अंतिम स्वतंत्रता: सांस्कृतिक सार्वभौमिकता और साझी सभ्यता का पुनर्जागरण : संतोष मेहता
संतोष मेहता, काठमांडू, १४ अगस्त। पंद्रह अगस्त का स्वर्णिम प्रभात जब भारत के विशाल भूभाग और आकाश को आलोकित करता है, तो इसकी रश्मियां केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। हिमालय की उपत्यकाओं में बसे नेपाल से लेकर साझी दक्षिण एशियाई सभ्यता के तमाम देशों तक इस दिवस का स्पंदन प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जाता है। सन् १९४७ में जब औपनिवेशिक दासता की बेड़ियां टूटी थीं, तब समूचे विश्व ने एक क्षत-विक्षत, निर्धन और विभाजित राष्ट्र का अभ्युदय देखा था। आज भारत जब अपने स्वाधीनता संघर्ष और संप्रभु अस्तित्व के आठ दशकों (८०वें स्वतंत्रता दिवस) की ऐतिहासिक दहलीज पर खड़ा है, तो यह केवल एक देश का राजकीय समारोह नहीं, बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सनातन सभ्यतागत चेतना के पुनरुत्थान का स्मरण बन जाता है।
एक नेपाली लेखक और इस साझी विरासत के सह-यात्री के रूप में जब हम इस यात्रा को देखते हैं, तो पाते हैं कि नेपाल यद्यपि कभी प्रत्यक्ष रूप से किसी विदेशी साम्राज्य का राजनीतिक गुलाम नहीं रहा, तथापि औपनिवेशिक प्रभाव के सांस्कृतिक और बौद्धिक थपेड़ों से वह भी अछूता नहीं रह सका। आठ दशकों की सुदीर्घ यात्रा में भारत ने खाद्यान्न संकट (पीएल-४८०) से लेकर डिजिटल क्रांति, चंद्रयान-आदित्य अभियानों और विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी स्थान तक का असाधारण सफर तय किया है। किंतु इस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े होकर जब संपूर्ण दक्षिण एशिया आत्मनिरीक्षण करता है, तो एक गंभीर दार्शनिक प्रश्न हमारी साझी चेतना को झकझोरता है— क्या केवल विदेशी सत्ता का निष्कासन या राजनीतिक सीमाओं का सीमांकन ही स्वाधीनता की पूर्ण परिभाषा है ? क्या राजनीतिक संप्रभुता के आठ दशक बीत जाने के उपरांत भी भारत, नेपाल और पड़ोसी देश मानसिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पूर्ण स्वतंत्र हो पाए हैं ?
अदृश्य बेड़ियां: दक्षिण एशिया में मानसिक उपनिवेशवाद का गहरा संकट
उपनिवेशवाद की सबसे घातक विजय यह नहीं थी कि उसने हमारी भौतिक सीमाओं और प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य जमाया, बल्कि यह थी कि उसने विजित एवं प्रभावित समाजों के आत्मसम्मान और चिंतन की मौलिकता को पंगु बना दिया। अल्जीरियाई स्वतंत्रता सेनानी व प्रख्यात मनोचिकित्सक फ्रांत्ज़ फैनन ने अपनी कालजयी कृति ‘ब्लैक स्किन, व्हाइट मास्क्स’ में प्रतिपादित किया था कि औपनिवेशिक शासन का सबसे बड़ा अपराध मन को गुलाम बनाना था। जब उत्पीड़ित समाज स्वयं को औपनिवेशिक शासक की दृष्टि से देखने लगे और अपनी ही भाषा, इतिहास तथा संस्कृति को हीन मानने लगे, तब गुलामी शाश्वत रूप धारण कर लेती है।
भारत के इस ऐतिहासिक अवसर पर हमें यह स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा कि प्रत्यक्ष राजनीतिक उपनिवेशवाद भले ही समाप्त हो चुका हो, किंतु ज्ञान, भाषा, शिक्षा और सौंदर्यशास्त्र के धरातल पर औपनिवेशिक प्रभाव भारत, नेपाल और पूरे पड़ोसी क्षेत्र में आज भी अत्यंत सूक्ष्मता से विद्यमान है:
(क) भाषाई हीनताबोध और औपनिवेशिक दासता: आज भी हमारे समाजों (चाहे वह भारत हो या नेपाल) में यह धारणा गहराई से स्थापित है कि बुद्धिमत्ता, आधुनिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा का एकमात्र पैमाना अंग्रेजी भाषा है। जब काठमांडू या दिल्ली का कोई युवा अपनी मातृभाषा (नेपाली, हिंदी, मैथिली, भोजपुरी, नेवारी आदि) बोलने में लज्जा का अनुभव करता है, तो यह स्पष्ट होता है कि हमारी चेतना औपनिवेशिक गिरफ्त में है। केन्याई लेखक न्गुगी वा थियोंगो के शब्दों में—”भाषा छीनना केवल शब्दों को छीनना नहीं, बल्कि उस समाज की पूरी विश्वदृष्टि, स्मृति और आत्म-सम्मान को छीन लेना है।”
(ख) ज्ञानमीमांसात्मक पराधीनता (Epistemic Dependency): हमारे अकादमिक और बौद्धिक जगत में आज भी पश्चिमी सिद्धांतों को सार्वभौमिक सत्य (Universal Truth) और हमारी दार्शनिक व वैज्ञानिक परंपराओं को केवल “स्थानीय आस्था” या “पौराणिक कथाएं” मानकर हाशिए पर धकेलने की प्रवृत्ति बनी हुई है। विश्वविद्यालयों के दर्शनशास्त्र में सुकरात, कांट और हीगल अनिवार्य हैं, किंतु नागार्जुन (जिन्होंने नेपाल की पावन भूमि और लद्दाख/भारत के क्षेत्रों में शून्यवाद का दर्शन दिया), कणाद, चरक, आर्यभट, भरतमुनि और शंकराचार्य केवल कुछ पृष्ठों में सिमट कर रह जाते हैं।
(ग) सौंदर्य और जीवनशैली के विकृत मानक: गोरेपन को सुंदरता का पर्याय मानना, पारंपरिक खान-पान, परिधानों और सामाजिक उत्सवों को “अनाधुनिक” समझना और पश्चिमी जीवनशैली के अंधानुकरण को प्रगतिशीलता की कसौटी मानना उसी सांस्कृतिक हीनता-ग्रंथि के जीवंत लक्षण हैं।
नेपाल और पड़ोसियों के लिए भारत की स्वतंत्रता की प्रासंगिकता
नेपाल और भारत के बीच केवल राजनीतिक या कूटनीतिक संबंध नहीं हैं; यह संबंध ‘रोटी-बेटी’ और ‘वेद-बुद्ध’ की साझी जीवन-धारा का है। जनकपुर की सीता, लुम्बिनी के बुद्ध, पशुपतिनाथ का शिवालय और काशी-केदारनाथ का ज्ञान-क्षेत्र एक ही साझी सांस्कृतिक रीढ़ के विभिन्न मनके हैं।
राजनीतिक चेतना का संचार: सन् १९४७ में भारत की स्वाधीनता ने पूरे दक्षिण एशिया में स्वतंत्रता की लहर पैदा की थी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर ही नेपाल में प्रजातांत्रिक आंदोलनों का सूत्रपात हुआ और निरंकुश राणा शासन का अंत संभव हो सका।
सांस्कृतिक सुरक्षा कल्प: एक वृहद सभ्यतागत केंद्र के रूप में यदि भारत पश्चिमी सांस्कृतिक आक्रमण के सामने आत्मसमर्पण कर देता है, तो नेपाल, भूटान या श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश अकेले अपनी सांस्कृतिक पहचान नहीं बचा सकते। इसलिए भारत का सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर और सशक्त होना संपूर्ण क्षेत्र के लिए एक सुरक्षा कवच के समान है।
सभ्यतागत आत्मविश्वास: जब भारत अपनी जड़ों की ओर लौटता है और अपनी पारंपरिक पहचान पर गर्व करता है, तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव नेपाल और अन्य पड़ोसियों पर पड़ता है। इससे पूरे क्षेत्र को अपनी भाषा, परंपरा और ज्ञान-पद्धतियों पर गौरव करने का बल मिलता है।
दक्षिण एशिया विशेषकर भारत, नेपाल, भूटान और आसपास के क्षेत्र केवल देशों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक ‘सभ्यतागत राज्य’ (Civilizational State) है। हिमालय केवल पत्थरों की श्रृंखला नहीं, बल्कि हमारी साझी जीवन-धारा है। काठमांडू की बागमती से लेकर भारत की गंगा और सिंधु तक, नदियों को केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि ‘माता’ माना गया है। प्रकृति-पूजक यह संस्कृति आज के वैश्विक जलवायु संकट का सबसे प्रामाणिक समाधान प्रस्तुत करती है।
नेपाल में जन्में गौतम बुद्ध की शिक्षाएं भारत के सारनाथ और बोधगया में वटवृक्ष बनीं। भारत के आदि शंकराचार्य का आध्यात्मिक संबंध पशुपतिनाथ की पावन पीठ से रहा। काठमांडू उपत्यका का बौद्ध-शैव समन्वय और मिथिला की कला-चेतना हमारी सीमाओं से परे की साझा धरोहर है। हमारी सभ्यता ने कभी एकाधिकारवाद (Monotheism or Universal Monoculture) को स्वीकार नहीं किया। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” (सत्य एक है, विद्वान इसे विविध रूपों में व्यक्त करते हैं) का दर्शन ही भारत और नेपाल का मूल स्वभाव है।
पश्चिमी ज्ञान-परंपरा बनाम दक्षिण एशियाई पारिस्थितिकीय एवं पारंपरिक ज्ञान
पश्चिमी ज्ञान परंपरा ने लंबे समय तक यह दावा किया कि प्रयोगशालाओं में जन्मी आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति ही ज्ञान का एकमात्र वैध स्रोत है। इस अहंकार ने विश्वभर के पारंपरिक पारिस्थितिकीय ज्ञान (Traditional Ecological Knowledge) को ‘अवैज्ञानिक’ कहकर उपेक्षित किया। किंतु इक्कीसवीं सदी के गंभीर जलवायु और स्वास्थ्य संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य का हमारा पारंपरिक दृष्टिकोण कितना वैज्ञानिक था:
पारंपरिक जल एवं पर्यावरण प्रबंधन: भारत और नेपाल की पारंपरिक जल संरक्षण पद्धतियां (जैसे नेपाल के ‘हिटी’ व ‘पोखरी’, काठमांडू उपत्यका की नेवार कला, मिथिला चित्रकला, और बौद्ध-शैव समन्वय और भारत के जोहड़, बावड़ी, आहर-पाइन) आज के भारी-भरकम बांधों और कंक्रीट के ढांचों से कहीं अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल सिद्ध हो रही हैं।
आयुर्वेद, योग और जड़ी-बूटी ज्ञान: जिस योग, आयुर्वेद और हिमालयी चिकित्सा (सोवा-रिग्पा आदि) को उपहास का पात्र बनाया गया था, आज आधुनिक न्यूरोसाइंस और मेडिकल रिसर्च उनके चमत्कारी प्रभावों को प्रामाणिक मान रहे हैं। नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों की दिव्य औषधियां और भारत का आयुर्वेद शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।
जब हम ‘सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता’ (Cultural Self-Reliance) की बात करते हैं, तो कतिपय आलोचक इसे संकीर्ण राष्ट्रवाद या पुरातनपंथ की संज्ञा देने लगते हैं। किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का अर्थ विश्व से कट जाना या आधुनिकता का विरोध करना कतई नहीं है। इसका सीधा अर्थ है- अपनी ज्ञान-परंपरा, भाषा और संस्कृति पर इतना अडिग आत्मविश्वास होना कि हम विश्व की अन्य सभ्यताओं के साथ हीनता या श्रेष्ठता के भाव से परे, बराबरी और गरिमा के साथ संवाद कर सकें।
विउपनिवेशी चिंतक वाल्टर मिग्नोलो के अनुसार, पश्चिमी आधुनिकता ने यह भ्रम फैलाया कि आधुनिक होने का केवल एक ही मार्ग है – पश्चिमीकरण। जबकि विश्व इतिहास गवाह है कि ‘वैकल्पिक आधुनिकताएं’ संभव हैं: जापान इसका सबसे प्रखर उदाहरण है, जिसने अपनी भाषा, ज़ेन दर्शन और सांस्कृतिक जड़ों को अक्षुण्ण रखते हुए विश्व की अग्रणी तकनीकी शक्ति बनने का गौरव हासिल किया। दक्षिण कोरिया ने अपनी पारंपरिक कला, संगीत और जीवनशैली को आधुनिक पैकेजिंग देकर वैश्विक सांस्कृतिक पटल पर अमिट छाप छोड़ी। भारत और नेपाल के पास तो सहस्राब्दियों पुरानी ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का वह अक्षय भंडार है, जो संपूर्ण मानवता के संकटों का समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम है।
साझी विउपनिवेशी कार्ययोजना: त्रिसूत्रीय संकल्प
नेपाल, भारत और पड़ोसी देशों को औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्ण मुक्ति पाने के लिए भारत के ८०वें स्वतंत्रता दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर एक ठोस संयुक्त कार्ययोजना अपनानी होगी:
भाषाई स्वतंत्रता और मातृभाषा का गौरव: प्रत्येक नागरिक अपने दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता दे। बहुराष्ट्रीय ब्रांड्स के अंधानुकरण के स्थान पर स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और पारंपरिक हस्तशिल्प को संरक्षण देना ही सच्चा आर्थिक व सांस्कृतिक स्वावलंबन है।
अकादमिक एवं बौद्धिक पुनर्गठन: विश्वविद्यालयों में प्राथमिक से लेकर उच्च तकनीकी व शोध शिक्षा तक अपनी भाषाओं में पठन-पाठन का ढांचा बने। पाठ्यपुस्तकों में कम से कम ४०% स्थान प्राच्य दर्शन, धातु-विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र और स्थानीय जननायकों के इतिहास को मिले।
परंपरा का आधुनिकीकरण एवं नवाचार: अपनी परंपराओं को संग्रहालयों में बंद रखने के बजाय उन्हें डिजिटल मीडिया, सिनेमा, एनिमेटेड कंटेंट और गेमिंग से जोड़ना होगा। जब हमारी नई पीढ़ी ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘बुद्ध चरित’ या ‘नेपाल माहात्म्य’ की गाथाओं को आधुनिक तकनीक में देखेगी, तो उसका आत्मगौरव पुनर्जागृत होगा।
‘अंतिम स्वतंत्रता’ का पावन संकल्प
स्वतंत्रता का संग्राम कोई थमी हुई घटना नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली एक आध्यात्मिक, बौद्धिक और सामाजिक साधना है। पहली पीढ़ी ने राजनीतिक संप्रभुता का स्वप्न साकार किया, दूसरी पीढ़ी ने आर्थिक स्वावलंबन की नींव रखी। आज आठ दशकों के उपरांत संपूर्ण दक्षिण एशिया का ऐतिहासिक संकल्प होना चाहिए—“मानसिक मुक्ति और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता”।
जब भारत और नेपाल पश्चिमी चश्मे को उतारकर अपनी ही आंखों से विश्व को देखेंगे, अपनी ही भाषाओं में मौलिक विचार गढेंगे और अपनी समृद्ध ज्ञान-परंपरा के संबल पर विश्व कल्याण (‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ तथा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’) का मार्ग प्रशस्त करेंगे, तभी स्वाधीनता का यह महायज्ञ पूर्ण होगा। भौतिक दासता से मुक्ति पहला चरण थी, आर्थिक स्वावलंबन दूसरा चरण है; और मानसिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण ही वह ‘अंतिम स्वतंत्रता’ होगी जो हमारी साझी सभ्यता को विश्व के क्षितिज पर विश्व गुरु के पद पर पुनः प्रतिष्ठित करेगी।


