हम न्याय चाहते हैं या बदला ? : जयप्रकाश आनंद
जयप्रकाश आनंद, २८ मार्च ०२६। भाद्र 23 और 24 को हुए ‘जेन्जी आंदोलन’ के दौरान हुई क्षति की जांच के लिए गठित आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को सौंपी थी। उस समय सरकार ने औपचारिक रूप से रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और सिफारिशों के कार्यान्वयन के लिए अध्ययन करने की प्रतिबद्धता जताई थी। लेकिन समय बीतने के साथ वह प्रतिबद्धता केवल कागजी घोषणा बनकर रह गई। न तो रिपोर्ट सार्वजनिक की गई, न ही सिफारिशों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई।
लेकिन सत्य को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। ‘जन-आस्था’ साप्ताहिक के माध्यम से जब पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, तो दबाया गया यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया।
इसी संवेदनशील पृष्ठभूमि के बीच, कल ही बालेन शाह ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। सरकार गठन के तुरंत बाद हुई पहली कैबिनेट बैठक में प्रवक्ता ने उन सिफारिशों को लागू करने का स्पष्ट संकेत दिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतनी जल्दी नई सरकार ने रिपोर्ट की गहराई और तथ्यों का पर्याप्त अध्ययन कर लिया?
क्योंकि, रात बीतते न बीतते घटनाक्रम ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।
रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर व्यापक कार्रवाई शुरू की गई, जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री सहित प्रमुख व्यक्तियों की गिरफ्तारी की खबरें सामने आईं। इस कदम ने देश की राजनीति में अचानक हलचल पैदा कर दी है।
आज देश दो धड़ों में बंटा हुआ है:
क्या यह देर से ही सही, पर न्याय की शुरुआत है ?
या फिर सत्ता परिवर्तन के साथ शुरू हुआ एक नया राजनीतिक प्रतिशोध ?
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में यह सवाल नया नहीं है।
वि.सं. 2059 (2002 ई.) की घटना इसका ज्वलंत उदाहरण है। संसद से ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ संशोधन पारित होने की रात ही व्यापक गिरफ्तारियां की गई थीं। सूर्यनाथ उपाध्याय के नेतृत्व वाले अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग ने 22 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया था, जिसमें न तो उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ और न ही गिरफ्तारी वारंट के आधारभूत मानदंड। विशेष रूप से नेपाली कांग्रेस से जुड़े व्यक्तियों को निशाना बनाकर लंबे समय तक हिरासत में रखने की उस घटना ने “न्याय” कम और “राजनीतिक प्रतिशोध” की गंध अधिक दी थी।
उस समय नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) ने इन कार्रवाइयों पर जो उत्साह दिखाया था, वह केवल क्षणिक राजनीतिक लाभ नहीं था—वह प्रतिशोध को स्वीकार करने वाली राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब था।
यही प्रवृत्ति हाल की घटनाओं में भी दिखाई देती है। रवि लामिछाने की गिरफ्तारी और उन पर बढ़ते मुकदमों ने राजनीतिक हस्तक्षेप की बहस को बल दिया। आम धारणा यही बनी कि उस कार्रवाई के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की प्रतिशोधात्मक सोच प्रभावी थी।
इसी संदर्भ में, शाही शासन का समय एक बड़े सबक के रूप में सामने आता है। ज्ञानेंद्र शाह के प्रत्यक्ष शासन के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों के नाम पर विपक्षी नेताओं के खिलाफ मुकदमे चलाए गए। कई को जेल भेजा गया और कइयों का राजनीतिक करियर खत्म करने की कोशिश की गई। उस दौर ने स्पष्ट कर दिया कि जब न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र नहीं रहती और सत्ता के उद्देश्यों से बंध जाती है, तो कानून न्याय का साधन नहीं, बल्कि प्रतिशोध का हथियार बन जाता है।
आज पासा पलट गया है।
सत्ता बदल गई है, शक्ति का संतुलन बदल गया है—और आज खुद ओली गिरफ्तारी के घेरे में हैं। इतिहास कभी-कभी ऐसा कठोर व्यंग्य करता है कि जिस रास्ते को आपने कल दूसरों के लिए बनाया था, आज उसी पर खुद चलना पड़ रहा है।
यदि आज की कार्रवाई भी प्रतिशोध की ही निरंतरता है, तो यह एक कड़वा सच उजागर करती है: प्रतिशोध की राजनीति में कोई भी स्थायी विजेता नहीं होता।
लेकिन दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—ओली की गिरफ्तारी के पक्ष में जनमत का एक बड़ा हिस्सा खड़ा है। यह इस बात का संकेत है कि जनता दंडहीनता (Impunity) का अंत चाहती है। मगर, जनभावना के दबाव में प्रक्रिया को ताक पर रखकर की गई कार्रवाई न्याय को वैधता नहीं दे सकती।
यहाँ मूल प्रश्न खड़ा होता है— हम न्याय चाहते हैं या बदला ?
एमाले की राजनीतिक यात्रा में जो प्रतिशोधी प्रवृत्ति दिखी, जहाँ कानून को निष्पक्ष साधन के बजाय राजनीतिक हथियार बनाया गया, वह आज गंभीर आत्म-मंथन का विषय होना चाहिए। लेकिन यह सवाल सिर्फ एक दल का नहीं, बल्कि हमारी पूरी राजनीतिक संस्कृति का है।
लोकतंत्र की शक्ति विपक्ष को कुचलने में नहीं, बल्कि सभी के लिए समान नियम लागू करने में होती है।
यदि यह आधार स्थापित नहीं हुआ, तो हर नई सरकार पुराने अन्याय का बदला लेने में ही व्यस्त रहेगी। इससे न्याय प्रणाली कभी भी स्थिर, विश्वसनीय और संस्थागत नहीं बन पाएगी।
जनता निश्चित रूप से ‘त्वरित कार्रवाई’ चाहती है, लेकिन वह कार्रवाई केवल त्वरित ही नहीं, बल्कि ‘निष्पक्ष’ भी होनी चाहिए।
2059 की घटना हमें चेतावनी देती है कि कानून के दुरुपयोग से मिली “सफलता” वास्तव में एक संस्थागत विफलता ही है। अब भविष्य की ओर देखने का साहस चाहिए। राजनीतिक दलों को यह स्वीकार करना होगा कि आज जो मापदंड वे तय कर रहे हैं, कल वही उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं।
इसलिए:
नियम व्यक्ति को देखकर नहीं, बल्कि पद्धति के आधार पर होने चाहिए।
जांच एजेंसियां पूर्णतः स्वतंत्र होनी चाहिए।
गिरफ्तारी न्यायिक निगरानी के भीतर होनी चाहिए।
और अंतिम फैसला अदालत से ही आना चाहिए।
इन आधारों के बिना भ्रष्टाचार या किसी भी अपराध के खिलाफ लड़ाई विश्वसनीय नहीं हो सकती। अंततः, यह मामला केवल केपी शर्मा ओली या किसी एक दल का नहीं है—यह नेपाल की न्याय प्रणाली के भविष्य का सवाल है।
यदि हम अतीत से सीखेंगे, तो 2059 और शाही शासन जैसी घटनाएं इतिहास तक सीमित रहेंगी। लेकिन यदि हम प्रतिशोध का चक्र दोहराते रहे, तो भविष्य भी अतीत की एक धुंधली प्रतिलिपि मात्र बनकर रह जाएगा।
(जयप्रकाश आनंद द्वारा लिखित इस लेख का मूल भाव राजनीतिक प्रतिशोध और न्याय के बीच की धुंधली रेखा को रेखांकित करना है।)

