शव प्रवंधन : धार्मिक आस्था और अधिकार* अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करो! : डा. विजय दत्त
डा. विजय दत्त, काठमांडू 2 सितंबर । मानव अधिकार मनुष्य के जीवन के साथ प्रारंभ होकर जीवन के अंत तक बने रहते हैं; अर्थात “गर्भ से लेकर श्मशान-कब्र तक” (from womb to tomb)। मृत्यु के पश्चात् सम्मानजनक अंतिम संस्कार की गारंटी मानव अधिकार प्रदान करते हैं। परंतु नेपाल में 26 अगस्त 2026 की प्राकृतिक आपदा के दौरान यह स्थिति देखने को नहीं मिली।
किसी भी बड़ी आपदा या प्राकृतिक प्रकोप के बाद जन-धन की क्षति को कम करने जितना ही महत्वपूर्ण कार्य मृतकों का सम्मानजनक और सुरक्षित शव प्रबंधन करना है। वर्ष 2019 के कोविड-19 महामारी के समय अत्यधिक संक्रमण के भय के बीच भी सुरक्षा बलों और प्रशासकों ने धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक आस्था और व्यक्तिगत पहचान की मर्यादा रखते हुए अंतिम संस्कार किया था। लेकिन वर्ष 2026 की हालिया प्राकृतिक आपदा के बाद शव प्रबंधन में देखी गई अव्यवस्था ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
*शव प्रबंधन केवल एक तकनीकी कार्य या सफाई व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह मृतक की गरिमा, परिजनों के मानसिक स्वास्थ्य और सांस्कृतिक अधिकारों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा विषय है।*
*अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस (ICRC) के मानक और जमीनी वास्तविकता*
अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस समिति (ICRC) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशा-निर्देशों के अनुसार (संक्रामक रोगों को छोड़कर) प्राकृतिक आपदाओं में मृत शरीरों से महामारी फैलने का कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होता। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत सामूहिक रूप से गड्ढा खोदकर शवों को दफनाना (Mass Burial) केवल एक अंतिम विकल्प (Last Resort) माना जाता है।
*ICRC / WHO मानकों के विपरीत वर्तमान स्थिति और प्रक्रिया*
हालिया शव प्रबंधन ICRC/WHO के अंतरराष्ट्रीय मानकों के सर्वथा विपरीत दिखाई दे रहा है। मानक प्रक्रियाओं के अनुसार शव प्रबंधन के मुख्य चरण निम्न हैं:-
*पहचान और अभिलेख*: प्रत्येक शव का डीएनए (DNA), फिंगरप्रिंट और फोटो सुरक्षित रखना अनिवार्य है। बिना पहचान के जल्दबाजी में सामूहिक दफन या दाह-संस्कार करने से लापता लोगों की सूची लंबी होती चली जाती है।
*शीत भंडारण* (Cooling System): कोल्ड चैंबर, मोबाइल कूलिंग यूनिट्स या ड्राई आइस (Dry Ice) का उपयोग करके शवों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। यदि बुनियादी ढांचे के अभाव में शव तेजी से सड़ने लगे, तभी केवल आपात स्थिति में त्वरित अंतिम संस्कार का प्रावधान है।
*धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकार:* परिजनों की सहमति से उनकी धार्मिक रीति-रिवाजों (दाह-संस्कार या दफनाना) के अनुसार अंतिम संस्कार की अनुमति होनी चाहिए। परिजनों को सूचित किए बिना सामूहिक गड्ढों में शव डालना आस्था के विपरीत है।
*कोल्ड स्टोरेज और अस्थायी तकनीकों का उपयोग*
शव प्रबंधन की व्यवस्थित प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए तत्काल निम्नलिखित विकल्प अपनाना अनिवार्य है:-
*मोबाइल कोल्ड स्टोरेज:* कंटेनर-आधारित कूलिंग तकनीक को आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तुरंत तैनात किया जाए।
*बर्फ और ड्राई आइस* (Dry Ice) की व्यवस्था: जहां स्थायी बुनियादी ढांचा न हो, वहां 24 से 72 घंटों तक शवों को सुरक्षित रखने के लिए ड्राई आइस का उपयोग किया जाए।
शवगृहों (Mortuaries) की क्षमता विस्तार: स्थानीय अस्पतालों और शवगृहों में अस्थायी रूप से क्षमता बढ़ाई जाए।
*निष्कर्ष*
प्राकृतिक आपदा के कारण हुए विनाश के बीच प्रशासनिक कमियों के चलते मृतकों के धार्मिक अधिकार छीनना और सामूहिक गड्ढों में शवों को फेंकना मानवीय गरिमा के प्रतिकूल है। 2019 के संकट से सीखे गए पाठों को 2026 की इस आपदा में लागू करते हुए राज्य की सुरक्षा एजेंसियों और आपदा प्रबंधन टीमों को ICRC के अंतरराष्ट्रीय मानकों, वैज्ञानिक पहचान प्रक्रिया और धार्मिक आस्थाओं के साथ मानवअधिकारो का सम्मान करते हुए शव प्रबंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए। नेपाल सरकार को इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त कर अपने नागरिकों की धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों की रक्षा हर हाल में करनी चाहिए। सरकार संवेदनशील बने !


