“आह नारी!” : सरोज दहिया
“आह नारी!”
सरोज दहिया, (कहानी), अगस्त, २०२६।
बात लगभग बीस साल पहले की हैं, मेरे स्टाफ में एक अध्यापिका के देवर का विवाह था, पांच दिन का अवकाश ले गयी, गांव में विवाह का काम होता भी ज्यादा है, शहर की तरह फार्म हाऊस जैसै समारोह स्थल न होकर सारी धमाचौकड़ी घर में ही होती है, वह स्टाफ को विवाह का कार्ड देकर अवकाश पर चली गयी :
प्रितिभोज पर स्टाफ के अध्यापक चले गये क्योंकि वह अध्यापिका दूसरे गांव की थी जहां स्कूल की अध्यापिकाओं ने जाने में आनाकानी की, छठे दिन वह अध्यापिका स्कूल में उपस्थित हो गयी , उसका सूखा और म्लान चेहरा किसी अनहोनी की गवाही दे रहा था ;
प्रार्थना सभा के बाद कक्षायें शुरु हो गयी, मुझे रह रह कर कुछ अखर रहा था, शायद उसका बुझा हुआ चेहरा ही बार बार याद आ रहा था और भीतर सब कुछ जान लेने की उत्सुकता ।
आधी छुट्टी में हम सभी इक्कट्ठे बैठकर चाय लेते थे, मैं कुछ पूछना चाहती थी उससे पहले दूसरी अध्यापिका ने ही पूछ लिया, ” शकुन्तला जी ! विवाह अच्छे से निपट गया ? देवरानी कैसी आई ?”
वह इतनी परेशान लग रही थी जैसे अभी रोई और जो उसने बताया वह था कि देवर ने घर में वह हंगामा खड़ा किया कि पूछो मत, सभी रिश्तेदार और परिजन बहुत परेशान है ।
ऐसा क्या हुआ ?
सुहागरात को एकदम अपने कमरे से बाहर निकल कर सोये हुये बहनोई को उठा कर कहा कि अभी सोनीपत चलना है इसे लेकर किसी लेडी डाक्टर के पास , यह लड़की है ही नहीं मुझे ऐसा लग रहा है , डाक्टरी रिपोर्ट लेकर तलाक दूंगा ।”
रात को ही बहनोई बहन और अपनी नयी दुल्हन को लेकर सोनीपत किसी लेडी डाक्टर के पास चला गया वहां से मैडिकल फिटनैस लेकर आया , संतोष न मां को न बेटे , घर में न जाने क्या मनहूसी सी छाई है, शकुन्तला मैडम ने यह सब बताकर कहा, आधी छुट्टी खतम सब अपनी अपनी कक्षा में ।
अब कुछ दिन बाद सुनने में आया कि वह शकुन्तला मैडम की देवरानी प्रैग्नैट हो गयी, हम सभी ने खुशी मनाई, अच्छा हुआ ।
कुछ महीने निकले, गेहूं की कटाई शुरु हो गयी, हरियाणा सरकार फसली अवकाश देती है अत: एक सप्ताह निजी स्कूल भी बंद रहते हैं, जब स्कूल खुले तो शकुन्तला मैडम ने बताया गेहूं की कटाई का काम पूरा होते ही देवरानी को देवर जबरन उसके मायके छोड़ आया, तब उसे सातवां महीना लग चुका था और विवाह को आठ महीने हो गये थे ।
कुछ महिला अध्यापिकायें शकुन्तला मैडम के देवर देवरानी के रिश्ते में ज्यादा दिलचस्पी ले रही थी, लगभग तीन महीने में ही पता चला, उसने बेटे को जन्म दिया है , कहां है ?
अपने घर ही है, फोन आया था उनका, न तो नरेश खुद गया न घर में किसी और ने वहां तक जाकर बच्चे को देखने की बात की ।
हमने नये घर का निर्माण कार्य शुरु करवा दिया, बेटा सोनीपत हास्टल में अभी प्लस वन विज्ञान का छात्र था, मैट्रिक तक हिंदी माध्यम से पढ़ने के कारण उसे अंग्रेजी मिडियम के पहले साल जरुरत से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी, मेरे पति राजस्थान गये थे उनकी अगले दिन शाम तक लौटने की सम्भावना थी ऐसे में छोटे से बच्चे को गोद में लेकर एक सूखी सी लम्बी सी लड़की ने स्कूल में प्रवेश किया और सीधी कार्यालय में आकर सिर झुका मुझे नमस्ते की क्योंकि दोनों हाथों से वह सर्दियों के मौसम में मोटे कम्बल में बच्चे को लपेटे हुये थी, मैने उसे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करके परिचय जानना चाहा तो उसने बताया कि वह शकुन्तला मैडम से मिलना चाहती है, मुझे उसकी दशा और गोद में नन्हा शिशु देखकर क्षणभर में पता चल गया कि वह कौन थी, शकुन्तला जी कक्षा में थीं, मैने उन्हें बाहर बुलाकर कार्यालय में भेज दिया और खुद उसके अधूरे अध्याय को पूरा कराने के लिये पढ़ाने लगी ।
अगली घंटी भी मुझे शकुन्तला मैडम की कोई और कक्षा सम्भालनी पड़ी वह कार्यालय में ही बनी रही थीं, उनका घरेलू मुद्दा उलझ गया था और जैसे ही छुट्टी की घंटी बजी, शकुन्तला जी एक पल गवाये बगैर स्कूल से निकल गयी , देवरानी को यह कहकर कि घर जाकर सास से बात करती हूं ।
तीन बजे छुट्टी हुई थी, चपरासी कमरे बंद कर चला गया, मैं भी उसे लेकर स्कूल के ऊपर बने अपने आवास में ले गयी, बच्चे को बिस्तर पर सुला कर उसने राहत की सांस ली थी , न जाने सुबह बच्चे को गोद में लेकर बसों और टैम्पों के धक्के खाती कितने घंटे में स्कूल तक पहुंची, मेरे गांव तक तो कोई टैम्पों रिक्शा का साधन भी नहीं है, हां उसकी ससुराल के गांव तक खूब हैं प्राईवेट जीप, टैम्पों आदि, आई तो वह अपनी ससुराल के अड्डे पर ही उतरी थी एक किलोमीटर रास्ता पैदल और शिशु के साथ, न जाने जेठानी से क्या उम्मीद थी उसे ।
चाय नाश्ता करवा दिया उसे और बातों बातों में उसकी तकलीफ उसकी मजबूरी भी समझ आ ही गयी ।
“सातवें महीने में मुझे मायके छोड़ आये दीदी !”
उसके अचानक दीदी सम्बोधन से मैं भीतर तक विचलित हो चुकी थी, वह रो रही थी, “मैनैं नरेश को न जाने कितनी चिट्ठियां भेज दी, कोई जबाब नहीं, मायके में बच्चा पैदा हुआ, यदि इनका यहीं हाल रहा तो भाभी- भाईयों का घर , कैसे पाल पाऊंगी इसे , वह रो रही थी ।”
सुनीता नाम था उसका, मैंने उसके सिर पर हाथ धर दिया, उसे सान्तवना देते हुये चुप कराया, अभी तक उसकी ससुराल से कोई नहीं आया, जनवरी का महीना था, सर्दी जोर पर थी, बच्चा जागकर कुलबुला रहा था, उसने उसे दूध पिलाना शुरु किया, करते करते साढ़े चार बज गये, मुझे डर लाज जो भी समझिये कुछ ऐसा था कि मैं नहीं चाहती थी वह रात को मेरे आवास पर रुके, पति घर में भले ही न थे, उसकी ससुराल वाले अपने गंदे विचारों के चलते कुछ भी बोल देगें हमारा भी साथ में अपमान होगा, अत: मैने कहा, ” सुन सुनीता ! मैं तुझे रातभर भी नहीं रख सकती अपने घर, चल, तुझे तेरी ससुराल छोड़ आऊं, यदि उन्हें आना होता तो अभी तक कोई न कोई आ ही जाता, जेठानी पल्ला छुड़ाकर भाग गयी ।”
वह चुपचाप मेरे साथ हो ली, एक किलोमीटर उसका गांव और गांव के परले सिरे पर घर, जब हम दोनों वहां पहुंची तो शकुन्तला घर नहीं थी , सास ने जैसे ही वह पैर छूने के लिये बढ़ी , चिल्लाकर कहा, “क्या लेने आई है तू यहां ? और यह कौन है तेरे साथ ?”
उसकी सास या यों कहो कि शकुन्तला की सास मुझे नहीं पहचानती थी, जैसे ही मैने अपना परिचय देने के लिये मुंह खोला उसके ससुर भी सीढिया चढ़कर वहीं आ गये मुझे एक आस बंधी, पुरुष की बात और ही होती है , मैं बोली, ” ताऊं! यह शकुन्तला से मिलने गयी थी स्कूल में, वह आपसे बात करने की कह कर घर आ गयी, रात घिरती आ रही है जब यहां से कोई नहीं पहुंचा तो इसे छोड़ने मैं स्वयं आई हूं , शकुन्तला जी कहां है, क्या उन्होंने आपको नहीं बताया ?” मैं बोलती चली गयी थी ।
“ना, म्हारे तै कोन्यां बताई ।”
सास ने कड़क आवाज में कहा ।
कोई बात नहीं, अब आपकी बहु और पोता आपके पास आ चुके, सम्भालिये इन्हें , मैनें जैसे ही कहा, सास बोली, “म्हांरा मतलब कोन्यां इनतै, तेरे गैल आई, तू हे लेज्यां ।”
उसकी बात सुनकर मैं सन्न रह गयी, यदि रात को अपने पास रखकर सुबह लेकर आती तो क्या कुछ सुनना पड़ सकता था वह अंदाज सहज में ही हो गया ।
मैनें कहा, “ताई ! यह मेरे पास नहीं शकुन्तला से मिलने आई थी, मैं तो इसे जानती तक नहीं थी, मैं आपकी बहु को अपने घर क्यों रखूंगी भला, यदि आपका कोई मतलब नहीं तो भी इंसानियत के नाते इसे रात अपने घर में काटने दो, सुबह निकाल देना, आपका मन गवाही देता हो तो ।
वह भड़क उठी, “चोक्खा नरेश कोन्यां घरां, ना तै इसकी चोटी पकड़ कै घुमा देत्ता ।”
ससुर जो अभी तक सब सुन रहे थे, मुझे सम्बोधित कर बोले, ” मास्टरणी ! तेरी गैल आई की ल्याज मैं राक्खूंगा, सारी रात जागूंगा, अर तड़कै छ: बजे अड्डे पै छोड आऊंगा।”
मैनैं राहत की सांस ली और
उन सब को राम राम कर अपने गांव की ओर हो ली, अंधेरा पूरी तरह घिर आया था, पंद्रह मिनट पैदल का रास्ता तेज कदमों ने बारह मिनट में पूरा किया, मैने अपने आवास पर आकर लाईट आन की , खाने का समय था लेकिन चाय और कुछ आराम की मांग शरीर कर रहा था जिसे मैं नजर अंदाज न कर सकी ।
चाय बना कर पी ली, कुछ देर आराम करने के बाद, दो रोटी बनाकर अचार और दूध से निगल ली, शकुन्तला की करतूत और उसकी देवरानी सुनीता का भोला और लाचार चेहरा आंखों के सामने से हट नहीं पा रहे थे , सोचते सोचते न जाने कब आंख लग गई, और जब सुबह आंख खुली तो अलार्म घड़ी पांच बजा रही थी, मैं ने चाय तैयार की, नित्यकर्म से निवृत्त होकर अंत: प्रेरणा के तहत मैं सुनीता की ससुराल के अड्डे की ओर चल दी, मेरे स्कूल से कुछ ही दूरी पर रास्ते में मेरे देवर का घर था, देवरानी भी मेरे स्कूल में अध्यापिका थी, उसे स्कूल की चाबी सौंपकर मैंने उसे आवश्यक निर्देश दिए और चल पड़ी, अभी खूब अंधेरा था और जनवरी की ठण्डी हाड़ कंपा देने वाली हवा लेकिन मुझे तो छः बजे तक सुनीता के गांव के अड्डे पर पहुंचने की शीघ्रता थी, अत: तेज कदमों से मैं छः बजे अड्डे से कुछ कदम की दूरी पर दो व्यक्ति कुछ दूरी लिए खड़े देख सकती थी, दुकानों पर लाईट जली थी, ज्यों ज्यों नजदीक गयी, सुनीता और उसके ससुर की साफ छवि दिखाई दी, ठीक छः बजे थे मुझे वहां देखकर ससुर ने कहा, “ले मास्टरणी, इसकी रात काट दी, इब तू जाणै अर या ।” ऐसे बोल दिया मानों उसे मैंने बुलाया था, अजीब सी बात थी, वह खुद आई थी जेठानी से ससुराल की टोह लेने अपना कष्ट बांटने एक आस के साथ कि वह पढ़ी लिखी है, घर की बड़ी बहु है, दो बच्चों की मां है, मुझे सहारा देगी लेकिन जेठानी तो बेदाग छूट गई और मैं फंस गयी या कुदरत मुझसे ही कुछ करवाना चाह रही थी ; खैर उसके ससुर उल्टे पैर घर की ओर हो लिए अपनी बहू को मेरी जिम्मेदारी जानकर, मैंने पूछा, “सुनीता ! कैसे जायेगी ?”
आ जायेगी दीदी कोई सवारी, नरेला तक, आगे देखा जायेगा, दुकानों की जलती बिजली में मुझे उसकी डबडबाई आंखें स्पष्ट दीख गई और मन कांप गया, कहीं इसने कुछ सोच लिया तो, दो जान जायेगी, बच्चा कम्बल में ऊं ऊं करने लगा, उधर से अड्डे पर चार छः सवारियों को लिए एक जीप आकर रुकी, सुनीता ने जीप में बैठने के लिए बच्चा मेरी गोद में थमाया और जब वह बैठ चुकी तो हाथ लपाकर उसे ले लिया, एक क्षण में मैं भी उसके पास जीप के भीतर थी, नरेला उतरने पर सुनीता ने किराया दिया मेरा भी और अपना भी, मैं तो खाली हाथ थी, नरेला में जीप स्टैंड से एकदम पास मेरे भाई का घर था, मैंने पूछा, “सुनीता चाय वाय ली या नहीं,” “नहीं दीदी, कल आपके पास ही ली थी , यहां किसी ने मुझे चाय या खाने के लिए नहीं कहा ।”
मैं उसे भाई के घर ले गयी, दिन खुल रहा था, सात के आसपास, वहां हमने चाय नाश्ता लिया, भाई ने हम दोनों को सौ सौ रुपए दिए, मुझे अपार खुशी थी कि अब आगे सुनीता को मेरा किराया नहीं देना पड़ेगा, हम दो बसें बदल कर समालखां पहुंचे, अब सुनीता के और अपने किराये लायक पैसे थे मेरे पास ।
समालखां पहुंच कर मैंने पूछा, ” क्या घर का कोई कांटैक्ट नम्बर है, हां के जबाव पर पास में एस टी डी से मैंने उनके गांव में पड़ोसी के घर फोन करके उसके भाई को बुलाया और उसे समालखा पहुंच कर सुनीता को ले जाने के लिए बोला, वह लगभग बीस मिनट में आया तब तक वह दो चार बार दोहरा चुकी थी, “दीदी मैंने आपको तंग कर दिया, मुझे मेरे हाल पर छोड़ देते, आपका अहसान नहीं उतार पाऊंगी ।”
मुझे भीतर भीतर संतोष की अनुभूति हो रही थी, अच्छा हुआ साथ थी वरना वह बच्चे को साथ लेकर ………
खैर भाई की मोटरसाईकिल पर उसे बिठाकर एक भारी बोझा सा सिर से उतर गया, मैने तुरंत सोनीपत की बस ली और जैसे तैसे करके ग्यारह बजे तक स्कूल लौटी, आधे घंटे बाद आधी छुट्टी थी, तब तक मैने अपने आवास पर जाकर दो रोटी बनाकर खाई और कार्यालय में बैठ गयी , आधी छुट्टी में पूरा स्टाफ मेरे साथ बैठता था, घरेलू परेशानियों से लेकर स्कूल की सभी दिक्कतें इसी समय पर कही सुनी जाती चाय के साथ।
उस दिन जैसे ही शकुन्तला ने कार्यालय में प्रवेश किया, चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी,
नमस्ते जी !
नमस्ते
आप कहीं गये थे आज ?
हां , आपकी देवरानी को उसके भाई को सौंपकर आई हूं ।
खुद चली जाती वह ! उसके आंखें चौड़ी कर ताज्जुब सा जताया ।
दो जान भी जा सकती थी, जैसा आप लोगों ने व्यवहार किया उसके साथ ,मैनें उसे तमाचा सा जड़ते हुये कहा ।
वह आई ही क्यों ?
उसका यह बेशर्मीपूर्ण सवाल था ।
आपके पास दो घंटे बैठी थी ,उसी से पूछ लेते आप, मैनें उसे यह कहकर चुप कर दिया था, उसके बाद शकुन्तला ने कभी कभार मुझसे पूछना चाहा कि उसका फोन वगैरह आता है या नहीं, लेकिन मेरी बेरुखी देख बात वहीं रह जाती, लगभग दो साल निकल गये और एक दिन वह रविवार को अपने भाई और दो ढ़ाई साल के बेटे के साथ मुझसे मिलने आई, चाहती थी कि मैं उसके पति के मन में क्या चल रहा है उसका पता लगवाऊं किसी से, अभी तक उसके मायके में भी लैंडलाइन लग चुका था मुझे नम्बर नोट कराया और चली गई वह भाई के साथ ही।
उसकी ससुराल के गांव से ही हमारे गांव के लोग प्राईवेट वाहन लेते हैं, हमारे गांव के लिए तो सोनीपत के लिए बस के चौबीस घंटे में दो चक्कर हैं और वे भी सोमवार से शुक्रवार तक, हरियाणा जैसे राज्य में भी हमारे गांव सा पिछड़ा हुआ गांव और उस गांव में रहकर जीवन बिता देने का अनुभव भी अर्थहीन नहीं किसी भावुक मन के लिए खैर …..
मैंने किसी तरह खोजबीन करके उसके पति को अपने घर बुलाया और बात सिरे चढ़ाई , वह अपनी परित्यकता पत्नी से फोन पर बात करने को राजी हो गया, मैंने उसे उसकी पत्नी का फोन नंबर लिखकर दे दिया और चोर बन गई दूसरे कमरे में जाकर दूसरा चोगा कान से लगाकर बात की तह तक पहुंचने के लोभ का संवरण न कर सकने के कारण मैंने यह अनैतिक कदम उठाया लेकिन तह तक तो तब भी नहीं पहुंच पाई जितनी देर नरेश और सुनीता फोन पर रहे एक ही सिलसिला जारी रहा, वह भावुकता वश रोती सिसकती सुन रही थी और वह उसे बचकाने तरीके से चिढ़ा रहा था, अंत में दोनों के बीच एक समझौता हुआ कि अगले ही दिन वह अपने बच्चे को लेकर मेरे घर आयेगी और नरेश से मिलेगी, बात खत्म हुई, मैंने धीरे से अपने कान से चोगा हटाया और नरेश के पास आकर अनजान बन कर पूछा क्या रहा, उसने कल आने की बात बताई और आप घर चला गया ।
अगले दिन सोमवार था और मैं स्कूल नहीं छोड़ सकती थी, थोड़ी चिढ़ भी बनी मुझे यह सोचकर कि मेरे घर आकर कब तक मिलेंगे मेरा भी तो अपना काम है लेकिन मैंने किसी दुखिया नारी और अबोध बालक के सुख हेतू अपना काम एक दिन के लिए छोड़ना स्वीकार कर लिया, एक समय वह भी था जीवन का जब इस सुनीता पति नरेश जैसे पति को मैंने भी भुगतान था, अंतर इतना सा था कि मैं मां बनने से पहले सरकारी नौकरी में आ चुकी थी इसलिए भविष्य और खर्चे की चिंता नहीं थी लेकिन जब बेटा बोलने लगा और अपने मामा की हम उम्र बच्ची से अपनी तुलना कर मुझसे पूछा कि मोनू के पापा की तरह मेरे पापा मेरे साथ क्यों नहीं रहते ? वह प्रश्न मुझे भीतर तक तोड़ गया था, मैंने निश्चय कर लिया था कि हर सप्ताह इसे इसके पापा के घर लेकर जाऊंगी, पति और सास गंदे से गंदा व्यवहार कर सकते थे, लेकिन ससुर और ननद देवर का व्यवहार कभी कटु नहीं रहा, इसी दम पर मैंने बेटे को उत्तर देकर खुश कर दिया था कि दो दिन बाद शनिवार इतवार की छुट्टी में तुझे तेरे पापा के पास ले जाऊंगी, मन में दबाई हूक रात को बेटे के हो जाने के बाद आसूंओं में बहाई , यदि उन्हें अपनी जिम्मेदारी का ख्याल होता तो भाभियों के कहने पर मेरे साथ यह दुर्व्यवहार होता ही नहीं, बच्चे को तो दुनियां में आना होता है बस शेष उस पति परमेश्वर को मुझसे कभी लगाव बना ही नहीं ।
भुक्तभोगी इंसान ही दूसरे की दिक्कत को अच्छी तरह समझता है सुनीता के केस में शायद यही फैक्टर काम कर रहा था, मैंने ठीक समय पर पति को तैयार कर उनके स्कूल के लिए विदा किया और अपने स्कूल में प्रार्थना सभा से बीस मिनट पहले पहुंच कर इंतजार करने लगी किसी स्टाफ मैम्बर की कोई आये तो उसे आज चार्ज देकर घर रहूं, न जाने वे कब आ जायेंगे और आयेंगे भी आगे पीछे इसलिए घर खुला रहना जरूरी था, ज्यों ही स्टाफ आया मैं उनसे छुट्टी लेकर घर की ओर हो ली ।
सुनीता अपने भाई और बेटे के साथ आई, कुछ ही मिनट बाद नरेश भी पहुंच गया, मैंने सभी को चाय पानी देकर सुनीता के भाई को एक तरफ बुला कर कहा कि मैं स्कूल में जाऊं और आप बच्चे को लेकर इधर उधर घुमा लाओ, इन दोनों को अकेले रहने दो कुछ देर ।
मैं स्कूल चली गई, अभी प्रार्थना के बाद बच्चे कक्षाओं में जा ही रहे थे, मैं मन में तसल्ली लिए आफिस में कुछ देर रह कर दसवीं कक्षा की इंचार्ज और अंग्रेजी अध्यापिका के तौर पर हाजिरी रजिस्टर के साथ कक्षा में जाकर हाजिरी लेने लगी, हाजिरी लेने के बाद जैसे ही गृहकार्य चैक करना शुरू किया बच्चे को गोद में उठाये मुझे बाहर आकर मिलने का अंदाज लेकर बरामदे में दिखाई दिया, मैं हाथ में नोटबुक पकड़े बाहर आई तो वह बोला, “दीदी ! उसकी चीखें गली तक सुनाई दे रही हैं शायद वह उसे पीट रहा है ।
मैं तेज़ कदमों से एक दम घर की ओर हो ली, मेरे स्कूल के गेट से घर के गेट की दूरी एक मिनट भर का पैदल रास्ता है ,
घर जाकर जो नजारा देखा नरेश के प्रति मन में क्रोध बुरी तरह जाग गया और मुझे यह भी याद नहीं रहा कि नरेश से मेरा कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं है, वह फर्श पर पड़ी रो रही थी, वह सिर पर तना खड़ा था, ऐसे में नरेश को धक्का देकर दूर हटाते बिना मैं रहती भी तो कैसे, लगभग घंटे भर की झूठी सच्ची बकवास सुन कर, मैंने कहा, ” सुनीता, विवाह का फल संतान होती है, वह तेरे पास है, बच्चे को लेकर घर जा ,सब समय पर छोड़ दे।”
मेरी बात सुनकर नरेश तत्काल उठा और बाहर की तरफ हो लिया, कुछ देर बाद वह भी अपने बच्चे के साथ भाई के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर चली गई, मैंने राहत की सांस ली और अपने स्कूल में चली गई ।
फोन का सिलसिला चालू हो चुका था, देखते ही देखते लैंडलाइन गायब हो गए, मोबाइल हर हाथ में दिखने लगा, मेरे पास भी मोबाइल था, सुनीता अब कभी भी फोन कर सकती थी लेकिन उसने भी अपने गांव में कोई प्राईवेट स्कूल ज्वाइन कर लिया था, बेटे को साथ रखती, स्कूल हो या घर, एक मात्र सहारा जीवन जीने का ।
कभी कभी सोचती हूं मैं आज जीवन के इस मोड़ पर जब साठ से भी दो तीन साल ऊपर जा चुके , मन विद्रोही बन चुका सामाजिक व्यवस्था के प्रति, कभी कभी तो उद्रेग ऐसा कि यदि वह व्यक्ति सम्मुख आ जाये जिसने “पतिव्रता धर्म” नामक शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया तो उसका मुंह नोच लूं, सिर फोड़ दूं या अपमानित कर दूं इस कदर कि आदिम युग से आज तक इस एक शब्द की महिमा को कायम रखने के लिए महिलाओं ने समय समय पर जो भोगा, उस सब का बदला ले सकूं, कौन होगा वह पिशाच जिसने यह शब्द बनाया होगा, उसने मानव प्रजाति की मादा को जीव मानने से ही इंकार कर दिया, रे दुष्ट पापी ! तेरे दिये घाव यह नारी जाति कभी नहीं भूलेगी, कौन भूलने देगा इसे इस पुरुष प्रधान समाज में जहां हर नारी को पतिव्रता होना ही चाहिए और हर पुरुष को अधिकार है कि निर्दोष पत्नी को जमकर ठोकर लगाये , धिक् धिक् धिक्कार है इस सामाजिक व्यवस्था पर, सामाजिक प्रचलन पर , न जाने कितनी मासूम जिंदगी भेंट चढ़ती हैं हर रोज और सिर्फ इस एक शब्द के कारण क्योंकि बचपन से घर में कथा कहानियों में उसे यह शब्द इतने प्रेम से सुनाया जाता है कि वह एक कामी-क्रोधी-लम्पट-लालची-परस्त्रीगामी -शराबी-कबाबी
हर तरह से बेकार पति को भी निभाना चाहती है क्योंकि वह पतिव्रता धर्म में पढ़ सुनकर पारंगत हो चुकी होती है खैर :
शकुन्तला मैडम मेरा स्कूल छोड़ कर पति के साथ सिरसा चली गई, सुनीता का फोन मैं बार बार फोन से निकालती यह सोचकर कि नम्बर सूची लम्बी क्यों बस अति आवश्यक नम्बर सहेज रखती लेकिन सुनीता के फोन छठे छमाही आने बंद नहीं हुये, न जाने उसे मुझसे कोई आस थी, प्रेम भाव था या ससुराल की टोह लेते रहने की सुविधा थी लेकिन फोन का सिलसिला कुछ यों चला जब भी उसका फोन आता मुझे पूछना पड़ता, “कौन ?” उधर से हल्की सी खिन्न हंसी आती, ” दीदी आप भी भूल जाते हो मुझे बार बार लेकिन मैं आपको कैसे भूल सकती हूं भला ?”
खैर फोन से हाल चाल मिलते रहे, बच्चा बढ़ रहा था, चार साल का हो गया तो सुनीता ने अपने गांव में ही एक निजी विद्यालय में अध्यापिका के तौर पर ज्वॉइन कर लिया, बच्चा आंखों के सामने, वहीं एक मात्र अवलम्ब था उसके जीवन का, मां पढ़ा रही थी और बेटा पढ़ रहा था, मिडिल पास हो गया, खर्चे बढ़े, भैंस खरीद कर सुबह शाम भैंस की सेवा, दिन में स्कूल की नौकरी, बूढ़े मां-बाप और बेटे की शिक्षा दीक्षा भोजन कपड़ा ;
मां बाप के जीवन काल में बेटी पर आया संकटकाल आधा रह जाता है तो सुनीता की नैया भी चल रही थी इसी तरह , पिता ने सौ गज जमीन का टुकड़ा उसको लेकर उस पर दो कमरे का सैट और भैंस के लिए बना कर दे दिया, सभी को पता था कि ससुराल कभी नहीं, तो भाईयों ने भी सहयोग दिया, घर मिलने की खुशी सुनीता ने फोन द्वारा कुछ इस तरह जाहिर की थी , ” दीदी ! बस अब कुछ नहीं चाहिए, आपका बेटा पढ़-लिख कर नौकरी लग जाते, मैं राम नाम पर ध्यान दूं ।” अब तक उसके विवाह को चौदह साल हो चुके थे, बेटा नवीं पास कर चुका था और इसी तरह साल गुजर गया उसने मैट्रिक अच्छे नम्बर लेकर पास की और समालखा सिनियर सैकैन्डरी में विज्ञान का विद्यार्थी बन गया।
हरियाणा पुलिस विभाग से नरेश के बैच के सभी सिपाही घर बिठा रखें थे सरकार ने गर्भवती सुनीता को मायके छोड़ कर आना और सरकार द्वारा पुलिस कर्मी नरेश को घर बैठाया जाना दोनों घटनायें लगभग साथ साथ घटी थी,सोलह साल का वनवास सा कट गया था सुनीता का, उधर बेटे ने 10+2 की परीक्षा पूरी की और इधर दोबारा नौकरी में ले लिये ग्रे पुलिस कर्मी नरेश ने न जाने किससे सुनीता का फोन नम्बर लेकर घंटी बजा दी, वह घेर में थी, फोन विकास बेटे ने उठाया, ” हैलो!
कौन ?”
तू कौन ?
मैं विकास ।
तेरी मम्मी कहां है ?
घेर में ।
घर आते तो फोन करवाना, इस नम्बर पर ।
“अंकल जी, अपना नाम बता दो, मैं मम्मी को बता दूंगा ।”
“रै, मैं हूं तेरा पापा ।”
विकास कांप उठा, फोन काट दिया, दौड़ कर घेर में जाकर सुनीता को सब बताया, वह घर आई, सबसे पहले मेरे पास फोन करके राय जाननी चाही,” दीदी, क्या करुं, फोन करने को कहा है, दोबारा नौकरी मिल गई, हो सकता है तलाक देकर दोबारा विवाह करना चाहते हो ।”
सारी बात बता चुकी थी, मुझे तलाक की बात सुन हंसी आई, “तलाक का इच्छुक विकास को अपना परिचय “तेरा पापा” कहकर कभी न देता, तलाक देने की इच्छा होती तो कोर्ट के माध्यम से सूचना मिलती तुझे “, मैंने कहा ।
कुछ देर की अटकलबाजी के बाद फोन रख दिया गया और जैसे ही फोन मुझसे डिस्कनैक्ट हुआ दोबारा उसी नम्बर से घंटी घनघनाई, सुनीता ने बेटे को इशारा किया, इशारे से मां को बताया वही नम्बर, मां बोली, “उठाकर बोल दें, तू है कौन, मैं पापा को नहीं जानता ।”
घंटी बजती जा रही थी, विकास ने फोन रिसीव करके मां के बताए शब्द पिता को सुना दिए, उधर से पूरे हक हुकूक के साथ आवाज आई ,” मारुंगा दड़ाक अपणे साल्ये कै , फोन अपमी मां तै दे ।”
विकास ने अतिशीघ्र फोन सुनीता को पकड़ा दिया, धीरे से हैलो! कह पाई थी, उधर से आदेश भरे लहजे में आवाज आई, ” मैं कल आ रहा हूं, तैयार रहना ।”
शाम के खाने की तैयारी करते मुझे घंटी सुनाई दी, फोन सुनीता का था, ” दीदी क्या करुं ?”
वनवास बीत चुका सुनीता, वह तेरे पास खुद आ रहा है, अपमान मत करना, अच्छी भारतीय नारी की तरह अपने घर आ जाना, हमारी सामाजिक व्यवस्था की यही दरकार है ।
तीन दिन बाद सुनीता का फोन आया ससुराल के घर से, सूखे धान हरियाते देखें मैंने जब उससे मिलने गई ।

गाँव व डा ० हलालपुर,
जिला सोनीपत हरियाणा
पिन कोड 131103


