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इतिहास को शास्त्र मानने वाला साधक : ठाकुर राम सिंह प्रो. एस.एस. डोगरा

 

 

New Doc 02-04-2026 09.32

जब इतिहास लेखन केवल तिथियों और घटनाओं का संकलन न रहकर राष्ट्रबोध का माध्यम बनता है, तब वह अतीत का विवरण नहीं, बल्कि किसी राष्ट्र की आत्मा, चेतना और भविष्य–दृष्टि का आधार बन जाता है । इतिहास की दृष्टि यदि विकृत हो जाए, तो समाज की दिशा भी भटक जाती है । ऐसे समय में कुछ व्यक्तित्व इतिहास को केवल पढ़ते नहीं, बल्कि इतिहास–दृष्टि को पुनस्र्थापित करते हैं । ठाकुर राम सिंह ऐसे ही विरल और तपस्वी व्यक्तित्व थे ।

१६ फरवरी १९१५ को हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जनपद के झंडवीं गाँव में जन्मे ठाकुर राम सिंह का जीवन साधारण परिवेश से निकलकर असाधारण वैचारिक ऊँचाइयों तक पहुँचा । एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर क्रिश्चियन कॉलेज से इतिहास में स्वर्ण पदक के साथ एम.ए. करना और फिर सुरक्षित, प्रतिष्ठित प्राध्यापक पद को त्यागकर राष्ट्रकार्य में स्वयं को समर्पित कर देना–यह निर्णय केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं, बल्कि दृढ़ वैचारिक संकल्प का प्रतीक था ।

संघ प्रचारक ः तप, त्याग और निरंतर प्रवास
वर्ष १९४२ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनने के साथ ही ठाकुर राम सिंह ने अपने जीवन को संगठन, समाज और राष्ट्र के लिए अर्पित कर दिया । देश पर लगे प्रतिबंधों के कठिन दौर में उन्होंने न केवल स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया, बल्कि जेल में बंद कार्यकर्ताओं के परिवारों की जिम्मेदारी भी निभाई ।
शोध संस्थान नेरी से प्रकाशित पत्रिका “इतिहास दिवाकर” के जनवरी, २०१५ विशेषांक में मोहन भागवत जी ने अपने सन्देश में लिखा कि “श्रद्धेय ठाकुर राम सिंह जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे । उनका सम्पूर्ण प्रचारक जीवन हम सब लोगों के लिए निर्भयता, ध्येयनिष्ठा, परिश्रमों की दृढ़ता तथा चरित्र की निर्मल निस्पृहता का उज्जवल उदाहरण है ।”
१९४९ में श्रीगुरुजी के निर्देश पर उनका प्रवास पूर्वोत्तर भारत की ओर हुआ–जहाँ दुर्गम भूगोल, भाषाई विविधता और सामाजिक जटिलताएँ थीं । असम प्रांत में २२ वर्षों तक संघ कार्य को सुदृढ़ करना उनकी संगठन क्षमता, धैर्य और आत्मिक दृढ़ता का प्रमाण है । रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल पर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा, एक गंभीर दुर्घटना में एक आँख और घुटने की स्थायी चोट, फिर भी निरंतर प्रवास–यह केवल शारीरिक सहनशक्ति नहीं, बल्कि वैचारिक निष्ठा का उदाहरण था । ९० वर्ष की आयु पार करने के बाद भी न छड़ी का सहारा, न किसी का–उनका आत्मविश्वास ही उनका संबल था ।
इतिहास ः कला नहीं, शास्त्र
ठाकुर राम सिंह का सबसे महत्वपूर्ण योगदान भारतीय इतिहास–दृष्टि को पुनः स्थापित करना रहा । उनका स्पष्ट और निर्भीक मत था–
“इतिहास कला नहीं, शास्त्र है ।”
वे तर्क और प्रमाण के साथ बताते थे कि भारतीय परंपरा में इतिहास की शुरुआत सृष्टि और प्रकृति से होती है, इसलिए इतिहास–पुराण को पंचम वेद कहा गया । मानव उत्पत्ति, वंश–परंपरा और कालगणना–ये सभी भारतीय इतिहास को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं ।
वे भारतीय इतिहास को ईसा पूर्व–ईस्वी सन् की संकीर्ण सीमा में बाँधने के प्रबल विरोधी थे । उनका मानना था कि पश्चिमी धार्मिक ग्रंथों पर आधारित ६,००० वर्ष की पृथ्वी–आयु की अवधारणा न तो वैज्ञानिक है, न भारतीय । महर्षि कणाद का काल–तत्व और भारतीय ‘सी’षियों की १९७ करोड़ वर्ष की कालगणना आज आधुनिक विज्ञान के अधिक समीप प्रतीत होती है । उनका दृढ़ विश्वास था कि एक दिन पाश्चात्य इतिहास–दृष्टि को भारतीय शास्त्रीय दृष्टिकोण के निकट आना ही पड़ेगा ।
इतिहास संकलन ः एक वैचारिक आंदोलन
वर्ष १९८८ में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना का दायित्व और १९९२ में उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व सँभालने के बाद ठाकुर राम सिंह ने इतिहास संकलन को एक संगठनात्मक गतिविधि से उठाकर वैचारिक आंदोलन का स्वरूप दिया ।
आर्य आक्रमण सिद्धांत, सिकंदर की विजय से जुड़ी अतिशयोक्तियाँ जैसे स्थापित मिथकों को उन्होंने तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर चुनौती दी । सैकड़ों इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को वास्तविक, प्रमाण–आधारित इतिहास लेखन के लिए प्रेरित किया ।
हिमाचल प्रदेश के नेरी में स्थापित ठाकुर राम सिंह इतिहास शोध संस्थान उनके जीवन की अंतिम साधना का केंद्र बना–जहाँ शोध, विमर्श और दस्तावेजीकरण को नई दिशा मिली ।
अंतिम क्षणों तक साधना
९४ वर्ष की आयु और अस्वस्थ शरीर के बावजूद अगस्त २०१० में १९७ करोड़ रुपये की इतिहास परियोजना के शुभारंभ में उनकी सहभागिता यह दर्शाती है कि इतिहास उनके लिए विषय नहीं, जीवन–साधना था । अस्पताल के बिस्तर से भी भारतीय पंचांग पर हस्तलिखित तथ्य भेजना उनकी अद्वितीय प्रतिबद्धता का प्रमाण है । ६ सितंबर २०१० को उनका देहांत हुआ, परन्तु उनकी वैचारिक विरासत आज भी जीवित है ।
संपादकीय निष्कर्ष
शोध संस्थान नेरी की पत्रिका “इतिहास दिवाकर” के जनवरी, २०१५ अंक के सम्पादकीय में डॉ विद्या चन्द ठाकुर ने भी लिखा “भारतवर्ष का गौरवशाली इतिहास सत्य तथ्यों के साथ प्रकाश में लाना ठाकुर रामसिंह जी का परम लक्ष्य रहा है । इसके लिए वे देश भर में निरन्तर प्रवास करते रहे । लक्ष्य पूर्ति के ध्येय से वे आजीवन अपनी ९६ वर्ष की आयु पर्यन्त पूर्ण आत्मविश्वास के साथ ‘चरैवेति! चरैवेति!’ के ‘सी’षि सन्देश को चरितार्थ करते हुए कभी यहाँ तो कभी वहाँ चलते रहे । चलते रहे! कभी थके नहीं ।”
१११वीं जयंती, १५ फरवरी २०२६ को हमीरपुर में
ठाकुर राम सिंह की १११वीं जयंती एवं इतिहास दिवस १५ फरवरी २०२६ को ठाकुर राम सिंह इतिहास शोध संस्थान, नेरी (हमीरपुर, हि.प्र.) में मनाया जाएगा । कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः हवन यज्ञ से होगा, जिसके पश्चात भजन–कीर्तन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, ऐतिहासिक प्रदर्शनी तथा ठाकुर रामसिंह जी की प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा । इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा मुख्य अतिथि होंगे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो । ईश्वर शरण विश्वकर्मा करेंगे । वरिष्ठ विचारक श्री सुरेश सोनी मुख्य वक्ता तथा महंत सूर्यनाथ जी एवं प्रो । प्रेम कुमार धूमल विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे । उक्त संस्थान के संस्थापक सदस्य सुरेंद्र नाथ शर्मा जी ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य ठाकुर रामसिंह जी की विरासत को स्मरण करते हुए समाज में इतिहास बोध और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करना है ।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ठाकुर राम सिंह केवल एक प्रचारक या इतिहासकार नहीं थे–वे इतिहास–दृष्टि थे, जो राष्ट्र को आत्मबोध से जोड़ती है । आज जब इतिहास को लेकर वैचारिक संघर्ष तीव्र है, तब ठाकुर राम सिंह जैसे व्यक्तित्व हमें स्मरण कराते हैं कि इतिहास सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि सभ्यता का सत्य होता है ।
वे चले गए,
पर एक प्रश्न छोड़ गए–
क्या हम इतिहास को केवल पढ़ेंगे,
या उसे समझकर राष्ट्र का भविष्य गढ़ेंगे ?
(लेखक प्रो. एस.एस.डोगरा–हिमालिनी पत्रिका (नेपाल) के दिल्ली से ब्यूरो प्रमुख तथा दी फोरेन कोरेस्पोंडेंट क्लब ऑपÞm साउथ एशिया के सक्रिय सदस्य हैं)

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