‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान’२०२५ से सम्मानित हुए कुणाल
कंचना झा, काठमांडू, सावन २९ । रंगमंच के वरिष्ठ और दिग्गज कलाकार कुणाल को ‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान’२०२५ से सम्मानित किया गया । यह पुरस्कार उन्हें राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मूर्मू के हाथों प्राप्त हुआ है ।
रंगमंच के लिए कुणाल एक ऐसा नाम नाम जिन्हें किसी पहचान की आवश्यकता नहीं हैं । चिर परिचित इस व्यक्तित्व ने अपना पूरा जीवन रंगमंच, विद्यार्थियों, समाज और मिथिला–मैथिली की संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समर्पित कर दिया । ‘संगीत नाटक अकादमी सम्मान’ की घोषणा के बाद उनके शुभचिंतकोंं ने कहा कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था ।
इस संदर्भ में जब उनसे बातचीत हुई, तो उन्होंने अत्यन्त विनम्रता से जवाब दिया कि ‘ मेरे लिए यह बहुत सौभाग्य की बात कि मेरे चाहने वाले ऐसा महसूस करते हैं । यह इस बात का प्रमाण है कि वे मुझसे बहुत प्रेम करते हैं । लेकिन अब इन सब बातों का क्या अर्थ है ? अब यह देर से मिला या पहले मिल जाना चाहिए था, मेरे लिए विशेष मायने नहीं रखती । ये तो सामाजिक कार्य है । हां यदि मैं इसके लिए कोई प्रयास करता, लॉबिंग करता, जल्दी ही ले लेता । लेकिन मेरी प्रवृति कभी इस तरह की रही नहीं । जब यह घोषणा हुई कि पुरस्कार के लिए मेरा नाम है तो मैं स्वयंं भी आश्चर्यचकित रह गया कि आखिर मुझे कैसे मिल गया ? लेकिन हाँ जिस तरह का मान, सम्मान मुझे अपने समाज से मिला है उस आधार पर कह रहा हूँ कि मुझे देर से मिला या जल्दी मिलना चाहिए था ये लोगों का स्नेह है । धन्यवाद अर्पित उन सभी व्यक्तित्वों का जिन्होंने मेरा नाम आगे बढ़ाया । मुझे राष्ट्रीय सम्मान मिला, मैं उन सभी के प्रति आभारी हूँ ।
अपनी रंगमंचीय यात्रा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि – “शुरुआती दौर की अगर बात करुँ तो सन १९७४–७५ की ये बात है जब मैं कलकत्ता में था । शुरुआत कलकत्ते से ही हुई । वैसे रंगमंच का यह कीड़ा १९७० से ही लग गया था जब मिथिला संघ के आयोजन में मैं कलकत्ता पहुँचा था । वहाँ मैंने कुछ बांग्ला नाटक देखे, जिसने मुझे बहुत गहराई से प्रभावित किया । सच कहूँ तो मैंने वहीं फैसला कर लिया था कि इसी क्षेत्र में मुझे आगे बढ़ना है ।” आगे उन्होंने बताया कि – “आगे चलकर मैंने ल्क्म् में अप्लाई किया लेकिन चयनित नहीं हो पाया । लेकिन यह असफलता मेरे संकल्प को कमजोर नहीं कर सकी।”
कुणाल केवल मैथिली रंगमंच के वरिष्ठ कलाकार ही नहीं, वरन एक कुशल नाट्य निर्देशक, अभिनेता एवं लेखक तथा ‘भंगिमा’ संस्था के संस्थापक सदस्य भी हैं । कुणाल ने लंबे समय से अभिनय, लेखन और निर्देशन के माध्यम से मैथिली नाट्यकला को समृद्ध करने और उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । उनके निर्देशन में ‘रुक्मिणी हरण’, ‘पारिजात हरण’ और ‘टटकाल दर्शन’ जैसी चर्चित नाट्य प्रस्तुतियों ने दर्शकों के बीच अपनी गहरी छाप छोड़ी है ।
मूल रूप से मधुबनी जिले के पालिमोहन, खजौली निवासी कुणा ने अपनी रंगयात्रा के माध्यम से मैथिली रंगमंच को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है । एक अरसे से वे नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षित करने का काम कर रहे हैं ।
संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान के लिए उनके चयन से मैथिली रंगमंच की गरीमा बढ़ी है । उनकी इस उपलब्धि पर विश्व भर के रंगकर्मियों, साहित्यकारों और मैथिली समाज के लोगों ने उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दी हैं ।

