अस्तित्व बचाने की लड़ाई में ‘भैया–भाभी’ कांग्रेस !: लिलानाथ गौतम
लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक अगस्त । देश की सबसे पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी नेपाली
कांग्रेस एक बार फिर विभाजन की दहलीज पर पहुँच गई है । विशेष महाधिवेशन से पार्टी सभापति बने गगन थापा समूह और पूर्व पार्टी सभापति शेरबहादुर देउवा समूह पिछले कुछ महीनों से अलग–अलग राजनीतिक दल की तरह गतिविधियाँ चला रहे हैं । हालांकि, औपचारिक रूप से अब तक अलग–अलग पार्टियों का गठन नहीं हुआ है । देउवा समूह का नेतृत्व पूर्व कार्यवाहक सभापति पूर्णबहादुर खड़का कर रहे हैं । यह समूह नेपाली कांग्रेस के संस्थापक नेता स्वर्गीय वी.पी. कोइराला के पुत्र डॉ. शशांक कोइराला को आगे रखकर नई पार्टी के गठन की तैयारी में जुटा है । समूह ने राष्ट्रीय कार्यकर्ता सम्मेलन की घोषणा की है तथा डॉ. कोइराला को ५५१ सदस्यीय मूल आयोजन समिति का संयोजक बनाया है ।
दूसरी ओर, गगन थापा समूह आगामी आश्विन महीने में पार्टी का १५वाँ राष्ट्रीय महाधिवेशन कराने के पक्ष में है । नेपाली कांग्रेस को एकजुट और सशक्त पार्टी बनाने की बात करते हुए यह समूह महाधिवेशन की तैयारियों में आगे बढ़ रहा है तथा आश्विन १६ से १९ गते के बीच काठमांडू में राष्ट्रीय महाधिवेशन आयोजित करने की तिथि तय कर चुका है । लेकिन देउवा समूह विशेष महाधिवेशन को अवैध बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर पुनर्विचार की माँग के साथ एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर करने पहुँचा है । इसी बीच नेपाली कांग्रेस के कुछ नेता दोनों गुटों को एकजुट करने के प्रयास में लगे हुए हैं । विशेष रूप से युवाओं का एक वर्ग इस पहल में सक्रिय दिखाई देता है । किंतु परिस्थितियाँ अब ऐसी बन चुकी हैं कि यदि कोई नाटकीय चमत्कार नहीं हुआ, तो आने वाले कुछ ही सप्ताहों में पार्टी का औपचारिक विभाजन लगभग तय माना जा रहा है ।
नई पार्टी की तैयारी तेज
डॉ. शशांक कोइराला के नेतृत्व में नई पार्टी बनाने की तैयारी कर रहे देउवा समूह में अधिकांश पुराने नेता शामिल हैं, जो पार्टी के पूर्व वरिष्ठ पदाधिकारी भी रह चुके हैं । पूर्व उपसभापति प्रकाशमान सिंह, विमलेन्द्र निधि, पूर्व महामंत्री कृष्णप्रसाद सिटौला, एन.पी. साउद और मीन विश्वकर्मा जैसे नेता देउवा–खड़का समूह में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं । १५वें महाधिवेशन में पार्टी सभापति पद के दावेदार रहे पूर्णबहादुर खड़का और शेखर कोइराला के साथ–साथ निधि, सिंह और सिटौला भी डॉ. शशांक को नई पार्टी का सभापति बनाने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं । इसके लिए उन्होंने श्रावण २९ से ३१ गते तक राष्ट्रीय कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाया है । इसी सम्मेलन से यह समूह नई पार्टी की घोषणा करने के पक्ष में है । नई पार्टी का नाम ‘राष्ट्रीय कांग्रेस’ तथा उसका चुनाव चिह्न ‘शंख’ होने की चर्चा है । हालांकि, इस संबंध में अब तक कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है ।
नई पार्टी के गठन की तैयारी में लगे कुछ नेताओं के अनुसार, कोइराला परिवार के नेताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से भी डॉ. शशांक कोइराला को पार्टी नेतृत्व के लिए आगे बढ़ाया गया है । हालांकि, कांग्रेस नेत्री सुजाता कोइराला इस समूह से बाहर हैं । वे विशेष महाधिवेशन से गठित नेतृत्व समिति में केन्द्रीय सदस्य बन चुकी हैं । देउवा समूह में नेपाली कांग्रेस के अधिकांश पुराने नेता दिखाई देते हैं, जबकि गगन थापा के नेतृत्व वाले संस्थापन समूह में युवा नेताओं का वर्चस्व है ।
राजनीतिक हलकों में इन दोनों गुटों को क्रमशः ‘भैया–भाभी कांग्रेस’ और ‘देवर बाबुओं की कांग्रेस’ कहकर भी टिप्पणी की जाती है । जेनजी आंदोलन का मूल संदेश यह है कि अब कांग्रेस का भविष्य ‘भैया–भाभी’ के हाथों में नहीं, बल्कि ‘देवर बाबुओं’ के हाथों में होना चाहिए । किंतु ‘भैया–भाभी’ खेमा इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है ।
‘भैया’ और ‘भाभी’ की राजनीतिक संस्कृति
नेपाली कांग्रेस के भीतर अपने से अधिक आयु और वरिष्ठता वाले नेताओं को ‘दाइ’ (बड़े भाई) कहकर संबोधित करना कोई नई बात नहीं है । पूर्व पार्टी सभापति शेरबहादुर देउवा को केन्द्रीय स्तर के लगभग सभी नेता ‘शेरबहादुर दाइ’ कहकर संबोधित करते हैं । देउवा के निकट रहे अन्य नेताओं को भी ‘दाइ’ कहने वाले नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में बड़ी संख्या में हैं ।
इन्हीं नेता–कार्यकर्ताओं के बीच ‘भाउजू’ (भाभी) शब्द भी उतना ही प्रचलित है । ‘भाउजू’ शब्द नेपाली कांग्रेस के दायरे से बाहर भी व्यापक रूप से प्रसिद्ध है । यद्यपि राजनीति में उनका कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं रहा, फिर भी जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की पत्नियाँ नेपाली कांग्रेस की राजनीति में प्रभावशाली होती गईं, तब ‘भाउजू’ अर्थात् ‘भाभी’ शब्द विशेष रूप से चर्चा का विषय बन गया ।
स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक नई पार्टी के गठन की तैयारी कर रहे पूर्णबहादुर खड़का के नेतृत्व वाले वर्तमान समूह को ‘भैया–भाभी कांग्रेस’ भी कहते हैं । उनका यह भी कहना है कि अब नेपाल की राजनीति में इस ‘भैया–भाभी कांग्रेस’ के अस्तित्व की आवश्यकता नहीं रह गई है । इसके पीछे एक कारण भी बताया जाता है । वह कारण है– इस समूह का अतीत के भ्रष्टाचार और कुशासन से जुड़ जाना ।
पंचायत काल में अत्यंत संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन बिताने वाले और लोकतंत्र की पुनस्र्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ये नेता आज केवल अप्रासंगिक ही नहीं माने जाते, बल्कि देश और जनता के लिए हानिकारक नेताओं के रूप में भी देखे जाते हैं । कहा जाता है कि सत्ता प्राप्त करने के बाद इन्होंने देश और जनता की अपेक्षा ‘भैया–भाभी’ (अर्थात् पार्टी नेतृत्व और उसके परिवार) की संपत्ति और शक्ति बढ़ाने में अधिक योगदान दिया । राजनीतिक विश्लेषक मुमाराम खनाल के शब्दों में, “अब इन्हें इनके अपने बेटे–पोते भी वोट नहीं देंगे; इनके द्वारा बनाई गई नई पार्टी के अस्तित्व में आने की कल्पना भी मत कीजिए ।”
अस्तित्व बचाने की अंतिम लड़ाई
खैर ! चर्चित और पुराने नेताओं का एक बड़ा समूह नई पार्टी बनाने के लिए सक्रिय हो गया है, लेकिन ऐसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं है कि यह दल आम जनता के बीच अपनी पहचान बना सकेगा । फिर भी अपने राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए यह समूह पूरी ताकत से संघर्ष कर रहा है । ‘भैया–भाभी’ संस्कृति को फिर से आगे बढ़ाने की योजना बना रहे इस समूह के अधिकांश नेताओं पर अतीत में भ्रष्टाचार के आरोप भी लग चुके हैं । जेनजी आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पार्टी सभापति तथा पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा और उनकी पत्नी आरजू राणा पर गंभीर हमला भी हुआ । इसके बाद उपचार के बहाने देउवा दंपति देश छोड़कर चले गए और अब तक नेपाल वापस नहीं लौट सके हैं । विशेष रूप से आरजू राणा पर ‘भाभी’ बनकर नेपाली कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर कब्जÞा करने से लेकर बड़े–बड़े भ्रष्टाचार कांडों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहने तक के आरोप लगाए जाते रहे हैं । इन आरोपों से उनके मुक्त होने की संभावना भी अत्यंत कम मानी जाती है । अब उन्हीं राणा के ‘देवर बाबू’ नेपाली कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी की घोषणा की तैयारी में जुटे हैं । यह उनके राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की अंतिम लड़ाई भी है ।

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