जेनजी आन्दोलन के प्रभाव में लोकतन्त्र ! संसद् पुनस्र्थापना या चुनाव ? : लिलानाथ गौतम
लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक ऑक्टोबर । जेनजी आन्दोलन के बाद बनी सरकार आगामी फाल्गुन २१ गते (मार्च ५) को प्रतिनिधि सभा का चुनाव कराने की घोषणा कर चुकी है । लेकिन पूर्व संसद् के सबसे बड़े दल नेपाली कांग्रेस और दूसरे बड़े दल नेकपा एमाले ने अभी तक उस चुनाव को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है । नेकपा एमाले भंग संसद् की पुनस्र्थापना के पक्ष में दिख रही है, जबकि नेपाली कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद है । कांग्रेस का संस्थापन पक्ष संसद पुनस्र्थापना की वकालत कर रहा है, जबकि दूसरी पीढ़ी के अधिकांश नेता चुनाव में जाने के पक्षधर हैं ।
मुख्यतः नेकपा एमाले वर्तमान सरकार को असंवैधानिक बता रही है । ऐसा कहने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और उनका समूह शामिल है । संवैधानिक दृष्टि से यह तर्क कुछ हद तक उचित हो सकता है, लेकिन इतिहास गवाह है– हर बड़ी राजनीतिक क्रांति या आन्दोलन के बाद बनने वाली सरकार तत्कालीन संविधान के अनुरूप नहीं होती । बल्कि, संविधान को ही आन्दोलन के अनुसार संशोधित किया जाता है । नेपाल के इतिहास में भी यह कई बार हो चुका है ।
यह सत्य है कि एमाले का वर्तमान नेतृत्व जेनजी आन्दोलन को आत्मसात करने में असफल रहा है । घोषित रूप में ही एमाले के नेतृत्व ने इस आन्दोलन को ‘अराजक’ और ‘विदेशी प्रभाव से प्रेरित’ कह दिया है । ऐसे में जब एक प्रमुख राजनीतिक दल इस आन्दोलन को अवमूल्यन करता है और संसद पुनस्र्थापना को मुख्य मुद्दा बनाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है– क्या फागुन २१ को चुनाव संभव भी है ?
लोकतंत्र को मजबूत और संस्थागत करने के लिए चुनाव अपरिहार्य है । एमाले को छोड़कर अन्य अधिकांश पुरानी राजनीतिक शक्तियाँ घोषित चुनाव के प्रति नकारात्मक नहीं हैं । माओवादी केन्द्र (पूर्व संसद की तीसरी शक्ति) ने तो औपचारिक निर्णय लेकर चुनाव में भाग लेने की घोषणा भी कर दी है । इसलिए अब संसद पुनस्र्थापना कर पुराने दलों और नेताओं को फिर से सत्ता में पहुँचाने की कोशिश जेनजी आन्दोलन का अपमान होगी, जिससे देश में एक और विद्रोह की संभावना बन सकती है । एमाले की नई पीढ़ी को यह तथ्य समझ आ चुका है– अब उनका उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि चाहे दबाव देकर ही सही, चुनाव को सफल बनाया जाए । यही लोकतांत्रिक अभ्यास का सुन्दर पक्ष होगा, जहाँ पुरानी पीढ़ी का विस्थापन और नई पीढ़ी का उदय सुनिश्चित होगा । इसलिए अब संसद पुनस्र्थापना नहीं, बल्कि चुनाव ही अगली दिशा होनी चाहिए ।
गंभीर संकट की चिन्ता
वर्तमान सरकार के मन्त्री चुनाव के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं । उन्हें यह भलीभाँति ज्ञात है कि यदि फाल्गुन २१ तक चुनाव नहीं हुआ, तो देश में और भी गम्भीर संकट उत्पन्न हो सकता है । इसलिए चुनाव को लेकर उनकी चिंता स्वाभाविक है । प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को इस विषय में और भी अधिक दृढ़ रहना चाहिए, क्योंकि यदि चुनाव नहीं हो सका, तो सबसे बड़ा आक्रोश और असंतोष उन्हीं पर केन्द्रित होगा ।
यदि सुशीला कार्की चुनाव कराने में असफल होती हैं, तो उन्हें बदनामी के साथ पद छोड़ना पड़ सकता है । उस स्थिति में संसद पुनस्र्थापना की सम्भावना बढ़ेगी और देश में नया राजनीतिक संकट उत्पन्न होगा । यदि चुनाव कराने में असफलता के कारण पुनः संसद बहाल हुई, तो जेनजी आन्दोलन के नेता, सहभागी, और आन्दोलन को ‘हाइजैक’ करने आए समूहों में से कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा । तब पुरानी और नई शक्तियों के बीच प्रतिशोध की भावना बढ़ेगी, जो देश को दीर्घकालीन अस्थिरता की ओर धकेल सकती है ।
इसलिए देश को और बड़े संकट से बचाने के लिए भी घोषित मिति पर चुनाव होना अत्यावश्यक है । पुराने राजनीतिक दलों और नेताओं ने जो स्वयं को जनमत आधारित संगठन मानते हैं, उन्हें जेनजी आन्दोलन का अवमूल्यन नहीं करना चाहिए । यदि उन्होंने ऐसा किया, तो उन्हें अगले बड़े विद्रोह और विनाश का सामना करना पड़ सकता है । युवा पीढ़ी के विद्रोह और उससे आए परिवर्तन को आत्मसात कर स्वयं में सुधार करना ही उनके लिए सर्वोत्तम विकल्प है । और उस विकल्प को संस्थागत करने का एकमात्र माध्यम चुनाव ही है ।
सरकार का दायित्व
वर्तमान समय में सरकार का मुख्य कार्य चुनाव के लिए विश्वसनीय वातावरण बनाना है । साथ ही, भदौ २३ की अकल्पनीय हत्या–कांड की निष्पक्ष जाँच और २४ गते की आगजनी, लूटपाट तथा विध्वंस की स्वतन्त्र जाँच सुनिश्चित करनी चाहिए । अभी कई जेनजी समूह सक्रिय हैं, जिनसे वार्ता करना सरकार के लिए सरल नहीं है । बेहतर यह होगा कि सरकार उन्हें कहे– ‘दल बनाकर आओ’, ताकि औपचारिक संवाद सम्भव हो सके । अन्यथा व्यक्तिविशेष से वार्ता कर समाधान निकालना कठिन होगा ।
सरकार चाहें तो २३ गते के दमन की जाँच के लिए आयोग की प्रतीक्षा कर सकती है, परन्तु २४ गते के योजनाबद्ध अपराधों की जाँच रोक कर उसने पहले ही एक बड़ी भूल की है । गृह मन्त्री ओमप्रकाश अर्याल के आदेश भविष्य में उन्हीं के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं । जब सशक्त राज्य व्यवस्था आएगी, तो यही दस्तावेज उनके खिलाफ प्रमाण बन सकता है ।
जेनजी आन्दोलन के अग्रणी स्वयं कह चुके हैं– “सरकार गिराना, संसद भंग करना या आगजनी हमारी योजना नहीं थी ।” परन्तु अन्य समूहों की भूमिका को लेकर प्रश्न बने हुए हैं । यह सत्य है कि भाद्र २३ और २४ का घटनाक्रम नेपाल राष्ट्रविरुद्ध एक गम्भीर षड्यंत्र था । यदि सरकार दोनों घटनाओं को एक ही ‘थाली’ में रखकर जाँच आयोग को सौंपती है, तो यह चुनाव टालने और अपराध को बढ़ावा देने के बराबर होगा ।
२३ गते राज्य पक्ष से युवाओं की हत्या हुई, इसलिए गोली चलाने वालों, आदेश देने वालों और राजनीतिक नेतृत्व सबको जाँच के दायरे में लाना कठिन नहीं है । परन्तु २४ गते के अपराधों के दोषी या तो फरार हैं या छिपे हुए । उनकी खोज और कारवाही सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए । अतः अब राज्य के संयन्त्रों को स्वतन्त्रता के साथ प्रमाण संकलन, अनुसन्धान और निष्कर्ष निकालने की अनुमति दी जानी चाहिए । देश में भयमुक्त वातावरण बनाकर निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न कराना ही सरकार का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए ।
अब का गंतव्य
सत्य यही है कि हर परिवर्तन या क्रांति के पश्चात हुए चुनावों में उस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली शक्ति ही चुनाव में बहुमत लाती है । कौन जाने, यदि जेनजी एकजुट होकर एक मजबूत दल बनाएँ तो आने वाले चुनाव में वे दो–तिहाई बहुमत भी ला सकते हैं ! इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता । इसलिए पुराने दलों द्वारा उन्हें अवमूल्यन करना और आन्दोलन की शक्ति से निर्मित चुनावी सरकार को असंवैधानिक कहकर मानमर्दन करना, ऐसी कार्य बंद होना चाहिए ।
सामान्यतः राजनीतिक क्रांति और आन्दोलन के पश्चात तत्कालीन संविधान में परिवर्तन होता है । नया अंतरिम संविधान बनाएँ या पुराने संविधान में संशोधन– यह तत्कालीन आन्दोलनकारी शक्ति और पुराने राजनीतिक शक्तियों के बीच होने वाली सहमति से तय होता है । सामान्यतः जब आन्दोलनकारी शक्ति हावी होती है तो पुराना संविधान खारिज करके नया अंतरिम संविधान बनता है । यदि दोनों शक्तियों का समान अस्तित्व स्वीकार किया जाता है तो समझदारी से संविधान में संशोधन करते हैं । वर्तमान स्थिति में हमने ये दोनों काम नहीं किए हैं । राष्ट्रपति में निहित विशेष अधिकारों का प्रयोग करके संविधानानुसार ही चुनावी सरकार बनाई गई है । इसका अर्थ यही है कि चुनाव के बाद आने वाली नई सत्ता– संसद ही अब संविधान संशोधन करने का कार्य करेगी । नेपाल का संविधान इतना लचीला दस्तावेज है कि देश की सीमाओं और जनता में निहित सार्वभौम सत्ता को छोड़कर बाकी सब कुछ संविधान संशोधन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है । अब हमारा मार्ग यही है ।

लेखक,

