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टुटेश्वरनाथ महादेव

मूल आलेख: राजकरण महतो (अन्नपूर्ण पोस्ट्)
स्थान: बर्दिबास नगरपालिका–५, महोत्तरी जिला, मधेस प्रदेश (नेपाल)
मुख्य केंद्र: स्वयंभू ज्योतिर्लिंग टुटेश्वरनाथ, चुरे पर्वत श्रृंखला, माण्डवी (रातु) नदी
परिचय एवं पृष्ठभूमि
नेपाल के मधेस प्रदेश अंतर्गत महोत्तरी जिले के बर्दिबास-५ में स्थित टुटेश्वरनाथ महादेव धाम को श्रद्धालु अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ ‘मधेस का कैलाश’ मानते हैं। चुरे पर्वत श्रृंखला की हरियाली और पवित्र माण्डवी (रातु) नदी के तट पर बसा यह धाम धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक रहस्य, पुरातात्विक संभावनाओं और प्राकृतिक जैव-विविधता का एक अद्भुत केंद्र है।
सावन के महीने में ‘बोलबम’ के जयकारों के साथ लाखों कांवरिया और तीर्थयात्री यहाँ जलाभिषेक के लिए उमड़ते हैं।
1. ‘टुटेश्वरनाथ’ नामकरण की गाथा एवं ऐतिहासिक जनश्रुति
‘टुटेश्वरनाथ’ (अर्थात् टूटा हुआ ईश्वर/महादेव) नाम के पीछे दो प्रमुख मान्यताएं प्रचलित हैं:
(क) अलौकिक शिला (ढुंगा का कान) की कथा
स्थानीय जनविश्वास के अनुसार, मन्दिर स्थल के समीप एक खंडित पत्थर का टुकड़ा (कान के आकार का) मिला था। जब उसे लाकर शिवलिंग के समीप स्थित नंदी (बसाहा) की प्रतिमा से जोड़ा गया, तो वह बिल्कुल सटीक बैठ गया। इसी ‘टूटे हुए देव’ के अद्भुत योग से इस धाम का नाम टुटेश्वरनाथ पड़ा।
(ख) सन् १७६८ का कैप्टन किनलोक अभियान
इतिहास के पन्नों के अनुसार, २६ अगस्त १७६८ को कैप्टन किनलोक के नेतृत्व में लगभग २,४०० ब्रिटिश सैनिक पटना से नेपाल पर चढ़ाई के लिए आए थे। रातु नदी में आई अचानक बाढ़ में ब्रिटिश सेना के हथियार और सामग्री बह गई। जनश्रुति है कि अंग्रेज सैनिकों ने टुटेश्वर क्षेत्र से नंदी की पत्थर की मूर्ति उखाड़ने/उठाने का प्रयास किया, जिससे वह क्षतिग्रस्त हो गई। अनुमान लगाया जाता है कि इस घटना (लगभग २५० वर्ष पूर्व) के बाद से इस स्थान को टुटेश्वर कहा जाने लगा।
2. धार्मिक आस्था एवं अनूठी परंपराएं
* खुले आकाश के नीचे निडर विश्राम: टुटेश्वरनाथ धाम पहुँचने वाले श्रद्धालु—चाहे धनी हों या निर्धन—घने जंगलों के बीच खुले आसमान के नीचे जमीन पर रात बिताते हैं। घने जंगल के बावजूद किसी को कोई भय नहीं होता; मान्यता है कि स्वयं कैलाशपति टुटेश्वरनाथ भक्तों की रक्षा करते हैं।
* सावन का ‘बोलबम’ और उल्टी साइकिल यात्रा: श्रावणी मेले के दौरान रातु नदी से जल भरकर नंगे पांव टुटेश्वरनाथ पहुँचने का ताँता लगा रहता है। कुछ श्रद्धालु विशेष संकल्प के तहत रातु नदी से कलश लेकर उल्टो (रिवर्स) साइकिल चलाकर मन्दिर पहुँचते हैं।
* त्रेतायुग का संबंध: माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान श्री राम की बारात (जन्ती) ने रातु नदी के तट पर विश्राम और स्नान किया था। इसी कारण रातु नदी का जल अत्यंत पवित्र माना जाता है।
3. पुरातात्विक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
टुटेश्वरनाथ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की प्राचीन मानव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक द्वार भी है:
* दक्षिण एशिया का महत्वपूर्ण पुरातात्विक क्षेत्र: नेपाल पुरातत्व विभाग के आमंत्रण पर अध्ययन करने आए भारतीय पुरातत्वविद मंजीत हजारिया के अनुसार, टुटेश्वरनाथ और रातु नदी घाटी में यदि विस्तृत वैज्ञानिक उत्खनन किया जाए, तो दक्षिण एशिया की प्राचीन मानव सभ्यता और नेपाल के प्रागैतिहासिक इतिहास का एक नया अध्याय खुल सकता है।
* मध्य पाषाण युग (Mesolithic Era): प्रसिद्ध जर्मन पुरातत्वविद गुड्रन कार्विंस के शोध से पता चलता है कि रातु नदी के किनारों पर मध्य पाषाण कालीन मानव बस्तियों के अवशेष रहे हैं।
* गौरीडांडा और सर्प संरक्षण (जैव-विविधता): चुरे क्षेत्र का ‘गौरीडांडा’ महादेव के आभूषण सर्पों का प्राकृतिक वासस्थल माना जाता है। जर्मन, फ्रांसीसी और नेपाली वैज्ञानिकों (डॉ. सोमनाथ सापकोटा, डॉ. अनिल पोखरेल आदि) ने यहाँ की अनूठी भूगर्भीय बनावट और पर्यावरण पर शोध किया है।
4. प्राचीन महाभारतकालीन कुआँ (इनार) की खोज
हाल ही में मन्दिर परिसर में एक अति-प्राचीन जीर्ण कुआँ (इनार) मिला है, जो इस धाम की प्राचीनता का जीवित प्रमाण है:
* मन्दिर के संरक्षक और ७६ वर्षीय पूर्व प्रधानाध्यापक वासुदेव महतो के अनुसार, २०२५ वि.सं. से पहले यह कुआँ लकड़ी के घेरे (काठ का इनार) में था। २०३३ वि.सं. में इसे ईंटों से पुनर्निर्मित किया गया।
* चुरे की तलहटी में जब जल का भारी संकट था, तब मात्र १२ हाथ की गहराई पर मिले इस निर्मल जल ने पूरे गाँव और कांवरियों (दंडी बम) को जीवन व पवित्रता प्रदान की।
5. भावी योजना एवं निष्कर्ष
युवा सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार राजकरण महतो की खोजपरक रिपोर्ट और बर्दिबास नगरपालिका के प्रमुख प्रह्लाद कुमार क्षेत्री के पहल पर, टुटेश्वरनाथ को विधिवत ‘मधेस के कैलाश’ के रूप में प्रांतीय और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन स्थल बनाने का निर्णय लिया गया है।
टुटेश्वरनाथ धाम इतिहास, प्रकृति, धर्म और पुरातात्विक रहस्यों का एक अनमोल संगम है, जो मधेस की सांस्कृतिक चेतना को पुनः उजागर कर रहा है।

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