रसुवा की बाढ़ का संदेश : विकास बनाम प्रकृति नहीं, प्रकृति के साथ विकास चाहिए : श्वेता दीप्ति
रसुवा की बाढ़ केवल रसुवा की त्रासदी नहीं है। यह पूरे हिमालय की चेतावनी है।
रसुवा में भोटेकोशी नदी का अचानक उग्र हो उठना केवल एक प्राकृतिक आपदा की खबर नहीं है; यह मनुष्य और प्रकृति के बीच बिगड़ते संबंध पर एक गंभीर चेतावनी भी है। नदी वही है, पहाड़ वही हैं, घाटियाँ वही हैं—लेकिन प्रकृति का संतुलन जिस तेजी से बदल रहा है, उसने इन परिचित भू-दृश्यों को अचानक भयावह बना दिया है।
ल्हेन्दे खोला से आई बाढ़ ने भोटेकोशी का रूप धारण किया और देखते-देखते बस्तियों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और मानवीय जीवन को अपनी चपेट में ले लिया। इससे पहले भी ल्हेन्दे खोला में बाढ़ आने पर रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था और पिछले वर्ष की बाढ़ से उसकी संरचनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा था।
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्या हम प्रकृति को केवल संसाधन समझकर उसके साथ लगातार छेड़छाड़ करते रहेंगे और फिर हर आपदा को ‘प्राकृतिक प्रकोप’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे?
नदी को हमने रास्ता नहीं, जमीन समझ लिया
नदियाँ अपने लिए रास्ता बनाती हैं। उनकी अपनी धारा होती है, अपना फैलाव क्षेत्र होता है और अपने साथ बहने वाली मिट्टी, पत्थर तथा मलबे को आगे ले जाने की प्राकृतिक प्रक्रिया होती है। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने नदी के किनारों को बस्तियों, बाजारों, सड़कों और परियोजनाओं से भर दिया।
जहाँ नदी को खुला आकाश और अपना स्वाभाविक विस्तार चाहिए था, वहाँ हमने कंक्रीट खड़ा कर दिया। जहाँ पहाड़ों की प्राकृतिक ढलान और जंगल मिट्टी को थामे रखते थे, वहाँ सड़क, सुरंग और निर्माण गतिविधियों ने भू-संतुलन को प्रभावित किया।
रसुवा की त्रासदी हमें इसी भूल की कीमत समझाती है। प्रकृति बदला नहीं लेती, वह अपना संतुलन खोजती है हम अक्सर कहते हैं—‘प्रकृति ने अपना कहर बरपाया।’ लेकिन प्रकृति किसी से बदला नहीं लेती। वह केवल अपने बिगड़े हुए संतुलन को पुनः स्थापित करती है।
जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र को विशेष रूप से संवेदनशील बना दिया है। हिमनदों और हिमतालों में परिवर्तन, अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएँ हिमालयी समाज के लिए बढ़ता हुआ खतरा हैं। विशेषज्ञों ने पहले भी रसुवा की ल्हेन्दे-भोटेकोशी बाढ़ के संदर्भ में भारी वर्षा के बजाय हिमताल टूटने या बर्फ/मलबे के अचानक बहाव जैसी संभावनाओं की जांच की आवश्यकता बताई थी।
इसलिए हर बाढ़ को केवल ‘अचानक आई प्राकृतिक घटना’ कहकर भूल जाना समस्या का समाधान नहीं है।
विकास बनाम प्रकृति नहीं, प्रकृति के साथ विकास चाहिए
नेपाल के लिए जलविद्युत विकास आवश्यक है। सड़कें चाहिए, पुल चाहिए, व्यापारिक गलियारे चाहिए और दूरदराज के क्षेत्रों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ना भी जरूरी है। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम पहाड़ों की वहन क्षमता को नजरअंदाज कर दें।
भोटेकोशी क्षेत्र में अनेक जलविद्युत परियोजनाएँ हैं। पिछली बाढ़ों में भी कई परियोजनाओं और प्रसारण संरचनाओं को नुकसान पहुंचा है। एक रिपोर्ट के अनुसार भोटेकोशी बाढ़ के प्रभाव से कई जलविद्युत परियोजनाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई थी।
यह स्थिति हमें एक बुनियादी सवाल की ओर ले जाती है—क्या परियोजना शुरू करने से पहले हमने केवल आर्थिक लाभ का हिसाब लगाया, या प्रकृति की संभावित कीमत का भी?
जब नदी उफनती है तो केवल पानी नहीं आता। उसके साथ मलबा, चट्टानें, पेड़ और मिट्टी आती है। सड़कें टूटती हैं, पुल बहते हैं, संचार व्यवस्था ठप होती है, बिजली उत्पादन रुकता है और लोगों का एक-दूसरे से संपर्क टूट जाता है।
2025 की भोटेकोशी बाढ़ में भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और कई लोग लापता हुए थे। सीमा पुल, वाहन, सड़क तथा जलविद्युत संरचनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा था।
इसलिए रसुवा की हर नई बाढ़ हमें यह याद दिलाती है कि आपदा प्रबंधन केवल बाढ़ आने के बाद हेलिकॉप्टर भेजने तक सीमित नहीं रह सकता। आज आवश्यकता है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास की पूरी अवधारणा पर पुनर्विचार किया जाए।
नदी किनारे निर्माण की सीमाएँ तय हों। हिमतालों और ग्लेशियरों की निरंतर निगरानी हो। भूकंपीय और भूगर्भीय संवेदनशीलता को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।
जलविद्युत परियोजनाओं के लिए केवल आर्थिक व्यवहार्यता नहीं, बल्कि दीर्घकालीन पर्यावरणीय और आपदा जोखिम मूल्यांकन भी अनिवार्य हो।
स्थानीय समुदायों को पूर्व चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त रखा जाए।
प्रकृति पर प्रहार का उत्तर प्रकृति ही देती है रसुवा की बाढ़ हमें डराने नहीं, जगाने आई है। हमें यह समझना होगा कि पहाड़ केवल पत्थर नहीं हैं, नदियाँ केवल पानी नहीं हैं और जंगल केवल लकड़ी नहीं हैं। ये सब मिलकर एक ऐसा जीवंत पारिस्थितिक तंत्र बनाते हैं, जिसके संतुलन पर मानव जीवन टिका है।
हमने यदि पहाड़ काटे, नदियों के किनारे कब्जाए, जंगल घटाए और प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा किया, तो आपदा को केवल ‘प्राकृतिक’ कह देना हमारे अपराध को छोटा नहीं कर देगा।
प्रश्न यह नहीं कि अगली बाढ़ कब आएगी।
प्रश्न यह है कि अगली बाढ़ आने से पहले क्या हम प्रकृति की भाषा समझ पाएंगे?
क्योंकि प्रकृति को जीतने का दावा करने वाला मनुष्य अंततः उसी प्रकृति पर निर्भर है। प्रकृति पर प्रहार अंततः मनुष्य के अपने अस्तित्व पर प्रहार है।


