*पहले जेल,वाद मे फेल* बालेन सरकार कि अराजक होती कार्यशैली ! : डा.विजय दत्त
डा.विजय दत्त, काठमांडू, 22 अगस्त। नेपाल मे सरकार परिवर्तन का रेकर्ड विश्वस्तर पर प्रथम रहा है 1990 से अभी तक के 35 बर्ष मे 30 से ज्यादा प्रधानमन्त्री हुए है अौर 1951 से अभीतक के 76 बर्ष मे 65 प्रधानमन्त्री ने पदभार ग्रहण किया फिर प् मे ग्रहण लगा । जनता कि अवस्था कमोबेश जैसा का तैसा । अभी नव युवा वाली सरकार मे थमती अर्थव्यवस्था, असुरक्षित बेटीया और सामाजिक सौहार्द पर संकट छा गया है ।
वर्तमान समय में नेपाल का समग्र राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक वातावरण एक अत्यंत संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ राज्य देश में विदेशी और घरेलू निवेश जुटाने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है वा आह्वान कर कर रहा है । वहीं दूसरी तरफ निजी क्षेत्र के उद्यमियों और व्यवसायियों को निष्पक्ष जांच के बिना ही हिरासत में लेने का सिलसिला जारी है। *पहिले थुन* (जेल),*अनि सुन* वाली निरंकुश राज्यव्यवस्था की यह कार्यशैली देश के विकास के लिए आत्मघाती साबित हो रही है।
हाल ही में गिरफ्तार किए गए 90 से अधिक उद्योगपतियों और व्यवसायियों को अदालत द्वारा रिहा या जमानत दिया जाना यह साबित करता है कि पुलिस-प्रशासन ने हड़बड़ी और दबाव में काम किया। इस तरह के अपरिपक्व रवैये से बाजार में भारी भय का माहौल बना है। परिणामस्वरूप पूँजी का पलायन, नए निवेश पर रोक, रोजगार के अवसरों में भारी गिरावट और बाजार में घोर मंदी जैसी गंभीर आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। यह समग्र अर्थव्यवस्था के आत्मघाती हो रही है ।
*पुलिस और प्रशासन दबाव में क्यों है ?*
नेपाल का पुलिस प्रशासन स्वयं वा बिधि प्रक्रिया से कार्य करने मे सक्षम नहि दिख रही है ।
जांच एजेंसियां और पुलिस स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय मुख्यतः दो कारणों से दबाव में दिखाई देती हैं:-
*राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रतिशोध:*
राजनीतिक पदाधिकारीयो को खुश करने या छवि चमकाने के नाम पर बिना ठोस सबूत के व्यवसायियों को गिरफ्तार करने और मीडिया बाजी करने का चलन बढ़ गया है।
*लोकप्रियतावाद (Populism) और सोशल मीडिया का दबाव:*
किसी भी मामले में पेशेवर जांच करने के बजाय, सोशल मीडिया की भीड़ को शांत करने और खुद को ‘कड़ा प्रशासक’ दिखाने की होड़ में राज्य के अंग जल्दबाजी में गलत कदम उठा लेते हैं।
*सामाजिक-धार्मिक तनाव और केंद्रीय सरकार की मूकदर्शक भूमिका*
आर्थिक सुस्ती के बीच सुनसरी, विराटनगर और देवानगंज जैसे क्षेत्रों में उत्पन्न धार्मिक और सामाजिक विवाद अत्यंत चिंताजनक हैं। स्थानीय स्तर पर धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं एवं वातावरणीय संरक्षण पर आधारित वर-पीपल लगाने पर रोक लगाना या दंगों से प्रभावित नागरिकों को अपनी दुकानें पुनः स्थापित करने से रोकना सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।
इन घटनाओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच कराने और सौहार्द स्थापित करने में केंद्र सरकार की निष्क्रियता ने पूरे मुल्क में एक घुटन (उकुसमुकुस) का माहौल बना दिया है। इसके साथ ही, संसद और सड़क पर जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों व सांसदों का गैर-जिम्मेदाराना और अराजक आचरण लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है।
वारा जिले मे एक तीन बर्षीय बालिका को यौनपिपासु राक्षसो ने बलत्कार कर मार डाला है । इससे देश मे अपराध कि अवस्था दिनप्रतिदिन भयावह होता दीख रहा है । नेट इन्टरनेट के उपर कोई नियन्त्रण नहि ।
*समाधान के उपाय*-
*अल्पकालिक उपाय* (Immediate Steps):
’पहले सुन, फिर कार्रवाई कर’ की नीति: वित्तीय व व्यावसायिक मामलों में जांच पूरी होने से पहले गिरफ्तारी की परिपाटी पर तुरंत रोक लगे। व्यावसायिक अपराधों में जमानत और आर्थिक दंड को प्राथमिकता दी जाए।
*न्यायिक जांच आयोग का गठन*:
देवानगंज, सुनसरी और विराटनगर की घटनाओं की निष्पक्ष जांच और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए तत्काल न्यायिक आयोग का गठन हो।
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*सुरक्षा का भरोसा*:
सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के अपने धार्मिक और व्यावसायिक अधिकारों का उपयोग करने की गारंटी दी जाए।
*मध्यकालिक उपाय*(Mid-term Steps):
प्रशासनिक स्वायत्तता: पुलिस और जांच एजेंसियों को राजनीतिक और सोशल मीडिया के दबाव से मुक्त कर पेशेवर और स्वायत्त बनाया जाए।
*सामुदायिक संवाद:*
स्थानीय स्तर पर सभी धार्मिक समुदायों के प्रबुद्ध जनों के बीच निरंतर संवाद स्थापित कर आपसी विश्वास बहाल किया जाए।
*निवेशक सुरक्षा कानून:*
निजी क्षेत्र के मनोबल को ऊँचा उठाने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी निवेश सुरक्षा नीतियों को लागू किया जाए।
*दीर्घकालिक उपाय* (Long-term Steps):
*कानून का शासन* (Rule of Law): संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की हर हाल में रक्षा की जाए।
*जिम्मेदार राजनीतिक संस्कृति*
राजनीतिक दलों और सांसदों को संसद तथा सड़क दोनों जगह मर्यादित और उत्तरदायी आचरण करने के लिए बाध्य किया जाए।
*उपसंहार*
लोकतंत्र और प्रगति की बुनियादी शर्त है-कानून का शासन, निवेश की सुरक्षा और आपसी सामाजिक सौहार्द। यदि सरकार व्यवसायियों को डराने-धमकाने का रवैया जारी रखती है और सामाजिक-धार्मिक संवेदनशीलता पर मूकदर्शक बनी रहती है, तो देश का गहरे आर्थिक संकट और सामाजिक बिखराव में जाना तय है। राज्य को तुरंत अपनी कार्यशैली बदलकर निवेशकों का विश्वास पुनः जीतना होगा और समाज में शांति-सौहार्द कायम करने के लिए कड़े व निष्पक्ष कदम उठाने होंगे।

विश्लेषक


