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नेपाल की अर्थव्यवस्था: रेमिटेंस-चालित वृद्धि की सतही सफलता और सतत विकास की राह :राकेश मिश्रा

 

राकेश मिश्रा, विराटनगर, 13 मई । नेपाल की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक से एक अनोखी स्थिति का सामना कर रही है। वर्ष २०१४ से २०२५ तक नेपाल का औसत वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर (real GDP growth) मात्र ४-४.५% रहा (विश्व बैंक और राष्ट्रीय लेखा आंकड़ों के अनुसार), फिर भी प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income – PCI) या GNI per capita लगभग दोगुनी हो गई है। वर्ष २०१४ में जीडीपी प्रति व्यक्ति लगभग ८२७ अमेरिकी डॉलर था, जो २०२४/२५ में १४००-१५०० डॉलर के आसपास पहुंच गया है (Atlas method)।

यह तथ्य सामान्य आर्थिक सिद्धांत — घरेलू जीडीपी वृद्धि और प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के बीच मजबूत सकारात्मक सहसंबंध — को चुनौती देता प्रतीत होता है।

मुख्य कारण: रेमिटेंस का बड़ा योगदान
इस वृद्धि का प्रमुख कारण विदेशी रेमिटेंस है। नेपाल में रेमिटेंस का योगदान जीडीपी का २०-२८.६% तक है (२०२४/२५ में नेपाल राष्ट्र बैंक के अनुसार २८.६%)। रेमिटेंस को Gross National Income (GNI) और Gross National Disposable Income (GNDI) में शामिल किया जाता है, लेकिन यह घरेलू उत्पादन (GDP) में प्रत्यक्ष योगदान नहीं देता।

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नतीजतन, नाममात्र डॉलर में प्रति व्यक्ति आय आकर्षक दिखती है, पर यह भ्रामक (misleading) है क्योंकि यह मुख्यतः विदेशी आय पर आधारित है, न कि घरेलू उत्पादकता (domestic productivity) में वृद्धि पर।

जनसंख्या गतिशीलता ने भी इस प्रक्रिया को सहारा दिया है। नेपाल की जनसंख्या वृद्धि दर ०.५-१% तक गिर गई है और कुछ वर्षों में नकारात्मक भी रही, मुख्य रूप से आउट-माइग्रेशन के कारण। इससे प्रति व्यक्ति आय के denominator (जनसंख्या) में कमी आई, जिसने यांत्रिक रूप से PCI को बढ़ावा दिया।

भारत से तुलना
भारत की स्थिति इसके विपरीत है। भारत ने ६-७%+ जीडीपी वृद्धि हासिल की है और उसकी प्रति व्यक्ति आय वृद्धि घरेलू कारकों पर आधारित है। भारत में रेमिटेंस का योगदान मात्र ३-३.५% (विश्व बैंक २०२४) है। वहां manufacturing, आईटी सेवाएं और घरेलू निवेश ने जीडीपी तथा PCI दोनों को मजबूती से संरेखित (align) किया है।

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जोखिम और चिंताएं
प्रति व्यक्ति आय वृद्धि की यह सतही प्रकृति दीर्घकालीन जोखिमों को उजागर करती है। प्रमुख जोखिमों में शामिल हैं:
– ब्रेन ड्रेन (Brain drain)
– परिवारों की रेमिटेंस पर निर्भरता
– मेजबान देशों की नीतिगत अनिश्चितता
– संरचनात्मक परिवर्तन (structural transformation) की कमी

रेमिटेंस-चालित खपत ने गरीबी घटाने में मदद की है, लेकिन सतत विकास (sustainable development) के लिए यह पर्याप्त नहीं है।

आगे की राह: घरेलू उत्पादकता पर जोर
नेपाल को अब रेमिटेंस निर्भरता घटाकर घरेलू उत्पादकता और संरचनात्मक परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

आर एंड डी और मानव संसाधन विकास (R&D & HRD): अनुसंधान एवं विकास तथा मानव संसाधन विकास को प्राथमिकता दें।
हल्का कृषि-आधारित विनिर्माण: मसाले, चाय, जड़ी-बूटियां और फलों में मूल्यवर्धन (value addition) कर निर्यात-उन्मुख विकास को बढ़ावा दें।
नवाचार और डिजिटल सेवाएं: डिजिटल अर्थव्यवस्था, आईटी-सक्षम सेवाएं और स्टार्टअप इकोसिस्टम का विकास करें।
नए पर्यटन उत्पाद: पारंपरिक पर्यटन के अलावा वाइल्डलाइफ, शैक्षिक, एडवेंचर, इको-टूरिज्म, सांस्कृतिक इमर्शन और वेलनेस पर्यटन जैसे उच्च-मूल्य वाले उत्पाद विकसित करें।

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हाइड्रोपावर, बुनियादी ढांचा और कौशल-आधारित शिक्षा में निवेश बढ़ाकर निवेश-चालित और निर्यात-उन्मुख मॉडल अपनाना जरूरी है। इससे ब्रेन ड्रेन रोका जा सकेगा, दीर्घकालीन आर्थिक संरेखण (convergence) हासिल होगा और बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षा मिलेगी।

निष्कर्ष:
प्रति व्यक्ति आय में हुई वृद्धि सकारात्मक है, लेकिन यह केवल भ्रामक सतही सफलता हो सकती है। यदि नेपाल अब उत्पादक क्षमता (productive capacity) निर्माण पर केंद्रित होता है, तभी वह सच्ची और सतत आर्थिक उन्नति हासिल कर सकता है।

**राकेश मिश्रा**
(आर्थिक विश्लेषक)

यह रिपोर्ट पूर्ण रूप से दिए गए आंकड़ों और विश्लेषण पर आधारित है। इसे सरकारी कर्मकांडी पोर्टल के बजाय व्यावहारिक और स्पष्ट भाषा में तैयार किया गया है ताकि नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और आम पाठकों दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध हो। सम्पादक

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