित हैं ।
२०२१ के यूनेस्को के एक पेपर में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल दस में से सात से अधिक महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का अनुभव किया था और पाँच ने ऑनलाइन धमकियों से सम्बन्धित ऑफÞलाइन हिंसा का भी शिकार होने की सूचना दी । विरोध, प्रदर्शन और दंगों की कवरेज करने वाले पत्रकारों के खिÞलाफÞ हमले “चिन्ताजनक रूप से आम“होते जा रहे हैं, वहीं पत्रकारों को हिरासत में लेने की घटनाएँ भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं । कई देशों में, कÞानून इन खÞतरों से पत्रकारों की रक्षा नहीं करते हैं, और कुछ में, वो इस तरह के खÞतरों को और बढ़ाते हैं ।
रिपोर्ट के अनुसार, २०१६ के बाद से, ४४ देशों ने नए कÞानून अपनाए या संशोधित किये हैं जिनमें अस्पष्ट भाषा या तथाकथित भ्रामक समाचार, कथित अफÞवाहों, या “साइबर–मानहानि” जैसी कार्रवाइयों के लिए, अनुपातहीन दण्ड की व्यवस्था की गई है, जिससे इस पर कुछ स्वतः स्फूर्त लगाम लगी है ।
इस बीच, १६० देशों में मानहानि के आरोप अब भी एक अपराध माने जाते हैं । चूँकि मानहानि का मामला, सिविल कÞानून के बजाय आपराधिक कÞानून के अन्तर्गत आता है, तो ऐसे में, इसे पत्रकारों को दबाने के लिये गिरफÞ्तार या नजÞरबन्द करने के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है । इस रिपोर्ट में, पत्रकारों को सुरक्षा देने की समिति के आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि २०२१ में, २९३ पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था, जो तीन दशकों में सबसे अधिक वार्षिक संख्या थी ।’
इन चिन्ताजनक प्रवृत्तियों के मद्देनजÞर, यूनेस्को ने सरकारों से, स्वतन्त्र मीडिया और पत्रकारों की सुरक्षा के लिये, तीन प्रमुख क्षेत्रों में नीति–संचालित कार्रवाई करने का आग्रह किया है । पत्रकारों की पेशेवर स्वायत्तता का सम्मान करते हुए, समाचार मीडिया की आर्थिक स्वतन्त्रता का समर्थन करना । उदाहरण के लिये, सरकारें स्वतन्त्र समाचार केन्द्रों को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीकÞे से, व सम्पादकीय स्वतन्त्रता से समझौता किये बिना, टैक्स लाभ प्रदान कर सकती हैं ।
मीडिया और सूचना साक्षरता का विकास करके, सभी नागरिकों को विश्वसनीय, सत्यापित जानकारी और असत्यापित जानकारी के बीच अन्तर सिखाना एवं जनता को स्वतन्त्र मीडिया से ही जानकारी प्राप्त करने के लिये प्रोत्साहित करना ।
मीडिया कÞानून को लागू करना या उसमें सुधार लाना, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अन्तरराष्ट्रीय मानकों, विशेष रूप से क्ष्लतभचलबतष्यलब िऋयखभलबलत यल ऋष्खष् िबलम एयष्तिष्अब िच्ष्नजतक के अनुच्छेद १९ के अनुरूप, स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध और बहुलवादी समाचार उत्पादन का समर्थन सम्भव हो सके ।
नेपाल में पत्रकार महासंघ और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक ऐसी ही नियामक संस्था है जो समाचार पत्र, समाचार एजेंसी और उनके संपादकों को उस स्थिति में चेतावनी दे सकती है यदि यह पाया जाता है कि उन्होंने पत्रकारिता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है ।
न्यूजÞ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (ल्द्यब्) निजी टेलीविजन समाचार और करेंट अफेयर्स के प्रसारकों का प्रतिनिधित्व करता है एवं उनके विरुद्ध शिकायतों की जाँच करता है ।
ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल (द्यऋऋऋ) टीवी ब्रॉडकास्टरों के खिलाफ आपत्तिजनक टीवी कंटेंट और फजर्Þी खबरों की शिकायत स्वीकार करती है और उनकी जाँच करती है । आँकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भारत में तकरीबन ३५० मिलियन सोशल मीडिया यूजÞर हैं और अनुमान के मुताबिक, वर्ष २०२३ तक यह संख्या लगभग ४४७ मिलियन तक पहुँच जाएगी ।
वर्ष २०१९ में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय उपयोगकत्र्ता औसतन २.४ घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं । इसी रिपोर्ट के मुताबिक फिलीपींस के उपयोगकत्र्ता सोशल मीडिया का सबसे अधिक (औसतन ४ घंटे) प्रयोग करते हैं, जबकि इस आधार पर जापान में सबसे कम (४५ मिनट) सोशल मीडिया का प्रयोग होता है ।
इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया अपनी आलोचनाओं के कारण भी चर्चा में रहता है । दरअसल, सोशल मीडिया की भूमिका सामाजिक समरसता को बिगाड़ने और सकारात्मक सोच की जगह समाज को बाँटने वाली सोच को बढ़ावा देने वाली हो गई है । देश में नीति निर्माताओं के समक्ष सोशल मीडिया के दुरुपयोग को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन चुकी है एवं लोगों द्वारा इस ओर गंभीरता से विचार भी किया जा रहा है
आँकड़ों के अनुसार, वर्ष २०१७–१८ में फेसबुक, ट्विटर समेत कई साइटों पर २,२४५ आपत्तिजनक सामग्रियों के मिलने की शिकायत की गई थी जिनमें से जून २०१८ तक १,६६२ सामग्रियाँ हटा दी गईं थीं । उल्लेखनीय है कि इनमें जÞ्यादातर वह सामग्री थी जो धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान का निषेध करने वाले कानूनों का उल्लंघन कर रही थी । इस अल्पावधि में बड़ी संख्या में आपत्तिजनक सामग्री का पाया जाना यह दर्शाता है कि सोशल मीडिया का कितना जÞ्यादा दुरुपयोग हो रहा है ।
दूसरी ओर सोशल मीडिया के जÞरिये ऐतिहासिक तथ्यों को भी तोड़–मरोड़ कर पेश किया जा रहा है । न केवल ऐतिहासिक घटनाओं को अलग रूप में पेश करने की कोशिश हो रही है बल्कि राजनीति के सूत्रधार रहे नेताओं के बारे में भी गलत जानकारी बड़े स्तर पर साझा की जा रही है ।
विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सोशल मीडिया के माध्यम से गलत सूचनाओं का प्रसार कुछ प्रमुख उभरते जोखिमों में से एक है ।
कई शोध बताते हैं कि यदि कोई सोशल मीडिया का आवश्यकता से अधिक प्रयोग किया जाए तो वह हमारे मस्तिष्क को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है और हमे डिप्रेशन की ओर ले जा सकता है ।
सोशल मीडिया साइबर–बुलिंग को बढ़ावा देता है । यह फेक न्यूजÞ और हेट स्पीच फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है । सोशल मीडिया पर गोपनीयता की कमी होती है और कई बार आपका निजी डेटा चोरी होने का खतरा रहता है । साइबर अपराधों जैसे– हैकिंग और फिशिंग आदि का खतरा भी बढ़ जाता है । आजकल सोशल मीडिया के माध्यम से धोखाधड़ी का चलन भी काफी बढ़ गया है, ये लोग ऐसा सोशल मीडिया उपयोगकत्र्ता की तलाश करते हैं जिन्हें आसानी से फँसाया जा सकता है । सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है ।
सोशल मीडिया के जÞरिये विश्व में इतिहास में बड़े बदलाव आए हैं, जब ये सोशल मीडिया प्लेटफÞॉम्र्स सिर्फÞ लोगों द्वारा अपनी फÞीलिंग्स आदि शेयर करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े आंदोलन लाने में भी सक्षम रहा । इसमें अरब स्प्रिंग, मिस्त्र विद्रोह, इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसे बहुत बड़े आंदोलन शामिल हैं ।
अरब स्प्रिंग (ब्चबद क्उचष्लन, २०१०) ः–
सरकार विरोधी प्रदर्शन की शुरुआत दिसम्बर २०१० में ट्यूनिशिया से हुई और जल्द ही यह मिडल ईस्ट और उत्तर अमेरिका के अरबी भाषी देशों में भी फैल गया । साल २०११ तक यह अरब स्प्रिंग के नाम से जाना जाने लगा । ये प्रदर्शन की लहरें थी, जो लोकतंत्र की मांग कर रही थीं । अरब स्प्रिंग में सोशल मीडिया ने बहुत अहम भूमिका निभाई । यह शुरू ही इंटरनेट से हुआ था । इसका नतीजा ये हुआ कि ट्यूनिशिया, मिस्त्र, लीबिया और यमन की सरकारों को अपनी गद्दी त्यागनी पड़ी । हालांकि, इस आंदोलन के चलते सीरिया, इराकÞ, लीबिया और यमन में गृह युद्ध भी छिड़ गया था ।
ट्यूनिशियासे शुरू हुई थी यह विद्रोह की क्रांति
२०१० में ःयजबmभम द्ययगबशष्शष् नाम के एक पटरी पर सब्जÞी बेचने वाले ने स्थानीय प्रशासन से विवाद होने पर खÞुद को आग लगा ली । यह घटना जल्द ही लोगों के बीच पÞmैल गई । पुलिस ने द्ययगबशष्श को अपना काम न करने देने के लिए परेशान किया था, जिसके बाद उसने यह कदम उठाया । इसके बाद क्ष्मष् द्ययगशष्म नाम का एक बेरोजÞगार बिजली के खंभे पर चढ़ा और ‘बेरोजÞगारी को ना’ का नारा लगते हुए उसने तारें छूकर खुद को बिजली के झटके दे दिए । इसके बाद ट्यूनिशिया की जनता विरोध–प्रदर्शन में सड़कों पर उतर आई । यह प्रदर्शन हिंसा में भी तब्दील हो गया ।
उन्होंने राष्ट्रपति श्ष्लभ ब–िब्दष्मष्लभ द्यभल ब्ष् िके खिलापÞm भ्रष्टाचार और तानाशाही का मुद्दा बनाते हुए विद्रोह करना शुरू कर दिया । इसके एक महीने बाद २३ साल से सत्ता में काबिजÞ श्ष्लभ ब–िब्दष्मष्लभ द्यभल ब्ष् िसऊदी भाग गए । अहम बात रही कि इसे देश की मीडिया ने कवर ही नहीं किया । सरकार के खिलापÞm इस आन्दोलन की तस्वीरें और खÞबरें मोबाइल और सोशल मीडिया के जÞरिये पड़ोसी देशों तक भी जाने लगी । ट्विटर पर हैशटैग होकर इस मामले ने अंतराष्ट्रीय ध्यान अपनी ओर खींचा । नतीजतन, जल्द ही बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, लीबिया और यमन मे अलग–अलग मुद्दों को लेकर एक बड़े स्तर पर प्रदर्शन शुरू हो गए । इस दौरान, सरकार द्वारा लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट हैक करने की भी खÞबरें आई और लोगों ने एक्टिविस्ट्स की मदद से ३बलयलथmयगक के हैशटैग से पड़ोस के देशों तक अपनी क्रांति को फैलाया । इस विरोध की वजह से राष्ट्रपति को अपने पद से इस्तीफÞा देना पड़ा ।
मिस्र विद्रोह ः– २८ साल के प्जबभिम ःयजबmभम क्बभभम नाम के लड़के ने लोकल पुलिस द्वारा ड्रग्स जÞब्त करने के बाद आपस में बांटने का वीडियो बनाया और उसे इंटरनेट पर डाल दिया । जल्द ही यह वीडियो वायरल हो गया और पुलिस की निंदा होने लगी । जिसके बाद पुलिस ने खÞालिद को ढूंढ लिया और उसे गिरफ्Þतार कर लिया । हिरासत में पुलिस के पीटे जाने की वजह से खÞालिद की मौत हो गई । हालांकि, पुलिस ने कहा कि ज्Þयादा मैरीआना निगलने की वजह से उसकी मौत हुई । मौत के बाद पोस्टमार्टम की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और प्रदर्शन शुरू हुआ ।
इसी बीच ध्बभ िन्जयलष्m नाम के एक शख्Þस ने फÞेसबुक “ध्भ ब्िि ब्चभ प्जबभिम” नाम से एक पेज बनाया, इस पर खÞालिद की ही पÞmोटो भी लगाई । इस एक पेज ने प्रोटेस्ट का एक बड़ा रूप लेने में देर नहीं लगाईं । इसके बाद लोगों ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया । न्जयलष्m ने लिखा कि, ये किसी के साथ भी हो सकता है, हम में से कोई भी इसका शिकार हो सकता है । इस पेज ने मिस्त्र में प्रोटेस्ट का इतना बड़ा रूप लिया कि सरकार को इस्तीफÞा देना पड़ा । न्जयलष्m को १२ दिन के लिए गिरफ्Þतार भी किया गया ।
अन्ना आंदोलन ः– साल २०११ में भारत में भ्रष्टाचार के खिलापÞm सामाजिक कार्यकत्र्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक आंदोलन छिड़ा । इस आन्दोलन को टाइम मैगजÞीन ने टॉप १० न्यूजÞ स्टोरी में भी शामिल किया था । अन्ना ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन की घोषणा की । जन लोकपाल बिल के लिए इस आंदोलन के व्यापक रूप से फैलने के पीछे इन्टरनेट ने अहम भूमिका निभाई थी ।
इस आंदोलन के दौरान हजÞारों–लाखों लोग उमड़े थे और “मैं अन्ना हूं” नाम की टोपी लगाए अपना विरोध दर्ज करते हुए नजÞर आए । इस आंदोलन में लोग भारी संख्या में पहुंचे और हर पल की सूचना सोशल मीडिया से मिली । इस दौरान सभी सोशल मीडिया प्लेटफÞॉम्र्स का सक्रियता से इस्तेमाल हुआ ।
३ःभत्यय आंदोलन ः– ःभत्यय आंदोलन एकदम ताजÞा उदाहरण है, जिसमें इंटरनेट के जÞरिये एक बेहद गंभीर मुद्दा उठा । १६ अक्टूबर २०१७ की दोपहर अमेरिकी एक्ट्रेस एलिसा मिलानो ने यौन उत्पीड़न की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने ३ःभत्यय का इस्तेमाल किया । यह ट्वीट बहुत जल्दी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और उस दिन के अंत तक दो लाख से ज्यादा ट्वीट इसे लेकर हो गए ।
इसमें लाखों महिलाओं ने अपने साथ यौन उत्पीड़न की कहानी बताई । इसमें आम लोग से लेकर बड़े–बड़े सेलिब्रिटीजÞ शामिल थे, जैसे– ग्वेनेथ पैल्ट्रो, ऐश्ली जूड, जेनिफर लॉरेंस और उमा थर्मन । इस आन्दोलन में हॉलीवुड के दिग्गज प्रड्यूसर हार्वी विंस्टीन का नाम भी आया था । ऐसा होने के बाद उनसे कई लोगों ने किनारा करना भी शुरू कर दिया । इसमें अलग–अलग क्षेत्रों से अलग–अलग महिलाओं ने अपने उत्पीड़न की कहानी बताई । इसमें आम लोग से लेकर बड़े–बड़े सेलिब्रिटीजÞ शामिल थे ।
भारत में भी इस आन्दोलन का असर देखा गया, जब बड़े–बड़े लोगों के नाम इसमें आए थे । सही मायनों में इसकी २०१६ में शुरुआत हुई थी । दरअसल,सेक्शुअल असॉल्ट सर्वाइवर तराना बर्क ने ३ःभत्यय का इस्तेमाल किया था । उन्होंने रंगभेद की शिकार महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की कहानी उजागर की थी । सोशल मीडिया के जÞरिये पूरे विश्व की महिला एकजुट हुई थीं और अपनी उत्पीडन की कहानी बयान करती हुई नजÞर आई ।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन ः– बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही । छात्र आंदोलन स्वतः स्फूर्त ढंग से शुरू तो हुआ था आरक्षण के सवाल पर, लेकिन देखते देखते उसने राजनीतिक आयाम ग्रहण कर लिया और अंततः प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़कर भागना पड़ा । दस अगस्त को छात्रों के दबाव में मुख्य न्यायाधीश को भी इस्तीफा देना पड़ा ।
३० ल्यख २०२४ को १६ वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध ऑस्ट्रेलियाई सीनेट से पारित हो गया और यह दुनिया का पहला कानून बनने वाला है । यह कानून त्ष्पत्यप, ँबअभदययप, क्लबउअजबत, च्भममष्त, ह् और क्ष्लकतबनचबm जैसे प्लेटफÞॉर्म को ५० मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (घ्२६ मिलियन) तक का जुर्माना लगाने के लिए उत्तरदायी बनाएगा, यदि वे १६ वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट बनाने से रोकने में विफल रहते हैं ।
जहां ऑस्ट्रेलिया ने सिर्फ बच्चों के लिए सोशल मीडिया ऐप्स पर पाबंदी लगाई है । वहीं दुनिया के १० देशों में फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्वीटर जैसे ऐप्स या तो पूरी तरह बैन हैं या फिर इनके इस्तेमाल पर पाबंदियां लगी हैं । इस लिस्ट में उत्तर कोरिया, चीन, ब्राजील, सऊदी अरब, ईरान, तुर्की, रूस, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्त्र और वियतनाम का नाम शामिल है ।
उतर कोरिया –सोशल मीडिया पूरी तरह से बैन इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी पाबंदी है ।
चीन– पÞmेसबुक, इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया बैन है । वीचैट को सरकार मोनिटर करती हैं ।
ब्राजील– फेक न्यूजÞ फैलाने की वजह से सरकार ने ट्विटर पर बैन लगा दिया है ।
ईरान– राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर ईरान में फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पूरी तरह से बैन है ।
सऊदी अरब– सोशल मीडिया पर सरकार की पैनी नजर रहती है ।
तुर्की– ट्विटर, यूट्यूब, पÞmेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर सेंसरशिप लगाई गई है ।
रूस– सोशल मीडिया पर सख्त पाबंदिया लगाई गई है, राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा महसूस होने पर इंटरनेट सुबिधा बन्द कर दी जाती है ।
संयुक्त अरब अमीरात ग्ब्भ्– साइबर क्राइम कानून बेहद सख्त है, सरकार और इस्लाम के खिलाफ बोलने गिरफ्तारी और जुर्माना दोनों लगता है ।
मिस्र भ्न्थ्एत्– मिस्र में सोशल मीडिया पर सख्त पाबंदिया लगी हुई है ।
वियतनाम– सरकार के खिलाफ लिखने पर गिरफ्तारी होती है ।
अभिव्यक्ति की आजÞादी जीवंत लोकतंत्र की महत्त्वपूर्ण विशेषता है और इस अधिकार के उपयोग हेतु सोशल मीडिया ने हमें जो अवसर दिया है, उसकी कल्पना कुछ दशकों पूर्व शायद संभव नहीं थी ।
सोशल मीडिया ने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी समाज की मुख्य धारा से जुड़ने और खुलकर अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया है । सोशल मीडिया दुनिया भर के लोगों से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है और इसने विश्व में संचार को नया आयाम दिया है । सोशल मीडिया उन लोगों की आवाजÞ बन सकता है जो समाज की मुख्य धारा से अलग हैं और जिनकी आवाजÞ को दबाया जाता रहा है ।
वर्तमान में सोशल मीडिया कई व्यवसायियों के लिये व्यवसाय के एक अच्छे साधन के रूप में कार्य कर रहा है । सोशल मीडिया के साथ ही कई प्रकार के रोजÞगार भी पैदा हुए हैं । वर्तमान में आम नागरिकों के बीच जागरूकता फैलने के लिये सोशल मीडिया का प्रयोग काफी व्यापक स्तर पर किया जा रहा है । कई शोधों में सामने आया है कि दुनिया भर में अधिकांश लोग रोजÞमर्रा की सूचनाएँ सोशल मीडिया के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं ।
दूसरी ओर इस कदम के विरोधियों का मानना है कि यदि सोशल मीडिया का विनियमन कर आधार को प्रोफाइल से जोड़ा जाता है तो इससे नागरिकों की निजता का अधिकार प्रभावित होगा, जो कि संविधान के अनुकूल नहीं है ।
सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को नया आयाम दिया है, आज प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी डर के सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार रख सकता है और उसे हजÞारों लोगों तक पहुँचा सकता है, परंतु सोशल मीडिया के दुरुपयोग ने इसे एक खतरनाक उपकरण के रूप में भी स्थापित कर दिया है तथा इसके विनियमन की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है । अतः आवश्यक है कि निजता के अधिकार का उल्लंघन किए बिना सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये सभी पक्षों के साथ विचार–विमर्श कर नए विकल्पों की खोज की जाए, ताकि भविष्य में इसके संभावित दुष्प्रभावों से बचा जा सके ।
आज, सोशल नेटवर्किंग साइटों की एक जबरदस्त विविधता है, और उनमें से कई को क्रॉस–पोस्टिंग की अनुमति देने के लिए जोड़ा जा सकता है । यह एक ऐसा वातावरण बनाता है जहां उपयोगकर्ता व्यक्ति–से–व्यक्ति संचार की अंतरंगता का त्याग किए बिना अधिकतम लोगों तक पहुंच सकते हैं । हम केवल इस बारे में अनुमान लगा सकते हैं कि अगले दशक में या अब से १०० साल बाद भी सोशल मीडिया के प्रभाव से भविष्य क्या हो सकता है, लेकिन यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह तब तक मौजूद रहेगा जब तक मनुष्य जीवित हैं ।
अंत में इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया के नकारात्मक परिणाम भी हो सकते हैं, जैसे अफÞवाहों को तेजÞी से फैलाना और प्लांटेड न्यूजÞ को अस्तित्व में लाना । लेकिन सोशल मीडिया पर अपना रोष जÞाहिर करना शायद बेकार नहीं होता है, क्योंकि कब एक हैशटैग कौनसा बड़ा आन्दोलन बन जाए और इतिहास बदलकर रख दे, किसे पता है ? इस विषय पर नेपाल को सचेत और संवेदनशील होकर सोचना पड़ेगा, नही तो तानाशाही के खिलाफ एक चिंगारी ही कापÞmी है ।


