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कथा नहीं क्रिया चाहिए ! अजयकुमार झा

 
अजयकुमार झा, जलेश्वर 4 अप्रैल 926।

नेपाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में यदि यह कहा जाए कि गृह मंत्री सूदन गुरुंग के कठोर और तीव्र एक्शन से जनता स्वतः ही प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के समर्थन में सड़कों पर उतर सकती है, तो यह कथन केवल भावनात्मक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और समकालीन अनुभवों से पुष्ट होता है। नेपाल के अनेक भ्रष्टाचार काण्डों और शासन-संबंधी विफलताओं ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि जब सत्ता कठोरता दिखाती है, तो जनता उसमें न्याय की आशा देखती है।
सबसे पहले, भूटानी शरणार्थी घोटाला का उदाहरण लें। इस काण्ड में उच्चस्तरीय राजनीतिक और प्रशासनिक संलिप्तता उजागर हुई। जब इस मामले में गिरफ्तारियाँ हुईं, तब जनता में यह संदेश गया कि “कानून अब बड़े लोगों तक भी पहुँच रहा है।” इसने आम नागरिकों के भीतर एक विश्वास जगाया कि यदि सरकार ईमानदारी से कार्रवाई करे, तो व्यवस्था सुधर सकती है। यही मनोविज्ञान आगे चलकर जनता को सड़क पर समर्थन के लिए प्रेरित करता है।
दूसरा प्रमुख उदाहरण ललिता निवास भूमि घोटाला है। इस प्रकरण में देश की बहुमूल्य सरकारी जमीन को निजी स्वार्थ के लिए हड़पने का मामला सामने आया। जब इस मामले में पूर्व उच्च पदस्थ व्यक्तियों पर कार्रवाई शुरू हुई, तब जनता में व्यापक चर्चा हुई कि “अब असली परिवर्तन संभव है।” लेकिन जब कार्रवाई धीमी पड़ती है या राजनीतिक प्रभाव में कमजोर होती दिखती है, तो यही उम्मीद निराशा में बदल जाती है। इसीलिए यदि गृह मंत्री तीव्रता बनाए रखते हैं, तो यह निराशा पुनः समर्थन में बदल सकती है।
तीसरा, वाइड बॉडी विमान खरीद घोटाला जैसे मामलों ने भी शासन की पारदर्शिता पर प्रश्न उठाए। इस काण्ड में अरबों की अनियमितता की बात सामने आई, लेकिन अपेक्षित कठोर कार्रवाई का अभाव जनता को खटकता रहा। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि केवल काण्ड उजागर होना पर्याप्त नहीं—निर्णायक कार्रवाई ही जनसमर्थन को जन्म देती है।
इसी प्रकार बालुवाटार जग्गा प्रकरण और अन्य प्रशासनिक अनियमितताओं ने यह धारणा मजबूत की कि सत्ता और प्रशासन के गठजोड़ से भ्रष्टाचार पनपता है। जब-जब इन मामलों में ठोस कदम उठाए गए, जनता ने उसका स्वागत किया; और जब ढिलाई बरती गई, तो जनता में आक्रोश बढ़ा।
नेपाल के इतिहास में जनआंदोलन द्वितीय इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जब जनता को लगा कि शासन उनकी आकांक्षाओं के विरुद्ध है, तो वे स्वतः सड़कों पर उतर आए। आज का परिदृश्य अलग जरूर है, लेकिन जनता की मनोवृत्ति वही है—न्याय और सुशासन के पक्ष में खड़े होना।
वर्तमान में सुदन गुरुङ यदि भ्रष्टाचारियों और अपराधियों के विरुद्ध तेज, निष्पक्ष और निरंतर कार्रवाई करते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक कदम नहीं होगा, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक संदेश होगा। इससे जनता को यह लगेगा कि सरकार सच में परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध है। और जब जनता को यह भरोसा हो जाता है, तो वे केवल दर्शक नहीं रहते—वे सक्रिय समर्थक बन जाते हैं।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि नेपाल की जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती; वे परिणाम देखना चाहती है। यदि कार्रवाई तीव्र, निष्पक्ष और निरंतर रही, तो जनता का समर्थन स्वतः ही सड़कों पर दिखाई देगा—और यह समर्थन विशेष रूप से बालेन्द्र शाह जैसे नेतृत्व के पक्ष में संगठित हो सकता है, जिसे वे परिवर्तन का प्रतीक मानते हैं।

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अजयकुमार झा, जलेश्वर ।

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