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नवविवाहिता मिथिलानी आज कर रही हैं मधुश्रावणी पर्व का समापन

 

काठमांडू।

मिथिलांचल क्षेत्र की नवविवाहिता मिथिलानी आज मधुश्रावणी पर्व का समापन कर रही हैं। मिथिलांचल में मौनापंचमी के नाम से प्रसिद्ध सावन कृष्ण पंचमी के दिन शुरू हुआ यह पर्व आज 13वें दिन संपन्न हो रहा है। मैथिल परंपरा के अनुसार सावन कृष्ण पंचमी से शुरू होने वाला यह पर्व सावन शुक्ल तृतीया के दिन समाप्त होता है।

पति-पत्नी के बीच गहरे प्रेम और मधुर संबंध की कामना के साथ नवविवाहित महिलाएं विवाह के वर्ष यह पर्व मनाती हैं। पति द्वारा भेजी गई पूजा-सामग्री (सरदाम) से यह पर्व मायके में मनाया जाता है। इसमें पर्व के दौरान उपयोग होने वाली खाद्य सामग्री, नए वस्त्र और आभूषण आदि शामिल होते हैं।

मिथिला में नवविवाहिता वधू सावन कृष्ण पंचमी से सावन शुक्ल द्वितीया तक व्रत के नियमों का पालन करती हैं। 12वें दिन की रात ‘टे‍मी’ की रस्म निभाई जाती है। इसमें कपास से बनाई गई बत्ती जलाकर उसकी लौ से घुटने को हल्का दागने की परंपरा है। इसके बाद अगले दिन तृतीया को पर्व का समापन किया जाता है। इसी परंपरा के अनुसार शुक्रवार रात व्रतियों ने ‘टे‍मी’ की रस्म पूरी की।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से नई पीढ़ी की मिथिलानी जलती हुई बत्ती की लौ से घुटने को दागने के बजाय ठंडे चंदन का लेप लगाने लगी हैं। नई पीढ़ी की महिलाओं का कहना है कि घुटने को दागने और पति-पत्नी के गहरे प्रेम के बीच कोई वास्तविक संबंध नहीं है। इसलिए पर्व की परंपरा और महत्ता को बनाए रखते हुए ‘टे‍मी’ की रस्म में चंदन का लेप करने की परंपरा अपनाई जा रही है। शिक्षण पेशे से जुड़ी गौशाला-12 की सुनिता महतो इसे ‘टे‍मी’ की परंपरा का परिष्कृत रूप और उचित बदलाव मानती हैं। परंपरागत रूप से ‘टे‍मी’ की रस्म परिवार की सबसे वरिष्ठ महिला के हाथों कराई जाती है।

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शिव, पार्वती और नाग देवता की पूजा

मधुश्रावणी पर्व के दौरान भगवान शिव, देवी गौरी (पार्वती) और विषहरा (नाग देवता) की आराधना की जाती है। इस अवसर पर गांव और बस्ती की नवविवाहित महिलाएं एकत्र होकर हंसी-मजाक, सामूहिक गायन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होती हैं।

पर्व में व्रती और उनकी सखियों की सजधज, सामूहिक प्रणय गीत और ‘फूललोढ़ी’ विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं। ‘फूललोढ़ी’ का अर्थ फूलों की खोज करना है। अगले दिन की पूजा के लिए एक दिन पहले शाम को सामूहिक रूप से फूल और बेलपत्र एकत्र करने के लिए निकलने की परंपरा को ‘फूललोढ़ी’ कहा जाता है।

मधुश्रावणी में भगवान शिव और देवी गौरी को बासी फूल चढ़ाने की परंपरा है। पर्व समाप्त होने के बाद व्रती पूरे पर्व के दौरान प्रतिदिन पूजा में इस्तेमाल किए गए बेलपत्र और फूलों को एकत्र कर किसी पवित्र नदी या तालाब में विसर्जित करती हैं। वर्षा ऋतु को गहरे प्रणय संबंधों के लिए अनुकूल मौसम माना जाता है। इसी मौसम में मोर जैसे पक्षी भी प्रणय में लीन होते हैं। ऐसे समय में नवविवाहित दंपती को शारीरिक आकर्षण के साथ भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब लाना भी इस पर्व का महत्वपूर्ण पक्ष माना जाता है।

अब सभी समुदायों का साझा पर्व

पहले मधुश्रावणी पर्व मुख्य रूप से ब्राह्मण, कायस्थ, देव और सोनार जाति की महिलाएं ही मनाती थीं। लेकिन अब यह एक साझा पर्व बन गया है। अलग-अलग भाषा, संस्कृति और परंपराओं वाले समुदायों के साथ रहने से एक-दूसरे के त्योहारों को अपनाने की परंपरा बढ़ी है। इसी कारण पिछले कुछ वर्षों में मधुश्रावणी मिथिला का साझा पर्व बनता जा रहा है।

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जलेश्वर-5 चौरिया की माध्यमिक विद्यालय की सामाजिक विषय की शिक्षिका नायडु तिवारी के अनुसार, विभिन्न समुदायों के बीच सांस्कृतिक मेलजोल बढ़ने से इस पर्व की स्वीकार्यता भी व्यापक हुई है।

पर्व में सुनाई जाती हैं पौराणिक कथाएं

शिव, पार्वती और विषहरा की प्रतिदिन पूजा-अर्चना के बाद घर की वरिष्ठ महिला व्रती महिलाओं को मधुश्रावणी की कथाएं सुनाती हैं। इनमें पौराणिक कथाओं पर आधारित मैना पंचमी, विषहरि, बिहुला, मनसा, मंगला गौरी, पृथ्वी का जन्म, समुद्र मंथन और सती की कथा प्रमुख हैं।

पर्व से जुड़ी एक लोककथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने शरीर से निकले वीर्य को एक पत्ते पर रखा था, जिससे पांच नाग कन्याओं का जन्म हुआ। शिव उन कन्याओं से मिलने जाते थे। इस बात से अनजान पार्वती को जब पति पर संदेह हुआ तो उन्होंने उनका पीछा किया। एक दिन शिव को उन कन्याओं के साथ खेलते देखकर पार्वती क्रोधित हो गईं। बाद में शिव ने उन्हें पूरी बात समझाई, जिसके बाद उनका क्रोध शांत हुआ। पार्वती को प्रसन्न करने के बाद शिव ने सावन महीने में इन नागिनियों की पूजा करने वालों को सर्प के भय से मुक्ति का वरदान दिया। लोकविश्वास है कि इसी प्रसंग से मधुश्रावणी पर्व में विषहरा की पूजा की परंपरा शुरू हुई।

मधुश्रावणी की पौराणिक मान्यता

प्राचीन वैदिक परंपरा से जुड़े शिव पुराण में मधुश्रावणी नाम की नवविवाहिता द्वारा अपने कुष्ठरोग से पीड़ित पति को स्वस्थ कराने के लिए शिव की आज्ञा से यह व्रत करने का प्रसंग बताया जाता है। व्रत के प्रभाव से पति के स्वस्थ होने के बाद पति के कल्याण और दांपत्य संबंधों की मजबूती की कामना से इस पर्व की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।

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व्रती महिलाएं सावन कृष्ण चतुर्थी के दिन पवित्र स्नान कर शुद्ध होकर व्रत का संकल्प लेती हैं। पूरे व्रत के दौरान मन को पवित्र रखते हुए सात्विक भोजन करने का विधान है।

प्रतिदिन दोपहर के बाद और सूर्यास्त से पहले व्रती अपनी सखियों के साथ हंसते-खिलखिलाते हुए तथा प्रणय गीत गाते हुए ‘फूललोढ़ी’ के लिए निकलती हैं। एकत्र किए गए बेलपत्र और विभिन्न प्रकार के फूलों को रातभर रखकर अगले दिन उन्हीं से शिव, पार्वती और विषहरा की पूजा की जाती है और फिर कथा सुनी जाती है।

पर्व में अटल सौभाग्य की देवी मानी जाने वाली गौरी की पूजा के लिए विशेष नैवेद्य तैयार करने की भी परंपरा है। मायके के आंगन या किसी सुरक्षित स्थान पर बनाए गए विशेष मंडप, जिसे ‘अरिपन’ कहा जाता है, में देवी-देवताओं की स्थापना कर व्रती महिलाएं पूजा करती हैं।

विवाह के बाद मायके आने पर सखियों से मिलना, पर्व के दौरान सामूहिक गीत गाना और हंसी-मजाक करना नवविवाहिताओं के लिए इस पर्व को विशेष बना देता है। यही वजह है कि मिथिला की नवविवाहिताएं पूरे वर्ष मधुश्रावणी पर्व का बेसब्री से इंतजार करती हैं।

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