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शादी विवाह में निभाई जाती है माटी कोड़ने की परंपरा, यहां जानिए इसकी मान्यता

 


सनातन धर्म में किसी भी मानव जीवन के 16 संस्कार बताए गए हैं. इनमें विवाह संस्कार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. विवाह को केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ के रूप में देखा जाता है. इस दौरान अनेक विधि-विधान और रस्में निभाई जाती हैं. इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख रस्म मटकोड़वा की होती है. विवाह से पहले मटकोड़वा और मड़वा गाड़ने की परंपरा निभाई जाती है, जो शुभता और मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है

मटकोड़वा का शाब्दिक अर्थ है मिट्टी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना. यह रस्म दूल्हे या दुल्हन की मां और चाची द्वारा निभाई जाती है. ढोल-नगाड़ों के साथ परिवार और समाज के लोग एक निर्धारित स्थान पर जाते है. वहां से मिट्टी लाते हैं. इस दौरान पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है. लायी गई मिट्टी से मड़वा स्थापित किया जाता है, जहां विवाह के प्रमुख अनुष्ठान संपन्न होते हैं.

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शास्त्रों में पृथ्वी को भगवान विष्णु के पत्नी स्वरूप माना गया है. शास्त्रों में बताया गया है कि ‘समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले, विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे’ के माध्यम से धरती माता को प्रणाम किया जाता है. इसका अर्थ है कि पृथ्वी भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में पूजनीय हैं और उनसे पांव स्पर्श के लिए क्षमा मांगी जाती है. विवाह जैसे शुभ कार्य से पहले धरती मां को निमंत्रण देना और उनसे आशीर्वाद लेना अनिवार्य माना गया है. मिट्टी को समृद्धि और माता लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक भी समझा जाता है.
आगे कहा कि मटकोड़वा के लिए मिट्टी किसी विशेष और स्वच्छ स्थान से लाने की परंपरा है. ध्यान रखा जाता है कि वहां किसी प्रकार की गंदगी न हो और स्थान पवित्र हो. विधि-विधान के साथ मिट्टी लाकर पूजा की जाती है. हालांकि आवश्यकता पड़ने पर लोग अन्य स्थानों से भी मिट्टी लाकर यह रस्म निभा सकते हैं, लेकिन परंपरा में स्वच्छ और पवित्र स्थल को प्राथमिकता दी जाती है.

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