मधेश को “समझने” नहीं, सुनने की ज़रूरत है : राकेश मिश्रा
राकेश मिश्रा, बिराटनगर, 11 अप्रैल । नेपाल की राजनीति में एक विचित्र विडम्बना बार-बार दिखाई देती है। जो समूह स्वयं को “प्रगतिशील”, “समावेशी” और “लोकतांत्रिक” कहता है, वही कई बार मधेश के सवालों पर आते ही एक अजीब paternalistic और patronizing रवैया अपनाने लगता है। मानो मधेश अपनी राजनीतिक चेतना स्वयं विकसित नहीं कर सकता, मानो वहाँ की जनता को हमेशा कोई “सही रास्ता” दिखाने वाला संरक्षक चाहिए।
मधेश के राजनीतिक व्यवहार को समझने के बजाय उस पर तुरंत वैचारिक लेबल चिपका देना आज नेपाली प्रगतिशील राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है।
यदि मधेश के एक बड़े हिस्से ने बालेन शाह जैसे व्यक्तित्व में संभावनाएँ देखीं, उन्हें वोट दिया या समर्थन किया, तो यह कोई अपराध नहीं है। लोकतंत्र में जनता अपने अनुभव, आकांक्षा और असंतोष के आधार पर राजनीतिक विकल्प चुनती है। यह अधिकार काठमांडू के बुद्धिजीवियों के पास जितना है, उतना ही जनकपुर, वीरगंज, राजविराज और बिराटनगर के लोगों के पास भी है।
मधेशी समाज के भीतर “एक मधेशी प्रधानमंत्री” देखने की आकांक्षा भी पूरी तरह वैध, लोकतांत्रिक और स्वाभाविक है। सदियों से राज्यसत्ता के केंद्र से दूरी महसूस करने वाला समुदाय यदि प्रतिनिधित्व चाहता है, तो उसे “पहचान की राजनीति” कहकर खारिज करना दरअसल उसी exclusionary mindset का हिस्सा है, जिसके खिलाफ प्रगतिशील राजनीति खड़ी होने का दावा करती है।
विडम्बना यह है कि वही प्रगतिशील तब अत्यधिक सक्रिय दिखाई देते हैं जब मुद्दा ordinance, eviction drive, chief justice नियुक्ति या सत्ता-संघर्ष का हो। सोशल मीडिया से लेकर editorial pages तक तत्काल “लोकतंत्र खतरे में है” का शोर उठने लगता है। लेकिन जब बात मधेश के existential issues की आती है—सीमा क्षेत्र की रोज़मर्रा की कठिनाइयाँ, नागरिकता का अपमान, भाषाई असमानता, प्रतिनिधित्व का संकट, सुरक्षा बलों की ज्यादती, या राज्य द्वारा लगातार पैदा की जाने वाली असुरक्षा—तब यही आवाज़ें असाधारण रूप से शांत हो जाती हैं।
यह silence केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक भी है।
मधेशी समाज ने बालेन शाह की हर बात का समर्थन नहीं किया है। सीमा सुरक्षा, स्थानीय प्रशासन और भारत-नेपाल सीमा से जुड़े कई मुद्दों पर मधेश के भीतर गंभीर आलोचना हुई है। लोगों ने तार्किक ढंग से सवाल उठाए हैं कि borderland communities की जटिल वास्तविकताओं को समझे बिना लिए गए निर्णय आम जनता के जीवन को प्रभावित करते हैं। लेकिन इन specific आलोचनाओं को नजरअंदाज कर पूरे मधेशी समुदाय को “reactionary”, “misguided” या “Balen cult” कह देना intellectual dishonesty है।
किसी भी समुदाय के भीतर विविधता होती है। मधेश भी कोई monolithic block नहीं है। वहाँ वामपंथी हैं, उदारवादी हैं, क्षेत्रीय चेतना वाले लोग हैं, राष्ट्रवादी हैं, और नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश करने वाले युवा भी हैं। कुछ लोग बालेन के प्रति soft corner रखते हैं, कुछ उनका तीखा विरोध करते हैं। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक चरित्र है, कोई सामूहिक अपराध नहीं।
असल समस्या यह है कि नेपाल का प्रभुत्वशाली राजनीतिक विमर्श आज भी मधेश को बराबरी के साझेदार की तरह नहीं, बल्कि “manage” किए जाने वाले क्षेत्र की तरह देखता है। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक “समावेशिता” केवल seminar और slogans तक सीमित रहेगी।
मधेश ने हमेशा अलगाव नहीं, सम्मानजनक सहभागिता की माँग की है। उसने inclusive और equitable नेपाल का सपना देखा है—ऐसा नेपाल जहाँ नागरिक की गरिमा उसकी भाषा, भूगोल, surname या accent से तय न हो। जहाँ मधेश की आवाज़ को केवल चुनाव के समय नहीं, नीति निर्माण के हर स्तर पर सुना जाए।
इसलिए आज आवश्यकता rhetoric की नहीं, dialogue की है। मधेश को lecture देने की नहीं, उसे सुनने की है। प्रगतिशील राजनीति यदि सचमुच लोकतांत्रिक है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि मधेश केवल sympathy का विषय नहीं, बल्कि agency रखने वाला एक जीवंत राजनीतिक समाज है।
और किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इसी से तय होती है कि वह अपने हाशिए की आवाज़ों को कितना सम्मान देता है। राकेश मिश्रा के फेसबुक स्टेटस से


