शी चिनफिंग की नई रणनीति और ताइवान संकट : अनिल तिवारी
अनिल तिवारी, बिरगंज । 21वीं सदी की विश्व राजनीति में चीन सबसे प्रभावशाली शक्तियों में उभरकर सामने आया है। राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व में चीन ने आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और कूटनीतिक सभी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने की व्यापक रणनीति अपनाई है। विशेष रूप से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) की हालिया राजनीतिक दिशा यह संकेत देती है कि चीन अब केवल आर्थिक महाशक्ति बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि दीर्घकालिक योजना के तहत वैश्विक व्यवस्था को अपने अनुकूल ढालने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
तीसरा कार्यकाल संभालने के बाद शी चिनफिंग ने “राष्ट्रीय पुनर्जागरण” (National Rejuvenation) को अपना प्रमुख राजनीतिक अभियान बनाया है। उनका मानना है कि चीन को अपनी ऐतिहासिक प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करनी चाहिए और इसके लिए राष्ट्रीय एकता, सैन्य शक्ति, तकनीकी आत्मनिर्भरता, मजबूत अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को समानांतर रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है। इसी कारण ताइवान, दक्षिण चीन सागर, आधुनिक सैन्य विस्तार, उच्च तकनीक में निवेश और आर्थिक पुनर्गठन आज चीन की प्रमुख प्राथमिकताएं बन चुकी हैं।
शी चिनफिंग के लिए ताइवान केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि चीनी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। उन्होंने कई बार कहा है कि ताइवान “चीन का अभिन्न हिस्सा” है और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग कर भी उसका एकीकरण किया जाएगा।
कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस में उन्होंने स्पष्ट कहा कि ताइवान की स्वतंत्रता की किसी भी संभावना को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार ताइवान के एकीकरण के बिना चीन का राष्ट्रीय पुनर्जागरण अधूरा रहेगा।
बीजिंग के दृष्टिकोण से ताइवान पर नियंत्रण तीन प्रमुख रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करता है—
राष्ट्रीय एकीकरण के ऐतिहासिक लक्ष्य को पूरा करना।
अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति को चुनौती देना।
पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में चीनी नौसैनिक प्रभुत्व का विस्तार करना।
इसी कारण पिछले कुछ वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास, नौसैनिक गश्त, लड़ाकू विमानों की उड़ान तथा मिसाइल परीक्षणों में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
हाल के वर्षों में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने ताइवान के वायु रक्षा क्षेत्र के निकट नियमित रूप से लड़ाकू विमान भेजना, युद्धपोत तैनात करना और बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास करना तेज कर दिया है। इसका उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि ताइवान की मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध क्षमता को कमजोर करना भी है।
चीन का मानना है कि यदि सैन्य और कूटनीतिक दबाव लगातार बनाए रखा जाए तो ताइवान धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ जाएगा और अंततः बीजिंग के साथ समझौता करने को मजबूर होगा। दूसरी ओर ताइवान इस रणनीति को अस्वीकार करते हुए अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था, संप्रभुता और स्वतंत्र राजनीतिक प्रणाली की रक्षा करने के संकल्प को दोहराता रहा है।
अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा का केंद्र
ताइवान आज अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। अमेरिका “वन चाइना पॉलिसी” को स्वीकार करने के बावजूद ताइवान को आधुनिक हथियार उपलब्ध करा रहा है, सुरक्षा सहयोग बढ़ा रहा है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने सहयोगी देशों के साथ सैन्य साझेदारी का विस्तार कर रहा है।
इससे बीजिंग और अधिक आक्रामक हो गया है। चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान का उपयोग करके उसके उदय को रोकना चाहता है।
यदि भविष्य में ताइवान को लेकर कोई सैन्य संघर्ष होता है, तो उसका प्रभाव केवल चीन और ताइवान तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक व्यापार, सेमीकंडक्टर उद्योग, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
ताइवान के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर भी आज दुनिया के सबसे संवेदनशील सामरिक क्षेत्रों में शामिल है। विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
चीन “नाइन-डैश लाइन” (Nine-Dash Line) के आधार पर दक्षिण चीन सागर के अधिकांश हिस्से पर दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी विभिन्न क्षेत्रों पर अपना दावा जताते हैं।
वर्ष 2016 में संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) ने चीन के दावे को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप अमान्य घोषित किया था, लेकिन बीजिंग ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया।
वर्ष 2026 में फिलीपींस और जापान द्वारा समुद्री सीमा निर्धारण तथा सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की घोषणा के बाद चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। चीन ने फिलीपींस के रक्षा सचिव गिल्बर्टो टियोडोरो पर प्रतिबंध लगाते हुए आरोप लगाया कि वे चीन के हितों के विरुद्ध गतिविधियां चला रहे हैं।
इसके साथ ही चीन ने ताइवान के पूर्वी समुद्री क्षेत्र में “कानून प्रवर्तन गश्त” (Law Enforcement Patrol) के नाम पर नियमित नौसैनिक गतिविधियां बढ़ा दी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इसका उद्देश्य केवल समुद्री निगरानी नहीं, बल्कि ताइवान पर चारों ओर से रणनीतिक दबाव बनाना भी है।
जापान, फिलीपींस और अमेरिका के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग ने चीन को और अधिक सतर्क कर दिया है। इसलिए बीजिंग अपनी समुद्री उपस्थिति और सैन्य अभ्यास को लगातार विस्तार दे रहा है।
सैन्य आधुनिकीकरण
शी चिनफिंग के नेतृत्व में चीन ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को विश्वस्तरीय सैन्य शक्ति बनाने का अभियान तेज कर दिया है। रक्षा बजट लगातार बढ़ाया जा रहा है और अत्याधुनिक हथियारों, साइबर क्षमता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीक तथा मिसाइल प्रणालियों में भारी निवेश किया जा रहा है।
विशेष रूप से परमाणु प्रतिरोध क्षमता के विस्तार में चीन ने उल्लेखनीय प्रगति की है। शिनजियांग के हामी क्षेत्र में अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के लिए नए प्रक्षेपण केंद्र, भूमिगत सैन्य सुविधाएं तथा मिसाइल नियंत्रण केंद्रों के निर्माण के प्रमाण उपग्रह चित्रों में दिखाई दिए हैं। इससे संकेत मिलता है कि चीन केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हाल ही में चीन ने जिन-क्लास (Type-094) परमाणु पनडुब्बी से समुद्र के भीतर से प्रक्षेपित होने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का सफल परीक्षण किया। विश्लेषकों के अनुसार JL-2 और संभावित JL-3 मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य भेदने में सक्षम हैं। इसका अर्थ है कि चीन अब समुद्र से भी प्रभावी परमाणु प्रतिरोध स्थापित करने की क्षमता विकसित कर चुका है।
भारत पर प्रभाव
अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस और अन्य साझेदार देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को लगातार मजबूत कर रहे हैं। विशेष रूप से फिलीपींस में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के विस्तार और नए रक्षा समझौतों ने चीन की चिंताओं को बढ़ा दिया है।
भारत के लिए भी चीन की गतिविधियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लद्दाख सीमा से लेकर हिंद महासागर तक चीन की बढ़ती सक्रियता ने भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति की पुनः समीक्षा करने के लिए प्रेरित किया है। भारत सीमा अवसंरचना, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, नौसैनिक शक्ति तथा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ रणनीतिक सहयोग को प्राथमिकता दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत-चीन प्रतिस्पर्धा केवल हिमालयी सीमा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तकनीक, व्यापार, समुद्री सुरक्षा, साइबर क्षेत्र और क्षेत्रीय प्रभाव तक भी विस्तारित होगी।
“मजबूत सेना के बिना मजबूत राष्ट्र संभव नहीं”
शी चिनफिंग बार-बार दोहराते हैं कि “मजबूत राष्ट्र के लिए मजबूत सेना अनिवार्य है।” इसी सोच के तहत चीन लगातार अपने रक्षा बजट में वृद्धि कर रहा है। आधुनिक युद्धपोत, विमानवाहक पोत, हाइपरसोनिक मिसाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष तकनीक और परमाणु प्रतिरोध क्षमता में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है।
चीन का लक्ष्य वर्ष 2049 तक PLA को दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में शामिल करना है। इसका उद्देश्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुनिया के किसी भी हिस्से में अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करने की क्षमता विकसित करना भी है।
चीन के इस तीव्र सैन्य आधुनिकीकरण ने भारत, जापान, फिलीपींस, ताइवान और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है।
आर्थिक चुनौतियां
विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन पिछले कुछ वर्षों से नई आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। कोविड-19 के बाद आर्थिक पुनरुद्धार अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो सका। घरेलू उपभोग, निवेश और रियल एस्टेट क्षेत्र में सुस्ती देखी गई है। हालांकि सरकारी नीतिगत समर्थन, उच्च तकनीक में निवेश तथा निर्यात के मजबूत प्रदर्शन के कारण समग्र अर्थव्यवस्था अभी भी अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है।
हाल के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार खुदरा बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे संकेत मिलता है कि उपभोक्ता अभी भी खर्च करने से बच रहे हैं। रियल एस्टेट संकट, युवाओं में बेरोजगारी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने उपभोक्ता विश्वास को कमजोर किया है।
दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन और निर्यात चीन की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी, सौर ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में चीन ने उल्लेखनीय प्रगति की है।
हालांकि अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य विकसित देशों ने चीन के बढ़ते निर्यात पर नए शुल्क, प्रतिबंध और जांच प्रक्रियाएं शुरू कर दी हैं, जो भविष्य में चीन के निर्यात आधारित विकास मॉडल के लिए चुनौती बन सकती हैं।
युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी चीन की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक है। सरकार नए उद्योगों, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार में निवेश बढ़ाकर रोजगार सृजन का प्रयास कर रही है, लेकिन समस्या अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का मानना है कि चीन अब भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख इंजन बना रहेगा, हालांकि आने वाले वर्षों में उसकी आर्थिक वृद्धि दर धीरे-धीरे कम हो सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब निर्माण और अवसंरचना आधारित पुराने आर्थिक मॉडल से हटकर घरेलू उपभोग, उच्च तकनीक, हरित ऊर्जा और नवाचार आधारित नई आर्थिक संरचना की ओर बढ़ रहा है।
भारत-चीन संबंध
सीमा विवाद और गलवान घाटी की घटना के बाद भारत-चीन संबंधों में काफी तनाव आ गया था। हालांकि हाल के महीनों में दोनों देशों ने संबंध सामान्य बनाने की दिशा में प्रयास शुरू किए हैं। चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा को इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना गया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात कर दोनों देशों से प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में आगे बढ़ने की अपील की।
उन्होंने व्यापार, निवेश, संचार, कानून प्रवर्तन और लोगों के बीच संपर्क को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
फिर भी सीमा विवाद का स्थायी समाधान होने तक भारत में चीन के प्रति रणनीतिक अविश्वास पूरी तरह समाप्त होने की संभावना कम है। भारत आर्थिक सहयोग जारी रखते हुए अपनी सुरक्षा क्षमता, अवसंरचना विकास और हिंद-प्रशांत साझेदारी को भी लगातार मजबूत कर रहा है।
भारत और चीन के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है, लेकिन राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों में अविश्वास अभी भी कायम है। दोनों देश विश्व अर्थव्यवस्था की प्रमुख शक्तियां हैं, फिर भी सीमा विवाद, क्षेत्रीय प्रभाव, हिंद-प्रशांत रणनीति और दक्षिण एशिया में प्रभाव विस्तार जैसे मुद्दों पर उनकी प्रतिस्पर्धा जारी रहने की संभावना है।



