मुर्दाशान्ति के मध्य भंवर मे नेपाल* एक विवेचना : डा.विजय दत्त
डा. विजय दत्त, काठमांडू,1 अगस्त। *पृष्ठभूमि*
एक समय दो उल्लु अपना अपना शिकार ढुंढ ले आए । एक ने सर्प दुसरा ने चुहा । अब वे दोनो अपने अपने शिकार को खाने के क्रम मे ही थे कि सर्प का नजर चुहा पर पडा अौर सर्प ने चुहा को खाने की प्रयास कि । इससे चुहा अत्यधिक भयभीत हुआ अौर डर से कांपने लगा । यह देखकर दोनो उल्लु आश्चर्य मे पड गए । यह सोचकर कि ये दोनो मृ्त्यु के द्वार पर खडा है लेकिन भय इनको ज्यादा ही दिख रही है ।
यही अवस्था अभी खाडी देशौं कि है । सभी एक दुसरे पर अत्याधुनिक हतियारों से आक्रमण मे लगे है । इरान मे सिर्फ मुस्लिम साशको नेही लाखौं नागरिकको को मारा है । जितने मरते है सब मुसलमान ही है । पाकिस्तान ने बलुचिस्तान अौर पाक अधिकृत कश्मीर मे अनगिन्ती लोगो को मारा है । अफगानिस्तान मे लगातार बमबारी कर रखा है । मोरोक्को के नागरिक अपने ही सत्ता के कारण महासागर मे डुबकी लगाते स्पेन प्रवेश किए । जिसमे बहुत सारे डुब के मर गए । कतर,बहरीन,इराक,कुवेत,ओमान सहित ५७ देशौ के जमीन लहुलुहान हो रहा है यहि अवस्था सिरिया,लेबनान सहित मे ऐसा ही है । लेकिन नेपाल मे दंगे भडकाने के लिए “गल्फ शान्ति सेना” के नाम पर अकुत रकम पठाते रहे है । नेपाल के कानुन अनुसार, ये सब कानुन विपरीत का कार्य है ।
*आप्रवासी मे चरम अपराधीकरण*-
मुस्लिम देशौ से भागे हुए शरणार्थी युरोप,अमेरिका,अष्ट्रेलिया,भारत,जापान,नेपाल के देशौ मे शरण ली । कहा जाता है कि *शरण का मरण* नहि होता। इसलिए ये सब इन शरणार्थीयो को अपने अपने देश मे रखी । मगर,देखा गया है कि ये सभी देश इन आप्रवासीयौ को देश निकाला कर रहा है । कारण एक ही यो सबके सब अराजक अौर आपराधिक कार्य मे संलग्न है । विकसित देश भी इनके दंगे से परेशान है । भारत के मोदी -योगी मोडेल का सरकार ने तो इनलोगो पर *घोडेबाली लगाम* लगा दी है । नेपाल भी मुस्लिम आप्रवासी के अपराधीकरण से परेशान है । बंगलादेशी मुसलमान,रोहिंग्या मुसलमान,इण्डियन, पाकिस्तानी,सोमालियन मुसलमान के कारण तथा नव प्रवेशी नयाँ नागरिक के कारण यहाँ अराजकता अौर आपराधिक -आतंककारी क्रियाकलाप जोरो से बढि है । एक तो मुसलमान मे बहुविवाह है दुसरा सन्तान जन्माने कि लहर तीसरी, अबैध आप्रवासी के कारण *डेमोग्राफी/जनसंख्या* मे अत्यधिक परिवर्तन हो रहा है । मधेश के जिले मे मुस्लिम जनसंख्या बढती जा रही है जनसंख्या बुद्धि दर ५% से ज्यादा है । जबकि सनातनी हिन्दु मे १% है । इसके कारण *डेमोग्राफी परिवर्तन का डेमोज* भयानक अौर भयावह दीख रहा है ।
नपाल के कोशी प्रदेश के सुनसरी जिले का दक्षिणी बेल्ट डेमोग्राफी परिवर्तन का गम्भीरआतंकी शिकार हुआ है । सावन महीने की १० गते रविवार के दिन सुनसरी के देवानगंज/कप्तानगंज क्षेत्र में बोलबम के भक्तजन धार्मिक यात्रा निकाल रहे थे। अचानक मदरसा से कुछ मुसलमान हथियारों के साथ बाहर निकले और भक्तों के साथ विवाद करने लगे। स्थानीय लोगों के अनुसार, सब कुछ पहले से नियोजित प्रतीत हो रहा था; उसी समय बिजली काट दी गई और गोलियां चलने लगीं।
पुलिस का रवैया अपराधियों के पक्ष में दिख रहा था। लगभग एक घंटे तक जिहादी अपराधियों ने पुलिस की आड़ में लोगों को मारा और घायल किया। जब ग्रामीण हिंदू एकजुट हुए, तब बिजली वापस आई और पुलिस की मदद से वे अपराधी भाग निकले या भगा दिए गए । अस्पताल ले जाते समय ‘ओमप्रकाश मेहता’ नामक एक युवा बोलबम भक्त ने दम तोड़ दिया, जबकि अन्य गंभीर रूप से घायल भक्त जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं।
परिणाम बेहद भयावह रहे। कर्फ्यू लगा दिया गया और जनजीवन अशांत हो गया। सरकार पूरी तरह लाचार और बेबस नज़र आई । यह समझ पाना भी कठिन हो गया कि यह सब नियोजित था या प्रायोजित ? सर्वदलीय बैठक तो बुलाई गई, लेकिन वह यह तक तय नहीं कर सकी कि सुनसरी में कौन सी घटना हुई थी और सामाजिक सद्भाव का दायरा क्या है। स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण है और सतह के नीचे राख में दबी आग की तरह सुलग रही है। तराई के जिले मे आग दहक रही है । नरभक्षी सरकार निंद मे है ।मानव अौर मानवीय अधिकार गंभीर संकट मे ।
स्थानीय लोगों का मानना है कि इस अंधी, बहरी और दमनकारी सरकार की पुलिस की गोलियों से अब तक तीन लोगों की जान जा चुकी है । सुनसरी देवानगंज के *ओमप्रकाश मेहता, जयप्रकाश मेहता और सिरहा ओरही के गणेश यादव एवं धनुषा सबैला का *बन्टु/पल्टु राउत* है । इसके अलावा दर्जनों लोग गोली लगने से घायल हैं। मारे गए और घायल हुए सभी लोग हिंदू समुदाय से ही हैं। अभी तक गोली से मरनेवाला चार हिन्दु ही है जिसमे –
२०८३ श्रावण १० मा मृत्यु भएका *ओमप्रकाश मेहता*, देवानगंज सुनसरी,बर्ष ३०
२०८३ श्रावण १४ मा मारिएका *गणेश यादव* तुलशीपुर,गोलबजार,सिराहा, बर्ष १५
०८३ श्रावण १४ मा मारिएका *जयप्रकाश मेहता* ,देवानगंज,सुनसरी बर्ष २५
२०८३ श्रावण १५ गते *बन्ठु/पल्टु राउत* सहायक पुजारी सबैला धनुषा,गर्दन रेट कर ,४० बर्ष
*मदरसाऐं: अपराधी/ आतंकी उत्पादन केंद्र बन रहा* ?
कप्तानगंज, सहित का मधेश का जिले मे चार हजार से ज्यादा अबैध मदरसाऐं है । जहा गरिब मुसलमान बच्चे को जेहादी शिक्षा ही मौलवियो द्वारा दी जाती है । प्रायः ये मौलवीया अबैध आयातीत है । जहां श्रावण १० गते यह अकल्पनीय और आतंककारी घटना घटी, वहां के मदरसे में सभी शिक्षक/मौलवी और छात्र विदेशी हैं। इसकी आय-व्यय का लेखा-जोखा पूरी तरह अपारदर्शी है। इन्हीं विदेशियों द्वारा सुनसरी जिले के दक्षिणी क्षेत्र हरिनगरा-देवानगंज में ऐसी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा है।
स्मरण रहे, मुंबई बम धमाकों का कनेक्शन यहीं से जुड़ा पाया गया था, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने यहां एक मास्टरमाइंड को ढेर किया था। अौर एक भाग गया जो आतंकी का आका बना हुआ है । स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस क्षेत्र को “मिनी पाकिस्तान” भी कहा जाता है।
*गैर कानुनी एवं समाज विरोधी वीडियो* –
सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें नेपाल और विदेशों से कुछ अपराधियों ने इस “घटना को अंजाम देने और आगे भी लाखों रुपये खर्च करके ऐसी वारदातें कराने” की धमकियां दी हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ ऐसे लोग जो कल तक “हिंदुओं को मारो!” और “पहले मुसलमान बनो” जैसे नारे लगा रहे थे, वे आज सामाजिक सद्भाव की बातें कर रहे हैं। आपराधिक गतिविधियों के कारण पद पर रहते हुए भी पुलिस ने इन्हें पकड़ा था। आज इनके घड़ियाली आंसू देखकर आम जनता शर्मिंदा है।
अतीत में अवैध रूप से घुसाए गए रोहिंग्या मुसलमान, बांग्लादेशी और सोमालियाई नागरिकों के दुष्कर्मों के कारण उन पर कानूनी कार्रवाई होना तय है। उधर, जनकपुरधाम सहित मधेश के जिले में खाड़ी देशों से आए अवैध धन जिसको हजम कर के समाज को बिभाजन करने मे लगे रहे अौर हिंदू बालिका के अपहरण की घटनाऐं सामने आई रही है, रोहिंग्याओं को अवैध रूप से लाने वाले मुसलमान भी पकड़े गए हैं। ये सभी खबरें मीडिया में छाई हुई हैं। मुसलमान के जनप्रतिनिधि अौर सरकार क उच्चपदस्थ कि अवस्था वैसी ही है । चाहे शिक्षित हो वा अशिक्षित सबका रबैया एक जैसा ।अभी तक इन अपराधीयो को कानुन के कठघरामा मे नहि लाया गया है। ऐसे ऐसे लोगो के उपर कानुनी कार्वाही अत्यावश्यक है ये राय आम लोगो की है ।
*नेपाल पुलिस के IGP का बयान*
नेपाल पुलिस के IG (महानिरीक्षक ) ने कुछ सप्ताह पहले ही बयान दिया था कि नेपाल में रोहिंग्या, बांग्लादेशी और सोमालियाई अपराधी सक्रिय हैं, जिसने सुरक्षा संवेदनशीलता को बढ़ा दिया था। परंतु गृहमंत्री ने इस पर ध्यान नहीं दिया; प्रधानमंत्री के बारे में तो बात न करना ही बेहतर है। परिणाम स्वरूप धार्मिक दंगे भड़क उठे। ये अपराधी और आतंकवादी किसी भी स्थिति में नेपाली नागरिक नहीं हैं; इनके सभी दस्तावेज और प्रमाण पत्र फर्जी हैं। इन पर तुरंत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन…?
*अब क्या होगा ?*
वि.स.2062/063 के राजनीतिक परिवर्तन के बाद से देश लगातार ऐसी पीड़ा झेल रहा है। धार्मिक द्वंद्व चरम पर है। पुलिस-प्रशासन की मानसिकता डांवाडोल है और उनका मनोबल गिर चुका है। कुशासन, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था अपने उच्चतम स्तर पर हैं, जबकि दंडहीनता की पराकाष्ठा हो चुकी है।
जनता का मानना है कि यदि राजतंत्र के पक्ष और विपक्ष में जनमत संग्रह कराया जाए, तो 93.15% ॐकार सनातनी आबादी की जीत होगी। इसलिए, हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। लेकिन क्या गणतंत्र का जाप करने वालों को यह स्वीकार होगा? यह आम नागरिकों का बड़ा सवाल है।
*रक्तांजित मधेश भुमि*-
वर्ष 2082 (विक्रम संवत) के भाद्र 23 और 24 गते के GenZ आंदोलन में 77 छात्रों सहित कई लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। छात्रों की हत्या के बाद उनके खून से सने जूते सड़कों पर बिखर गए थे। उन लहूलुहान जूतों ने सत्ता से सवाल किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि केंद्रीय सत्ता में बैठी पुरातनपंथी सरकार गिर गई और पूरी तरह से सत्ता परिवर्तन हो गया।
अब 2083 साउन 10 गते को बोलबम कांवरियों पर बर्बरतापूर्वक अंधेरे में रक्षक कहलाने वालों ने गोलियां चलाईं, जिससे तीर्थयात्रियों की चप्पलें उनके ही खून से लाल हो गईं। क्या इन तीर्थयात्रियों के खून से सनी चप्पलों का परिणाम भी व्यवस्था परिवर्तन के रूप में सामने आएगा? यह प्रश्न आज चारों ओर गूंज रहा है।
*घटना का यथार्थ पहलुऐं*-
नेपाल के गृहमन्त्री ने प्रभावित जिले कि दौरा कि है । एवं प्रधानमन्त्री जी ने देशबासीयो के नाम संबोधन किए है । फिर भी –
1. *घटना की सत्यता और कानूनी निस्तारण*
*सर्वोच्च अदालत के न्यायमुर्ति के द्वारा निष्पक्ष न्यायिक जांच की आवश्यकता:*
किसी भी धार्मिक या सामुदायिक आड़ में होने वाली हिंसक घटनाएं, हत्याएं या गोलीबारी जैसे गंभीर अपराध मूलतः कानूनी अपराध (Criminal Offence) हैं। इसमें लिप्त दोषियों पर बिना किसी धार्मिक या राजनीतिक पक्षपात के कठोरतम कार्रवाई होनी ही चाहिए।
तथ्य-जांच (Fact-Checking): स्थानीय स्तर पर फैलने वाली सांप्रदायिक उत्तेजना वास्तविक पीड़ितों के न्याय पाने की प्रक्रिया को जटिल बना देती है। इसलिए, केवल स्थानीय प्रशासन, पुलिस जांच और आधिकारिक रिपोर्ट ही घटना के वास्तविक कारणों और क्षति की पुष्टि कर सकती हैं।
2. *राज्य का दायित्व*
विगत मे हुए काठमांडू और अभी मधेश के जिले की घटनाओं ने राज्य तंत्र की भूमिका पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
*नागरिक सुरक्षा में राज्य की विफलता:* चाहे काठमांडू की सड़कें हों या सुनसरी का सीमावर्ती क्षेत्र, अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करने वाले आम नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के मौलिक अधिकार (Right to Life and Security) की रक्षा करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है। परंतु, स्थानीय लोगों के शब्दों में कहें तो यहां “रक्षक ही भक्षक” बनता दिख रहा है।
भेदभावपूर्ण रवैया (Selective Attention): यदि सीमावर्ती या सुदूर क्षेत्रों में आम नागरिकों पर गोलियां चलाई जाती हैं, उनकी जान जाती है और वे अस्पताल के बिस्तरों पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे होते हैं—और फिर भी केंद्र (सिंहदरबार) तथा राष्ट्रीय मीडिया इसे उचित प्राथमिकता नहीं देते, तो इससे यही संदेश जाता है कि “चप्पल पहनने वाले श्रमजीवी/स्थानीय नागरिक के खून की कीमत सस्ती समझी गई है।” ऐसा लगता है कि काठमांडू और राजनीतिक दलों का चश्मा ही दोषपूर्ण है।
3. *सांप्रदायिक सद्भाव और दीर्घकालिक जोखिम*
*शांति-सुरक्षा में व्यवधान:* मधेस के क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व के लिए जाने जाते रहे हैं। परंतु, ऐसी हिंसक घटनाएं सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ती हैं और आम नागरिकों को भय एवं आतंक के साए में जीने पर मजबूर करती हैं।
राज्य की सुस्ती और अविश्वास: जब राज्य घटना की तत्काल निष्पक्ष न्यायिक जांच कराकर दोषियों को सजा नहीं देता, तब नागरिकों का राज्य की संस्थाओं और संपूर्ण व्यवस्था पर से विश्वास उठने लगता है—और वर्तमान में यह अविश्वास पैदा हो चुका है।
*निष्कर्ष*
अभी काठमान्डु सहित के मधेश के जिले मे शान्ति सदभाव -र्याली का आयोजना किए जा रहे है । देखने अौर सुनने मे कर्णप्रिय है । मगर जबतक मस्जिदौ को हथियारमुक्त अौर मदरसौ को आतंकी मुक्त नहि कराया जाएगा तबतक मुलुक मे स्थायी शान्ति नहि हो ये सामाजिकराजनीतिक पंडितो कहना है । व्यक्ति चाहे किसी भी आस्था या समुदाय का हो, निर्दोष नागरिकों की जान जाना और राज्य द्वारा गोलियां चलाया जाना शांति-सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। मधेश के जिलो में घटी इस घटना को, जिसमें चार युवकौ की जान गई और अन्य बहुत लोग घायल हुए,राज्य केवल एक मामूली सांप्रदायिक या स्थानीय झड़प मानकर टाल नहीं सकता।
अपराधीयो पर तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाई करना, घायलों का समुचित इलाज कराना और न्याय सुनिश्चित करना ही सरकार का पहला कर्तव्य है। साथ ही, किस जिले के किस मस्जिद या मदरसे में कितने रोहिंग्या, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, सोमालियाई या भारतीय नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं और उन्हें कौन शरण दे रहा है,इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड है या नहीं? यदि है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
नेपाल सरकार से जनता सार्वजनिक अपिल करती है कि पारदर्शी कदमों से ही देश और जनता का विश्वास जीता जा सकता है। सरकार को जल्द से जल्द सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन कर निष्पक्ष और सत्य जांच प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ये जन जन कि आवाज है जो २०६३/०६४ के वाद हुए दंगे के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन,विश्लेषण अौर निरुपण करेगी ।

विश्लेषक
vijay.dutta2011@gmail.com

